शबनम नाम की वो औरत घर में काम करती थी पिछले आठ साल से। उम्र ४० के करीब, लेकिन शरीर अभी भी जवानी की तरह तगड़ा और आकर्षक – पतली कमर, भरे हुए स्तन, गोल गाँड, और वो गोरी चिकनी त्वचा जो पसीने से चमक उठती। बाल लंबे, काले, हमेशा जूड़े में बंधे, लेकिन जब काम करते वक्त कुछ बाल छूट जाते, तो वो चेहरा और भी मोहक लगता। उसके पति ने सालों पहले छोड़ दिया था, कोई बच्चा नहीं, बस अकेली जिंदगी और रोज़ का काम। मालिक का बेटा आरव, २४ साल का, MBA करके घर लौटा था। दिनभर घर पर रहता, बिजनेस की फाइलें देखता, लेकिन उसकी आँखें हमेशा शबनम पर टिकी रहतीं।
शबनम को पता था। वो महसूस करती थी कि आरव कितनी बार आँगन में खड़े होकर उसे देखता है – जब वो झुककर फर्श पोछती, साड़ी का पल्लू सरक जाता, ब्लाउज का घेरा नीचे आ जाता, और उसके स्तन की गहराई साफ़ झलक जाती। वो शरमाती, लेकिन अंदर से एक आग सी जल उठती। सालों से किसी ने उसे औरत की तरह नहीं छुआ था। वो खुद को रोकती, लेकिन मन बार-बार कहता – “ये गलत है, लेकिन कितना सही लग रहा है।”
एक दोपहर, मालिक-मालकिन शहर गए थे किसी रिश्तेदार के यहाँ, शाम तक लौटने वाले थे। घर में सिर्फ आरव और शबनम। बिजली चली गई, गर्मी से हालत खराब। शबनम किचन में बर्तन माँज रही थी। उसकी साड़ी पसीने से भीगी, ब्लाउज पारदर्शी हो गया था, ब्रा की लेस साफ दिख रही थी। आरव किचन के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। शबनम ने महसूस किया, लेकिन कुछ नहीं बोली।
आरव धीरे से अंदर आया। “शबनम… पानी…” उसकी आवाज भारी थी। शबनम मुड़ी, गिलास में पानी डाला, लेकिन हाथ काँप रहे थे। गिलास देते वक्त उनके हाथ छुए। आरव ने गिलास नहीं लिया, बल्कि शबनम का कलाई पकड़ लिया। “शबनम… मैं और नहीं सह पा रहा।” शबनम ने नजरें नीची कीं, “आरव बाबू… ये ठीक नहीं… मैं तुम्हारी नौकरानी हूँ।” लेकिन उसकी आवाज में विरोध कम, चाहत ज्यादा थी।
आरव ने उसे अपनी तरफ खींचा। शबनम का शरीर उसके सीने से सट गया। आरव ने धीरे से उसके गाल पर हाथ फेरा, फिर गर्दन पर। शबनम की साँसें तेज हो गईं। आरव ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए – पहला चुंबन धीमा, गहरा। शबनम ने पहले विरोध किया, लेकिन फिर आँखें बंद कर लीं। चुंबन लंबा होता गया, जीभें मिलीं, साँसें एक हो गईं। आरव के हाथ शबनम की कमर पर सरके, फिर पीठ पर। उसने साड़ी का पल्लू नीचे खींचा। शबनम ने रोकने की कोशिश नहीं की।
आरव ने शबनम को किचन की काउंटर पर बिठा दिया। साड़ी पूरी ऊपर कर दी। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। शबनम के स्तन बाहर आए – बड़े, भरे हुए, निप्पल सख्त और गहरे गुलाबी। आरव ने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा, हल्के से मसला। शबनम कराह उठी, “आह्ह… आरव… धीरे…” लेकिन उसकी आवाज में दर्द नहीं, सुख था। आरव ने एक निप्पल को मुँह में लिया, जीभ से घुमाया, चूसा। शबनम की पीठ काँप गई, हाथ आरव के बालों में फँस गए। दूसरा स्तन दबाते हुए आरव ने नीचे हाथ सरकाया। पेटीकोट की नाड़ी खोली, पैंटी सरकाई। शबनम का चूत पहले से गीला था, झांटें साफ़ की हुईं। आरव ने उंगली से छुआ, फिर अंदर डाली। शबनम की कमर ऊपर उठी, “हाय… आरव… और अंदर…”
आरव ने घुटनों पर बैठकर शबनम की जांघें फैलाईं। जीभ से चूत को चाटना शुरू किया – धीरे-धीरे, क्लिटोरिस पर जीभ घुमाते हुए। शबनम की कराहें तेज हो गईं, “आह्ह… हाँ… ऐसे ही… चाटो मेरी चूत को…” वो काउंटर पर पीठ टेककर लेट गई, टांगें फैलीं। आरव ने जीभ अंदर डाली, चूसने लगा। शबनम का शरीर काँपने लगा, पहला ऑर्गेज्म आया – वो जोर से कराही, रस बहा।
आरव उठा, अपना पैंट उतारा। उसका लंड सख्त, मोटा, नसें उभरी हुईं। शबनम ने हाथ बढ़ाकर पकड़ा, सहलाया। “इतना बड़ा… आरव… धीरे से…” आरव ने शबनम को काउंटर से उतारा, उसे घुमाकर पीछे से लगाया। शबनम ने काउंटर पकड़ा, कमर झुकाई। आरव ने लंड चूत पर रगड़ा, फिर धीरे से अंदर धकेला। शबनम चीख पड़ी, “हाय रब्बा… फाड़ रहा है…” लेकिन पीछे धक्का दिया। आरव ने पूरी तरह अंदर डाला, फिर धक्के मारने लगा – धीमे से तेज। हर धक्के में थप-थप की आवाज़, शबनम की कराहें।
आरव ने एक हाथ से शबनम के स्तन दबाए, दूसरे से क्लिटोरिस रगड़ा। शबनम बोली, “जोर से… मारो… मेरी चूत फाड़ दो… मैं तुम्हारी हूँ…” आरव ने स्पीड बढ़ाई, ग@@ड पर थप्पड़ मारा। शबनम का दूसरा ऑर्गेज्म आया, शरीर काँपकर लहराया। आरव भी रुक नहीं पाया – जोर से धक्का मारा, सारा वीर्य शबनम के अंदर छोड़ दिया।
दोनों थककर फर्श पर बैठ गए। शबनम की आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर संतुष्टि। आरव ने उसे गले लगाया। “शबनम… अब रोज़ ऐसा होगा। तू मेरी है।” शबनम ने बस सिर उसके सीने पर रख दिया। “हाँ आरव… लेकिन किसी को पता नहीं चलना चाहिए।”
उस दिन से घर का राज़ बन गया। शबनम काम करती, लेकिन आरव की एक इशारे पर सब छोड़ देती। किचन, बाथरूम, छत – हर जगह उनकी मुलाकातें होतीं। शबनम अब काम वाली नहीं, आरव की औरत बन चुकी थी – गुप्त, गहरी, और बेकाबू।
