यह कहानी है रीता की, एक 28 साल की हाउसवाइफ, जो आगरा के एक छोटे से मोहल्ले में रहती थी। रीता का पति एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था और सुबह से शाम तक घर से बाहर रहता। घर में अकेली रीता को रोजाना सब्जी लाने के लिए मोहल्ले के सब्जी वाले रमेश पर निर्भर रहना पड़ता। रमेश 35 साल का था, कद-काठी मोटी-तगड़ी, गोरी चेहरा लेकिन आंखों में हमेशा एक चालाक चमक। वह रोज सुबह साइकिल पर सब्जी की टोकरी लटकाए घर-घर आता और रीता को देखते ही मुस्कुरा देता।
एक सुबह, रीता ने खिड़की से देखा कि रमेश आ रहा है। उसने जल्दी से साड़ी ठीक की, लेकिन आज कुछ अलग था। रीता ने हल्की स्लीवलेस ब@@उज पहना था, जो उसके भरे हुए बदन को और आकर्षक बना रहा था। रमेश ने दरवाजा खटखटाया। "भाभीजी, ताजी सब्जियां लाया हूं। आज टमाटर और बैंगन बहुत मीठे हैं।"
रीता ने दरवाजा खोला और मुस्कुराई। "अंदर आ जाओ रमेश भैया, मैं देख लूं।" रमेश अंदर आया, टोकरी नीचे रखी और रीता के पास खड़ा हो गया। रीता झुककर सब्जियां चुन रही थी, और रमेश की नजरें उसके कमर की कट पर टिक गईं। साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था, और रमेश को रीता का नाभि दिख गया। उसका दिल धड़कने लगा। "भाभीजी, आप आज बहुत सुंदर लग रही हो। भैया तो भाग्यशाली हैं।"
रीता ने शरमाते हुए सिर झुकाया, लेकिन मन ही मन अच्छा लगा। पति से महीनों से वो संतुष्टि नहीं मिली थी। "अरे, क्या कह रहे हो। बस, रोज का काम।" रमेश ने हिम्मत जुटाई और पास आ गया। "भाभीजी, एक बात कहूं? आपकी कमर कितनी पतली है, जैसे कोई मूर्ति।" रीता चौंकी, लेकिन पीछे हटी नहीं। रमेश ने हौसला पाकर अपना हाथ रीता की कमर पर रख दिया। रीता का शरीर सिहर उठा। "रमेश, ये क्या कर रहे हो?"
लेकिन रमेश रुका नहीं। "भाभीजी, मैं रोज आपको देखकर तड़पता हूं। आपकी ये आंखें, ये होंठ... बस एक बार छू लूं।" रीता ने विरोध किया, लेकिन उसकी आंखों में वही आग थी जो रमेश की। "नहीं रमेश, कोई देख लेगा।" रमेश ने दरवाजा बंद कर दिया और रीता को दीवार से सटा लिया। उसके होंठ रीता के होंठों पर चिपक गए। रीता पहले तो झिझकी, लेकिन फिर जवाब दे दी। दोनों का च@@बन गहरा हो गया। रमेश के हाथ रीता के ब@@उज में घुस गए, और उसके स्तनों को मसलने लगा। रीता की सांसें तेज हो गईं। "उफ्फ... रमेश... धीरे..."
रमेश ने रीता की साड़ी खींच ली। अब रीता सिर्फ पेटीकोट और ब@@उज में थी। रमेश ने ब@@उज उतार दिया, और उसके काले ब@@ा में छिपे गोरे स्तनों को बाहर निकाल लिया। वह घुटनों पर बैठ गया और रीता के स्तनों को चूसने लगा। रीता के मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं – "आह... रमेश... कितना अच्छा लग रहा है..." रमेश ने एक हाथ नीचे सरकाया और पेटीकोट के अंदर घुसा दिया। रीता की च@@त पहले से ही गीली थी। उसने उंगली डाली तो रीता कूद पड़ी। "ओह... हां... वहां..."
रीता ने रमेश की पैंट खोली। रमेश का ल@@ड बाहर आ गया – मोटा, काला और सीधा खड़ा। रीता ने उसे पकड़ा और सहलाने लगी। "कितना बड़ा है... भैया का तो आधा भी नहीं।" रमेश मुस्कुराया और रीता को किचन के टेबल पर लिटा दिया। उसने पेटीकोट ऊपर चढ़ाया और प@@%%ी उतार दी। रीता की गुलाबी च@@त चमक रही थी। रमेश ने अपना ल@@ड रीता की च@@त पर रगड़ा। "भाभीजी, तैयार हो?"
रीता ने आंखें बंद कर लीं। "हां... डाल दो..." रमेश ने एक झटके में ल@@ड अंदर डाल दिया। रीता चीख उठी – "आह्ह्ह... दर्द हो रहा है... लेकिन अच्छा दर्द..." रमेश ने धीरे-धीरे च@@$$ई शुरू की। हर झटके के साथ रीता की चीखें सिसकारियों में बदल गईं। "हां रमेश... तेज... और तेज... च@@दो मुझे..." किचन में धप-धप की आवाज गूंजने लगी। रमेश के ल@@ड ने रीता की च@@त को पूरी तरह भर दिया था। रीता के स्तन उछल-उछल कर लहरें बना रहे थे।
कुछ मिनट बाद रमेश ने स्पीड बढ़ा दी। रीता चरम पर पहुंच गई – "आह... आ गया... झड़ रही हूं..." उसकी च@@त सिकुड़ने लगी, और रमेश भी रुक न सका। उसने ल@@ड बाहर निकाला और रीता के पेट पर अपना माल छोड़ दिया। दोनों हांफते हुए लिपट गए। "भाभीजी, कल फिर आऊंगा... और सब्जियां लाऊंगा।"
रीता मुस्कुराई। "हां, लेकिन अगली बार बैंगन की तरह लंबा रखना।" रमेश हंस पड़ा और चला गया। रीता ने सब्जियां रखीं, लेकिन मन ही मन सोच रही थी – कल का इंतजार कैसे होगा?
