चंदा की चु@@ई 6 (Chanda Ki Ch@@ai Part 6) (चौकीदार के साथ चु@@ई )

दोस्तों, मैं चंदा हूँ। मुझे भूले तो नहीं, अब तक अपनी मे कहानी के 5 पार्ट पढ़े है अगर नहीं पढ़े तो जल्दी से पढ़ लो फिर इस कहानी को पढ़ने मे और भी मजा आएगा।  

  पार्ट - 5 यहां पढ़ें👇

Chanda Ki Ch@@ai Part 5 

वो रात जब नानी ने सब देख लिया, वो सिर्फ मुझे पकड़कर घर ले गईं। लेकिन अगली सुबह ही नानी ने नाना से कहा, "ये लड़की अब नहीं सुधरेगी।" नाना ने गुस्से में मुझे डाँटा, लेकिन ज्यादा कुछ नहीं कहा — बस फैसला किया कि मुझे शहर भेज दो, जहाँ "नई जिंदगी" मिले।  

लेकिन नानी ने मेरे माता-पिता को तुरंत फोन किया। माँ ने रोते हुए कहा, "क्या? हमारी बेटी ने ऐसा किया? हरिया और मोन सिंह...?" पापा ने फोन पर चुप्पी साध ली, लेकिन गुस्सा साफ था। वो बोले, "मे जल्दी ही अपना ट्रांसफर करबा लूँगा और चंदा को साथ ले जाऊंगा। लेकिन पहले चंदा को शहर भेजो, गाँव में बदनामी न फैले।" परिवार ने फैसला किया — मुझे दिल्ली भेजो, लेकिन सख्त निगरानी में। माँ-पापा ने कहा, "शहर में रहकर पढ़ाई करो, लेकिन कोई गलत हरकत नहीं। हम महीने में एक बार चेक करेंगे।"  

  


ट्रेन में बैठते समय माँ ने मुझे गले लगाकर कहा, "बेटी, हमारा सर मत झुकाना। तेरी वजह से गाँव में लोग उँगली उठा रहे हैं।" मैं रोई, लेकिन अंदर से वो पुरानी उत्तेजना अभी भी थी।  

ट्रेन से उतरकर दिल्ली की भीड़ में घुल गई। गर्मी, धूल, और नई आजादी का मिश्रण। बैग उठाकर ऑटो लिया, "सूर्या गर्ल्स हॉस्टल, राजेंद्र नगर।" रास्ते में मन में गाँव की यादें घूम रही थीं — हरिया लाल का रूखा स्पर्श, वो मोटा ल@@ जो मुझे फाड़कर मजा देता था। लेकिन अब परिवार की धमकी याद थी: "एक गलती और घर वापस, शादी फिक्स।"  

हॉस्टल के गेट पर पहुंची। लोहे का बड़ा गेट, ऊपर "सूर्या गर्ल्स हॉस्टल" लिखा। गेट पर एक आदमी खड़ा था — उम्र 45-50, काला-सा, मोटा-तगड़ा, यूनिफॉर्म में। नाम प्लेट पर "रामू चौकीदार"। वो मुझे देखकर मुस्कुराया, लेकिन आँखों में कुछ अलग था — लालच जैसा। "नई लड़की? नाम बताओ, एंट्री कर दूँगा।"  

मैंने नाम बताया — चंदा। वो मेरी आईडी चेक करता रहा, लेकिन नजरें मेरे चेहरे से नीचे सरक रही थीं — मेरी टाइट कुर्ती पर, जहाँ ब@@ थोड़े उभरे हुए थे। मैंने नजरें झुका लीं। वो बोला, "रूम नंबर 204, दूसरे फ्लोर पर। सामान उठाने में मदद चाहिए?" मैंने मना कर दिया, लेकिन उसने बैग उठाया और साथ चल पड़ा। सीढ़ियों पर चलते हुए उसका हाथ मेरी कमर को छू गया — "गलती से " जैसा। मैं सिहर गई, लेकिन कुछ नहीं बोली।  

रूम में पहुंचकर बैग रखा। रूममेट रिया नहीं थी — वो क्लास में गई थी। रामू बोला, "कुछ चाहिए तो बता देना। रात में गेट 10 बजे बंद हो जाता है। लेट आई तो मुझे ही जगाना पड़ेगा।" उसकी मुस्कान में कुछ शैतानी था। वो चला गया, लेकिन जाते-जाते बोला, "तुम बहुत सुंदर हो, चंदा जी। शहर में अकेली रहना मुश्किल होता है।" मैं चुप रही, लेकिन मन में एक अजीब सी गुदगुदी हुई।  

पहला दिन नॉर्मल गुजरा। शाम को बाहर गई, बाजार से कुछ सामान लिया। लौटी तो 9:45 बज चुके थे। गेट खुला था। रामू गेट पर बैठा सिगरेट पी रहा था। मुझे देखकर बोला, "टाइम पर आ गईं। अच्छा है।" मैंने थैंक यू कहा और अंदर चली गई। लेकिन सीढ़ियों पर जाते हुए महसूस हुआ — वो मेरी तरफ देख रहा है, जैसे शिकार को ताक रहा हो।  

रात को सोते समय रिया आई। वो बोली, "रामू चौकीदार के बारे में सुना? बहुत चालाक है। पहले कुछ लड़कियों को लेट आने पर डराता था, फिर 'फेवर' मांगता। लेकिन अब warden ने सख्ती कर दी है, तो वो ज्यादा नहीं करता। लेकिन सावधान रहना।" मैंने हँसकर टाल दिया, लेकिन अंदर से सोच रही थी — अगर वो मुझे अकेले में पकड़ ले तो? क्या मैं मना कर पाऊँगी? या पुरानी आदत फिर जाग जाएगी?  

एक दिन कॉलेज और कोचिंग से लौटते समय बहुत जाम था लौटते रात के 11 बज गए। हॉस्टल का गेट बंद था। मैंने बेल बजाई। रामू चौकीदार आया, चेहरे पर गुस्सा। दरवाजा खोलते ही बोला, "फिर लेट? कितनी बार समझाऊँ? नियम तोड़ोगी तो बाहर ही रहना पड़ेगा!"  

मैं माफी माँगने लगी, "सॉरी अंकल, अगली बार नहीं होगा..." लेकिन वो मुझे अंदर खींचते हुए बोला, "चुप! ऑफिस में आओ, बात करनी है।" मैं डर गई, लेकिन बाहर ठंड और अंधेरा था। ऑफिस में घुसी। वो दरवाजा बंद कर मेरे सामने खड़ा हो गया।  

"तुम्हें डाँटने का मन नहीं करता, लेकिन सजा तो देनी पड़ेगी," कहकर वो अचानक मेरे पास आया। एक हाथ मेरी कमर पर रख दिया, दूसरा मेरे गले की तरफ बढ़ाया — जैसे गले लगाने की कोशिश। उसकी उँगलियाँ मेरी कमर पर दबाव डाल रही थीं, और दूसरा हाथ मेरे ब@@ के पास सरक रहा था। मैंने महसूस किया — उसकी हथेली मेरे एक ब@@ को छू गई, हल्का सा दबाया।  

मेरा पूरा शरीर सिहर गया। मन में डर, गुस्सा और वो पुरानी गर्माहट सब मिलकर उलझ गए। मैंने जोर से धक्का मारा, "अंकल, छोड़ो!" और तेजी से दरवाजे की तरफ भागी। वो पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैं बाहर निकलकर सीढ़ियाँ चढ़ गई। कमरे में घुसकर दरवाजा बंद किया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।  

रात भर नींद नहीं आई। सोच रही थी — "कितना करीब आ गया था वो... अगर रिया न होती तो? लेकिन मेरी च@@ अभी भी गीली क्यों है? क्या मैं सच में रोक नहीं पाऊँगी खुद को?"  

एक दिन शाम को तेज बारिश शुरू हो गई। मैं कॉलेज से लौट रही थी, पूरी भीग चुकी थी। कुर्ता मेरे शरीर से चिपक गया था, ब@@ के आकार साफ दिख रहे थे। ठंड से काँप रही थी। गेट पर रामू चौकीदार खड़ा था, सिगरेट पीते हुए। मुझे देखकर बोला, "अरे चंदा जी, इतनी भीग गईं? अंदर आओ, तौलिया देता हूँ।"  

मैं थक गई थी, ठंड लग रही थी। मना नहीं कर पाई। ऑफिस में चली गई। छोटा-सा कमरा, dim लाइट, एक टेबल, कुर्सी। वो दरवाजा बंद कर बोला, "बैठ जाओ।" मैं खड़ी रही। उसने तौलिया दिया। मैंने सिर पोंछना शुरू किया, लेकिन हाथ काँप रहे थे।  

  

रामू पास आया। "दिखाओ, मैं मदद करता हूँ।" उसने तौलिया मेरे हाथ से लिया और मेरे सर पर रख दिया। धीरे-धीरे सर पोंछने लगा। लेकिन उसका तरीका अलग था — तौलिया के साथ-साथ उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में फंस रही थीं, गर्दन पर सरक रही थीं। मैं सिहर गई। मन में एक तूफान मचल रहा था —  

"क्या कर रही हूँ मैं? परिवार ने कहा था संभलकर रहना। माँ की रोती आवाज याद आ रही है। लेकिन ये स्पर्श... गाँव वाली यादें जगा रहा है। हरिया लाल की दाढ़ी जब मेरी गर्दन पर रगड़ती थी, वो दर्द-मजा। क्या मैं फिर वही चाह रही हूँ? डर लग रहा है, लेकिन च@@ में गर्माहट महसूस हो रही है। रोकना चाहिए, लेकिन शरीर नहीं मान रहा।"  

रामू मेरे पीछे खड़ा हो गया। तौलिया अब मेरे कंधों पर था। वो धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रख रहा था, जैसे मसाज कर रहा हो। लेकिन तभी मैंने महसूस किया — उसकी साँसें मेरी गर्दन पर गर्म। और... उसके ल@@ का सिर मेरे कंधे की तरफ से चुभ रहा था। वो यूनिफॉर्म की पैंट खोल चुका था, ल@@ बाहर निकालकर मेरे पीठ/कंधे पर रगड़ रहा था — हल्का-हल्का, लेकिन इतना कि मैं महसूस कर रही थी। गर्म, सख्त, नसें फूली हुईं।  

  

मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं सोच रही थी — "ये क्या कर रहा है? मैं चीखूँ? भागूँ? लेकिन अगर चीखी तो सबको पता चल जाएगा। warden आएगी, फिर परिवार को खबर... शादी, घर वापस... सब खत्म। लेकिन ये स्पर्श... इतना गंदा, इतना उत्तेजक। मेरी च@@ पहले से गीली हो गई है। क्या मैं इतनी कमजोर हूँ?"  

मैंने धीरे से कहा, "अंकल... बस... मैं ठीक हूँ।" लेकिन आवाज काँप रही थी। वो हँसा, "डर मत चंदा जी। बस गरम कर रहा हूँ। देखो, तुम काँप रही हो।" उसका ल@@ अब मेरे कंधे पर और जोर से रगड़ रहा था — ऊपर-नीचे, जैसे कोई निशान बना रहा हो। मैंने आँखें बंद कर लीं। मन में guilt और मजा दोनों लड़ रहे थे। "मैं शहर आई थी सुधरने, लेकिन फिर वही हो रहा है। क्या मैं कभी बदल नहीं पाऊँगी?"  

तभी बाहर से किसी लड़की की आवाज आई — रिया की। "चंदा? तू कहाँ है? बारिश में भीगकर आई है?" रामू चौंक गया। जल्दी से ल@@ अंदर डाला, पैंट ठीक की। मैं तुरंत बाहर निकली। रिया ने मुझे देखा, "क्या हुआ? चेहरा लाल क्यों है?" मैंने कहा, "कुछ नहीं... ठंड लग रही है।"  

रात भर सो नहीं पाई। मन में रामू का वो स्पर्श घूम रहा था — तौलिया, हाथ, और वो चुभता हुआ ल@@। डर था कि अगली बार वो और आगे बढ़ेगा। लेकिन साथ ही एक अजीब सी चाहत जाग रही थी — "अगर मैं खुद चली जाऊँ तो? सिर्फ एक बार...?" परिवार की धमकी याद आती, लेकिन शरीर कह रहा था — "एक बार और... फिर सुधर जाऊँगी।"  

वो रात जब रामू चौकीदार ने मुझे ऑफिस में पकड़ने की कोशिश की, मैं किसी तरह भाग आई। लेकिन अगले दिन सुबह उठी तो पूरा शरीर टूट रहा था। सर दर्द, गला सूजा हुआ, और ठंड लग रही थी — बारिश में भीगने का नतीजा। बुखार था, कम से कम 102 डिग्री। मैं बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। रिया कॉलेज चली गई, बोली, "आराम कर, दवा ले ले।" मैंने दवा खाई, लेकिन मन कहीं और भटक रहा था।  

कमरे में लेटी हुई थी, लेकिन अंदर से एक आग जल रही थी। रामू का वो स्पर्श — तौलिया, हाथ, और कंधे पर चुभता हुआ ल@@ — बार-बार याद आ रहा था। डर लग रहा था, guilt था कि परिवार को पता चला तो सब खत्म। माँ की रोती आवाज गूँज रही थी, "बेटी, संभलकर रहना।" लेकिन च@@ में वो गर्माहट, वो खुजली... जैसे कोई कह रहा हो, "एक बार और कर ले, फिर सुधर जाना।" मैं खुद से लड़ रही थी — "नहीं चंदा, रुक जा। ये गलत है।" लेकिन न चाहते हुए भी खिड़की से गेट की तरफ देखने लगी। रामू वहाँ खड़ा था, गेट पर नजरें घुमा रहा था। तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी। वो मुस्कुराया, और इशारा किया — नीचे की तरफ, बेसमेंट की ओर। मैंने नजरें फेर लीं, लेकिन दिल धड़कने लगा। "क्या करूँ? न जाऊँ तो? लेकिन अगर वो warden से शिकायत कर दे तो?"  

मैं उठी, धीरे से कपड़े ठीक किए, और नीचे उतर गई। बुखार था, लेकिन शरीर खुद चल रहा था। गेट पर पहुंची। रामू बोला, "आ गईं? मैं जानता था। चलो, बेसमेंट में। वहाँ कोई नहीं आता।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसके पीछे चल पड़ी। बेसमेंट अंधेरा था, पार्किंग वाली जगह — पुरानी गाड़ियाँ, धूल, और dim लाइट। वो मुझे एक कोने में ले गया, जहाँ कोई नहीं देख सकता था।  

  

वहाँ पहुंचते ही वो मुझे दीवार से सटा दिया। "बुखार है, लेकिन आग लगी हुई है ना?" कहकर उसने मेरे होंठों पर होंठ रख दिए। स्वाद तंबाकू और पसीने का, लेकिन गर्माहट इतनी कि मैं जवाब दे रही थी। उसने मेरा टॉप ऊपर किया, ब@@ खोल दी। मेरे ब@@ बाहर आ गए, न@@ सख्त। वो चूसने लगा, जोर से काटा। मैं सिसकारी, "आह... अंकल... बुखार है, धीरे।" लेकिन वो कहाँ मानने वाला। उसका हाथ मेरी कमर पर, फिर जींस की बटन खोलकर च@@ पर। उँगली डाली — पहले से गीली थी। "वाह, र@@ बन गई हो।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस कमर हिलाई।  

उसने मुझे जमीन पर लिटाया — ठंडी फर्श पर। अपना ल@@ निकाला — मोटा, काला, गर्म। मेरी च@@ पर रखा, धीरे धकेला। दर्द हुआ, लेकिन बुखार की वजह से मजा दोगुना। वो धक्के मारने लगा — तेज, गहरे। हर धक्के में चटकने की आवाज, मेरा रस बह रहा था। मैं चीखी, "आह... और जोर से... फाड़ दो मेरी च@@।" वो हँसा, स्पीड बढ़ाई। मैं चरम पर पहुंची, काँप गई। फिर उसने गर्म रस मेरे अंदर छोड़ दिया। मैं हाँफ रही थी।  

बेसमेंट के अंधेरे कोने में पहली बार के बाद मैं पूरी तरह थक चुकी थी। शरीर काँप रहा था, बुखार से जल रहा था, और च@@ में अभी भी रामू का गर्म रस महसूस हो रहा था। मैंने धीरे से कहा, "बस अंकल... अब काफी है... मुझे ऊपर जाना है।" लेकिन वो हँसा, मेरी कमर पकड़कर मुझे फिर से जमीन पर लिटा दिया। "कहाँ जा रही हो र@@? अभी तो मजा शुरू हुआ है।"  

मैं उठने की कोशिश कर रही थी, लेकिन पैरों में ताकत नहीं थी। रामू का ल@@ अभी भी अंदर था, और वो धीरे-धीरे हिल रहा था। मैंने महसूस किया — वो फिर से सख्त हो रहा है। पहले से ज्यादा मोटा, ज्यादा गर्म। वो मेरे ऊपर लेट गया, मेरी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। "देख, फिर खड़ा हो गया। तेरी च@@ ने इसे जगा दिया।" उसने धक्का मारा — गहरा, तेज। मैं चीखी, "आह... धीरे... बुखार है..." लेकिन वो रुक नहीं रहा था। हर धक्के में मेरी च@@ सिकुड़ रही थी, रस और पुराना रस मिलकर बह रहा था।  

मैं चटपटा रही थी — मजा इतना कि आँखें बंद हो रही थीं, लेकिन हल्का दर्द भी था क्योंकि बुखार और थकान से शरीर संभाल नहीं पा रहा था। मैंने हाथ बढ़ाकर उसकी पीठ पकड़ी, नाखून गड़ा दिए। वो और जोर से धक्के मारने लगा, मेरी कमर को अच्छे से जकड़ लिया। "चुप कर, ले ले सारी रात।" मैं सिसकार रही थी, "आह... अंकल... मारो... लेकिन धीरे..." मजा और दर्द का ऐसा मिश्रण कि मैं खुद कमर उठा रही थी, जैसे और गहरा चाह रही हो।  

फिर वो थोड़ा रुका, लेकिन ल@@ अभी भी अंदर था। मैंने फिर उठने की कोशिश की, "अब सच में... चल नहीं पा रही..." लेकिन उसने मुझे पलट दिया, doggy स्टाइल में। मेरी ग@@ ऊपर, च@@ खुली। उसका ल@@ फिर से पूरी तरह खड़ा हो चुका था। वो पीछे से घुसाया — इस बार और जोर से। मेरी कमर को दोनों हाथों से जकड़ लिया, जैसे मैं भाग नहीं पाऊँ। धक्के तेज, गहरे, लगातार। मैं चटपटा रही थी, "आह्ह... बस... आ रही हूँ... फिर से..." शरीर काँप रहा था, हल्का दर्द जाँघों में, लेकिन मजा इतना कि मैं खुद पीछे धकेल रही थी। वो मेरी ग@@ पर थप्पड़ मार रहा था, "चल, और ले... तेरी च@@ मेरी है आज।"  

मैं चीख रही थी, लेकिन आवाज दबी हुई — मजा में डूबी, दर्द में चटपटाती। अंत में वो गर्म रस फिर छोड़ गया, मेरी च@@ भरकर। मैं पूरी तरह बेहाल, काँपती हुई लेटी रही। चलने की ताकत नहीं थी — पैर सुन्न, शरीर पसीने से तर।  

रामू ने मुझे गोद में उठाया, "चल, मैं छोड़ आता हूँ।" चुपके से सीढ़ियाँ चढ़ाकर रूम तक ले गया। बिस्तर पर लिटाया, कंबल ओढ़ाया। "फिर बुलाऊँगा," कहकर चला गया। मैं लेटी रही, आँखें बंद। मन में सिर्फ एक बात — "कितना मजा आया... लेकिन अब क्या होगा? परिवार... रिया... सबको पता चला तो?"  

दोस्तों, अगर FB पर 1000+ लाइक्स आए तो Part 7 जल्दी आएगा। कमेंट में बताओ — कितनी बार हिलाया? चंदा की चटपटाहट कैसी लगी? 😈