ट्रेन का सफर मीना की चुदाई कहानी (Train ka Safar Meena Ki Chudai Kahani )

मीना के परिवार में पाँच सदस्य थे— पति राजेश, पत्नी मीना, उसके सास और ससुर, और उनका छोटा सा बेटा राहुल, जो अभी सिर्फ पाँच साल का था और दुनिया की हर छोटी-बड़ी चीज को अपनी मासूमियत भरी आँखों से देखता था, जैसे हर पल उसके लिए एक नया रहस्य या खेल हो, उसकी हँसी घर की हर दीवार को रोशन कर देती थी, और मीना की पूरी जिंदगी उसी के इर्द-गिर्द घूमती थी, लेकिन रातों में जब सब सो जाते थे, तो मीना अपने अंदर की उस औरत को महसूस करती थी जो अभी भी जिंदा थी, जो चाहती थी कि कोई उसे छुए, सहलाए, और वो आग जो सालों से दबी हुई थी, उसे फिर से सुलगाए, क्योंकि राजेश के साथ अब वो रिश्ता सिर्फ जिम्मेदारियों का रह गया था, प्यार की वो गर्माहट कब की ठंडी पड़ चुकी थी। 

राजेश एक साधारण सरकारी नौकरी करने वाला आदमी था, जो सुबह से शाम तक काम में डूबा रहता था, घर आकर थकान से चूर हो जाता था, और मीना की तरफ देखने का वक्त ही नहीं मिलता था, उसके चौड़े कंधे और मजबूत बाजू अब भी आकर्षक थे, लेकिन मीना के लिए वो अब सिर्फ एक साथी थे, न कि वो प्रेमी जो कभी उसे रात भर जगाकर प्यार करता था। मीना खुद एक खूबसूरत औरत थी, उसके लंबे काले बाल जो कमर तक लहराते थे, गोरा रंग जो चाँदनी की तरह चमकता था, भरी हुई छाती जो 36 इंच की थी और साड़ी के ब्ला@@उज़ में मुश्किल से समाती थी, पतली कमर जो 28 इंच की थी और हर कदम पर लचकती थी, और वो गोल नितंब जो 38 इंच के थे और चलते वक्त एक लय पैदा करते थे—ये सब अब भी वैसा ही था, लेकिन राजेश की नजरों में वो अब माँ बन चुकी थी, पत्नी नहीं, और मीना कभी-कभी आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देखती थी, सोचती थी कि क्या वो अभी भी उतनी ही आकर्षक है, क्या कोई और उसे देखकर वो आग महसूस करेगा जो राजेश भूल चुका है।

एक शाम राजेश ने मीना और राहुल को स्टेशन छोड़ने के लिए अपनी पुरानी कार निकाली, क्योंकि मीना अपनी बहन के घर जा रही थी जहाँ उसकी भतीजी की शादी का बड़ा सा कार्यक्रम था, पूरा परिवार इकट्ठा होने वाला था, नाच-गाना, खाना-पीना, और वो सब रौनक जो मीना को सालों से महसूस नहीं हुई थी, लेकिन राजेश को ऑफिस की मीटिंग की वजह से नहीं जा पा रहा था, इसलिए मीना को अकेले ही राहुल के साथ ट्रेन से जाना पड़ रहा था, और राजेश बस उन्हें स्टेशन तक छोड़ने आया था। कार में बैठे हुए मीना ने राजेश की तरफ देखा, उम्मीद की कि शायद वो कुछ रोमांटिक कहे या छुए, लेकिन राजेश सिर्फ रोड पर ध्यान दे रहा था, राहुल पीछे की सीट पर खेल रहा था, और मीना ने चुपचाप खिड़की से बाहर देखना शुरू कर दिया, सोचते हुए कि काश जिंदगी थोड़ी और रंगीन होती। स्टेशन पहुँचते ही राजेश ने कार रोकी, मीना का बड़ा सा बैग उठाया जिसमें शादी के कपड़े, राहुल के खिलौने और जरूरी सामान भरा था, राहुल को गोद में लिया जो उत्साह से स्टेशन की भीड़ देख रहा था, और प्लेटफॉर्म तक पहुँचाया जहाँ ट्रेन आने वाली थी।



मीना ने साड़ी संभाली, राहुल को हाथ से पकड़ा, और राजेश ने बैग रखकर कहा, "ट्रेन लेट न हो, वरना कॉल कर देना, और वहाँ पहुँचकर बताना," फिर उसने मीना के गाल पर एक हल्का सा चुंबन दिया, लेकिन वो चुंबन इतना सूखा और औपचारिक था कि मीना को लगा जैसे कोई ड्यूटी निभाई जा रही हो, न कि दिल से प्यार जताया जा रहा हो, उसके होंठ मीना की त्वचा पर बस छूकर हट गए, कोई गर्माहट नहीं, कोई लंबाई नहीं, और मीना ने मन ही मन सोचा कि काश ये चुंबन थोड़ा और गहरा होता, थोड़ा और लंबा, लेकिन अब वो आदत हो चुकी थी। 

"ख्याल रखना अपना और राहुल का, जल्दी वापस आना," राजेश ने कहा और कार की तरफ मुड़ गया, मीना ने उसे जाते हुए देखा, ट्रेन की सीटी बजी, और वो राहुल को लेकर ट्रेन में चढ़ गई, एक विंडो वाली सीट पर बैठ गई जहां से बाहर का नजारा दिखता था, राहुल को अपनी गोद में बिठाया जो ट्रेन की हलचल से खुश था लेकिन थकान से जल्दी ही उसकी आँखें बंद होने लगीं, और मीना ने उसे सीने से लगाकर सुला दिया, उसकी छोटी साँसें मीना की छाती पर महसूस हो रही थीं, गर्म और मासूम, लेकिन मीना के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कुछ होने वाला हो, ट्रेन चल पड़ी, रात की ओर बढ़ती हुई, बाहर अंधेरा घना होता जा रहा था, पेड़-पौधे धुंधले होते जा रहे थे, और ट्रेन की रफ्तार मीना की धड़कनों को तेज कर रही थी।


ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी, छोटे-छोटे स्टेशन आते-जाते थे, जहां कुछ यात्री चढ़ते-उतरते थे, और बोगी में भीड़ कम होती जा रही थी, क्योंकि ये एक स्लो पैसेंजर ट्रेन थी जो रात में ज्यादा खाली हो जाती थी, दिन की हलचल अब शांत हो चुकी थी, और मीना की बोगी में अब बस कुछ ही लोग बचे थे—एक बुजुर्ग दंपति जो कोने में बैठे हुए थे और अब नींद में खर्राटे ले रहे थे, उनकी साँसें ट्रेन की आवाज में घुल-मिल रही थीं, और दूर एक सीट पर एक आदमी जो अपनी किताब में डूबा हुआ था, कभी-कभी पन्ने पलटता था, लेकिन उसकी नजरें मीना की तरफ उठती थीं। वो आदमी, जिसका नाम बाद में पता चला विक्रम

था, लंबा-चौड़ा कद का था, काली घनी मूंछें जो उसके चेहरे को एक मर्दाना आकर्षण देती थीं, गहरी काली आँखें जो किसी को भी घूरकर अंदर तक देख सकती थीं, चौड़ा सीना जो उसकी शर्ट के नीचे से उभरा हुआ लगता था, और एक ऐसी मुस्कान जो मीना को पहली नजर में ही अजीब सी लगी, जैसे वो कुछ छिपा रहा हो लेकिन वो छिपाना भी इतना आकर्षक हो कि कोई रोक न सके। 

ट्रेन जब एक छोटे से स्टेशन पर रुकी, तो कुछ और यात्री उतर गए, बुजुर्ग दंपति अब पूरी तरह सो चुके थे, उनकी आँखें बंद थीं और शरीर ढीला पड़ चुका था, बोगी लगभग खाली हो चुकी थी, सिर्फ मीना, राहुल जो उसकी गोद में गहरी नींद सो रहा था, उसकी छोटी-छोटी साँसें मीना की छाती पर गुदगुदी कर रही थीं, और वो विक्रम जो अब अपनी किताब बंद करके मीना की तरफ देख रहा था, उसकी आँखों में एक चमक थी, जैसे वो मीना को पढ़ रहा हो, न कि किताब को। मीना ने अनदेखा करने की कोशिश की, अपनी साड़ी का पल्लू संभाला जो हल्का सा सरक गया था, और बाहर अंधेरे में देखने लगी, लेकिन विक्रम की नजरें उसकी छाती पर रुक रही थीं, जहां ब्ला@@उज़ की टाइट फिटिंग से उसके स्तनों की आउटलाइन साफ दिख रही थी, और मीना को लग रहा था कि वो नजरें गर्म हैं, सालों से महसूस नहीं की गई वो गर्माहट। 

विक्रम ने धीरे से अपनी सीट से उठकर मीना के पास आया, मुस्कुराते हुए कहा, "अकेली यात्रा कर रही हैं मैडम? बच्चा सो गया लगता है, ट्रेन लेट हो रही है ना?" उसकी आवाज गहरी थी, जैसे कोई पुराना गीत बज रहा हो, और मीना ने हल्के से सिर हिलाया, "हाँ, बहन के घर जा रही हूँ शादी में, ट्रेन हमेशा लेट ही रहती है," और विक्रम ने पास वाली सीट पर बैठने की इजाजत मांगी, "यहाँ ज्यादा जगह है, अगर बुरा न मानें तो मैं यहाँ बैठ जाऊँ? अकेले में बात करके टाइम पास हो जाएगा," मीना ने मना नहीं किया, क्योंकि रात का अंधेरा और ट्रेन की सुनसानी में अकेले डर लग रहा था, और वो नहीं जानती थी कि ये फैसला उसकी जिंदगी में एक तूफान ला देगा, 

विक्रम बैठ गया, उसके शरीर से एक मर्दाना खुशबू आ रही थी, जैसे कोई महंगा परफ्यूम, और बातें शुरू हो गईं—मौसम से, ट्रेन की लेटलतीफी से, फिर जिंदगी की छोटी-मोटी बातों तक, विक्रम ने बताया कि वो बिजनेस करता है, उसी दिशा में जा रहा है एक मीटिंग के लिए, और मीना ने अपनी फैमिली के बारे में थोड़ा बताया, लेकिन विक्रम की बातों में एक जादू था, वो मीना को हँसा रहा था, उसकी तारीफ कर रहा था, "आप इतनी खूबसूरत हैं कि ट्रेन की ये रात भी रोशन हो गई," और मीना शर्मा गई, लेकिन मन ही मन खुश हुई, क्योंकि राजेश ने सालों से ऐसी तारीफ नहीं की थी।


रात और गहरी हो गई थी, ट्रेन अब जंगलों और सुनसान मैदानों से गुजर रही थी, बाहर सिर्फ काला अंधेरा जहां कभी-कभी दूर के गाँवों की मद्धिम रोशनी चमकती थी, ट्रेन की लाइट भी धीमी हो चुकी थी, जैसे नींद को बुला रही हो, बोगी में हवा ठंडी हो गई थी, मीना ने राहुल को और करीब से लगाया जो अब पूरी तरह गहरी नींद में था, उसकी छोटी आँखें बंद, मुँह हल्का सा खुला, और साँसें नियमित, ट्रेन की हलचल भी उसे नहीं जगा रही थी, वो इतना थका हुआ था कि दुनिया की कोई आवाज उसे नहीं छू सकती थी। 

विक्रम अब मीना के और करीब आ गया था, उनकी जाँघें एक-दूसरे को छू रही थीं, पहले अनजाने में, लेकिन फिर जानबूझकर, और मीना का शरीर सिहर उठा, वो रोकना चाहती थी लेकिन उस स्पर्श में कुछ ऐसा था जो उसके अंदर की दबी हुई आग को सुलगा रहा था, विक्रम ने धीरे से अपना हाथ मीना की जांघ पर रखा, पहले बस हल्का सा, जैसे कोई बात करते हुए अनजाने में हो गया हो, लेकिन मीना की साँसें तेज हो गईं, 

उसकी त्वचा पर वो हाथ गर्म था, जैसे आग का स्पर्श, और वो चुप रही, विरोध नहीं किया, क्योंकि मन में एक हिस्सा कह रहा था कि रोकना मत, महसूस करो ये गर्माहट जो सालों से गायब है। विक्रम ने देखा कि मीना ने हाथ नहीं हटाया, तो उसका हाथ और ऊपर सरका, जांघ की अंदरूनी तरफ, जहां त्वचा ज्यादा नरम और संवेदनशील थी, उँगलियाँ धीरे-धीरे दबा रही थीं, घेर बना रही थीं, और मीना की जाँघें खुद-ब-खुद थोड़ी सी फैल गईं, वो आँखें बंद कर लीं, सोचते हुए कि ये गलत है, राहुल गोद में है, राजेश घर पर है, लेकिन शरीर मान नहीं रहा था, वो स्पर्श इतना मादक था कि विरोध करने की ताकत नहीं बची थी, और विक्रम का हाथ अब और साहसी हो गया, वो मीना की साड़ी के नीचे सरकने लगा, धीरे-धीरे ऊपर की तरफ, जहां पै@@ंटी की किनारी महसूस हो रही थी, उँगलियाँ पै@@ंटी के ऊपर से मीना की चू@@त को छू रही थीं, हल्का सा दबाव, और मीना के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली, "नहीं... प्लीज...

राहुल सो रहा है," लेकिन उसकी आवाज में विरोध कम था, माँग ज्यादा, क्योंकि उसकी चू@@त पहले से ही गीली हो चुकी थी, वो गर्म रस बह रहा था जो पै@@ंटी को भिगो रहा था, और विक्रम ने धीरे से पै@@ंटी की किनारी सरकाई, उँगली सीधे चू@@त की फाँकों पर रखी, जो गुलाबी और सूजी हुई थीं, उँगली से ऊपर-नीचे सहलाया, क्लि@@टोरिस को छुआ जो अब सख्त हो चुका था, और मीना की कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठने लगी, वो राहुल को गोद में संभाल रही थी लेकिन उसका ध्यान अब सिर्फ उस सुख पर था जो विक्रम की उँगलियाँ दे रही थीं, उँगली धीरे-धीरे अंदर जा रही थी, गीलेपन में सरक रही थी, घुम रही थी, और मीना की साँसें और तेज हो गईं, उसके स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, ब्ला@@उज़ में कैद होकर उछल रहे थे।


विक्रम ने अब अपना दूसरा हाथ मीना की छाती की तरफ बढ़ाया, पहले साड़ी का पल्लू धीरे से सरकाया जो पहले से ही ढीला पड़ चुका था, पल्लू गिरते ही मीना की छाती खुलकर सामने आ गई, ब्ला@@उज़ की टाइट फिटिंग में उसके स्तन उभरे हुए थे, गोल और भरे हुए, बीच की गहरी दरार साफ दिख रही थी, और विक्रम ने अपना हाथ ब्ला@@उज़ के ऊपर रखा, पहले हल्का सा स्पर्श, जैसे महसूस कर रहा हो उस नरमी को, फिर धीरे-धीरे दबाया, उँगलियाँ स्तनों की आउटलाइन पर फेरते हुए, नि@@प्पल्स को ब्ला@@उज़ के ऊपर से ही महसूस किया जो अब सख्त हो चुके थे, जैसे छोटे-छोटे मोती उभर आए हों, और मीना की सिसकारी और गहरी हो गई, 

"आह्ह... विक्रम... क्या कर रहे हो," लेकिन वो रुकना नहीं चाहती थी, उसके शरीर में एक आग लग चुकी थी जो अब बुझने वाली नहीं थी। विक्रम ने ब्ला@@उज़ के हुक को उँगलियों से पकड़ा, पहले ऊपर वाला हुक खोला, धीरे से, जैसे कोई कीमती चीज खोल रहा हो, फिर दूसरा, तीसरा, और आखिरी हुक खुलते ही ब्ला@@उज़ खुल गया, मीना की ब्रा@@ सामने आ गई, सफेद लेस वाली ब्रा@@ जो उसके स्तनों को मुश्किल से समा रही थी, स्तन ऊपर से उभर रहे थे, गोल और गोरे, और विक्रम ने ब्रा@@ की स्ट्रैप को कंधे से सरकाया, पहले दाएँ कंधे से, फिर बाएँ से, और ब्रा@@ नीचे सरक गई, मीना के स्तन आजाद हो गए, वो गोल, भरे हुए, गोरे स्तन जिनके ऊपर गुलाबी नि@@प्पल्स सख्त होकर खड़े थे, जैसे किसी ने उन्हें चूमा हो, और विक्रम ने अपना हाथ रखा, पहले हल्के से सहलाया, उँगलियाँ नि@@प्पल्स पर घुमाईं, उन्हें चुटकी में लेकर मरोड़ा, हल्का सा, और मीना का शरीर काँप उठा, सुख की लहर दौड़ गई, "ओह्ह... विक्रम... धीरे... इतना अच्छा लग रहा है," वो फुसफुसाई, और विक्रम ने अपना मुँह नीचे किया, पहले एक स्तन को होंठों से छुआ, 

गर्म साँसें मीना की त्वचा पर पड़ीं, फिर जीभ से चाटा, नि@@प्पल को जीभ की नोक से सहलाया, फिर मुँह में लिया, चूसा, जोर से, जैसे दूध पी रहा हो, और मीना के हाथ विक्रम के बालों में चले गए, उसे और दबा रही थी, सुख इतना गहरा था कि वो सब भूल गई, राहुल अभी भी सो रहा था, उसकी नींद इतनी गहरी थी कि ट्रेन की झटके या मीना की सिसकारियाँ उसे नहीं जगा रही थीं, और विक्रम का दूसरा हाथ अभी भी मीना की चू@@त में उँगली घुमा रहा था, अब दो उँगलियाँ अंदर-बाहर कर रही थीं, गीलेपन की आवाज ट्रेन की आवाज में दब रही थी, मीना की कमर ऊपर-नीचे हो रही थी, वो चरम के करीब पहुँच रही थी, लेकिन विक्रम ने रुककर कहा, "अभी नहीं, और मजा लो," और मीना ने आँखें खोलीं, उसकी आँखों में भूख थी, सालों की दबी हुई भूख।


ट्रेन चलती रही, लेकिन अगला स्टेशन आने वाला था, और ठीक उसी वक्त जब विक्रम ने अपनी पैंट की जिप खोली, अपना लं@@ड बाहर निकाला जो सख्त, लंबा और मोटा था, नसें उभरी हुईं, सिरा गुलाबी और चमकदार, और मीना की चू@@त की तरफ ले जाने लगा, लेकिन मीना ने रोक दिया, क्योंकि वो बैठी हुई थी, राहुल गोद में था, और वो इतना आगे नहीं जा सकती थी, "नहीं विक्रम... यहाँ नहीं, राहुल है, और स्टेशन आ रहा है," वो फुसफुसाई, उसकी साँसें अभी भी तेज थीं, शरीर गर्म, लेकिन ट्रेन की सीटी बजी, स्टेशन आ गया, और ये मीना का स्टेशन था, 

लेकिन विक्रम ने कहा, "चलो, उतरते हैं, पास ही एक होटल है, वहाँ चलते हैं, मैं तुम्हें छोड़ दूँगा बाद में," और मीना, जो अब पूरी तरह उसकी गिरफ्त में थी, उसकी आग अभी बुझी नहीं थी, हाँ कह दी, राहुल को गोद में उठाया जो अभी भी सो रहा था, विक्रम ने बैग उठाया, और दोनों ट्रेन से उतर गए, स्टेशन के बाहर आए जहां रात का सन्नाटा था, कुछ रिक्शा वाले सो रहे थे, और पास ही एक छोटा सा होटल था, पुराना लेकिन साफ-सुथरा, लाइट जल रही थी, विक्रम ने रिसेप्शन पर जाकर एक कमरा लिया, कहते हुए कि "बस थोड़ी देर रुकेंगे, फैमिली है," और मीना चुपचाप उसके पीछे चली गई, कमरे में पहुँचते ही विक्रम ने दरवाजा बंद किया, लॉक लगाया, और राहुल को बिस्तर के एक कोने में लिटाया, जहां वो अभी भी गहरी नींद में था, मीना ने उसे चादर ओढ़ाई, और फिर विक्रम की तरफ मुड़ी, उसकी आँखों में अब कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ चाहत।

कमरे में हल्की सी लाइट जल रही थी, पीली रोशनी जो सब कुछ और रहस्यमय बना रही थी, विक्रम ने मीना को दीवार से सटा लिया, उसके शरीर को अपने शरीर से दबाया, मीना की छाती उसके सीने से सटी, स्तन दब रहे थे, और विक्रम ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए, पहले हल्का सा चुंबन, होंठों को छूकर महसूस किया, फिर गहरा, जीभ अंदर डाली, मीना की जीभ से खेलने लगा, चूसने लगा, जैसे मीठा रस पी रहा हो, मीना के हाथ विक्रम की कमर पर चले गए, उसे और करीब खींचा, और विक्रम ने मीना की साड़ी का पल्लू खींचा, साड़ी धीरे-धीरे उतरने लगी, प्लेट्स खुल गईं, और साड़ी नीचे गिर गई, अब मीना सिर्फ ब्ला@@उज़ और पेटीकोट में थी, 

विक्रम ने ब्ला@@उज़ के हुक फिर से खोले, ब्रा@@ उतारी, और स्तनों को आजाद किया, उन्हें हाथों में लिया, दबाया, नि@@प्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा, फिर मुँह में लिया, एक-एक करके चूसा, काटा हल्का सा, और मीना की सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं, "आह्ह... विक्रम... चूसो और जोर से... सालों से किसी ने ऐसे नहीं छुआ," वो उसके बाल पकड़कर दबा रही थी, और विक्रम नीचे झुका, पेटीकोट की नाड़ी खोली, पेटीकोट नीचे सरका, पै@@ंटी उतारी, और मीना की चू@@त सामने थी, गुलाबी, गीली, झां@@तों से साफ, क्लि@@टोरिस उभरा हुआ, और विक्रम घुटनों पर बैठ गया, मीना की जाँघें फैलाईं, और जीभ से चाटना शुरू किया, 

पहले ऊपर से, फाँकों पर जीभ फेरी, क्लि@@टोरिस को जीभ की नोक से सहलाया, फिर चूसा, जैसे कोई फल खा रहा हो, मीना की कमर काँप रही थी, वो विक्रम के सिर को दबा रही थी, "ओह्ह... विक्रम... जीभ अंदर डालो... गहराई में... चाटो मुझे... इतना मजा... आह्ह," और विक्रम ने जीभ अंदर डाली, घुमाई, मीना का रस उसके मुँह में आ रहा था, गर्म और मीठा, और मीना चरम पर पहुँच गई, उसका शरीर काँप उठा, रस बह निकला, लेकिन विक्रम नहीं रुका, वो चाटता रहा, मीना की सिसकारियाँ और ऊँची हो गईं।


फिर विक्रम उठा, अपनी शर्ट उतारी, पैंट उतारी, उसका लं@@ड बाहर आ गया, सख्त, लंबा, मोटा, नसें फूली हुईं, सिरा चमक रहा था, पूरा 8 इंच का, मीना ने उसे हाथ में लिया, सहलाया, ऊपर-नीचे किया, फिर मुँह में लिया, चूसा, जीभ से चाटा, विक्रम कराह उठा, "मीना... चूसो... गहराई में लो... आह्ह," और मीना ने जोर से चूसा, लेकिन अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था, विक्रम ने मीना को बिस्तर पर लिटाया, राहुल कोने में सो रहा था, मीना की जाँघें फैलाईं, अपना लं@@ड चू@@त पर रखा, पहले सिरा सहलाया, ऊपर-नीचे फेरा, क्लि@@टोरिस पर रगड़ा, मीना की कमर ऊपर उठ रही थी, "डालो विक्रम... अंदर डालो... चो@@दो मुझे... सालों की भूख है," और विक्रम ने धीरे से सिरा अंदर धकेला, मीना टाइट थी क्योंकि राजेश ने सालों से ठीक से नहीं छुआ था, दर्द हुआ लेकिन सुख ज्यादा, "आह्ह... धीरे... लेकिन रुकना मत... पूरा अंदर," और विक्रम ने धीरे-धीरे पूरा अंदर कर दिया, 

मीना की चू@@त ने उसे कसकर पकड़ लिया, गर्म और गीली, और फिर गति शुरू की, धीरे-धीरे धक्के, हर धक्के के साथ मीना की सिसकारियाँ, "तेज... और तेज... चो@@दो जोर से... आह्ह... विक्रम... मुझे फाड़ दो," विक्रम के धक्के तेज हो गए, बिस्तर हिल रहा था, मीना के स्तन उछल रहे थे, वो उन्हें पकड़कर दबा रहा था, नि@@प्पल्स को मरोड़ रहा था, मीना के नाखून उसकी पीठ पर गड़ रहे थे, खरोंच मार रही थी, और कमरा उनकी सिसकारियों, धक्कों की आवाज और साँसों से भर गया, विक्रम ने मीना को उल्टा किया, पीछे से अंदर डाला, नितंबों को दबाया, थप्पड़ मारे हल्के से, और धक्के मारे, मीना चिल्ला रही थी, 

"हाँ... पीछे से... गहरा... आह्ह," और फिर दोनों चरम पर पहुँचे, मीना का शरीर काँप उठा, रस बह निकला, विक्रम ने अंदर ही झड़ दिया, गर्म वीर्य मीना की चू@@त में भर गया, दोनों थककर लेट गए, साँसें तेज, शरीर पसीने से भीगे, मीना ने विक्रम के सीने पर सिर रखा, "ये गलत था... लेकिन इतना सुख कभी नहीं मिला," और विक्रम ने मुस्कुराकर कहा, "जिंदगी में कभी-कभी ऐसे पल आते हैं जो सब बदल देते हैं।"


सुबह होने से पहले मीना ने कपड़े पहने, राहुल को उठाया जो अभी भी सो रहा था, विक्रम ने उन्हें रिक्शा में बिठाया, और मीना अपनी बहन के घर चली गई, शादी के कार्यक्रम में शामिल होने, लेकिन उसके मन में वो रात हमेशा के लिए बस गई थी, वो स्पर्श, वो सुख, वो गहराई जो घर में कभी नहीं मिली, और वो सोचती रही कि क्या कभी विक्रम से फिर मिलेगी, या ये बस एक याद बनकर रह जाएगी, लेकिन वो जानती थी कि ये निशान गहरा था, जिंदगी को नया रंग देने वाला।