ससुराल में चु#@#ई

 रात के ग्यारह बज चुके थे। घर में सन्नाटा छाया हुआ था, सिर्फ दूर कहीं छत पर पंखे की हल्की-हल्की आवाज और कभी-कभी सड़क से गुजरती गाड़ी की दूर होती धुन सुनाई दे रही थी। देविका अपने कमरे में अकेली लेटी हुई थी, पति रवि ऑफिस के काम से दो दिन के लिए बाहर गए हुए थे। ससुराल में सिर्फ सासू माँ और जीजा जी थे – वही जीजा जी जिनका नाम था अजय। अजय भाभी को हमेशा थोड़ा अलग नजरों से देखते थे, लेकिन कभी किसी ने इस बात को शब्दों में नहीं निकाला। आज रात देविका का मन कुछ बेचैन था। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था, और वह उसे बार-बार संभाल रही थी, जैसे कोई अनकही उत्तेजना उसके शरीर में धीरे-धीरे जाग रही हो।



अचानक दरवाजे पर हल्की खटखटाहट हुई। देविका चौंकी, "कौन है?" उसने धीमे से पूछा। बाहर से अजय की गहरी, थोड़ी रुकी हुई आवाज आई, "भाभी, मैं हूँ... अजय। थोड़ा पानी चाहिए था, लेकिन किचन का लाइट खराब है। क्या आपका गिलास दे सकती हैं?" देविका का दिल जोर से धड़का। इतनी रात में जीजा जी का कमरे के दरवाजे पर आना... कुछ तो गड़बड़ था। फिर भी वह उठी, साड़ी को ठीक किया और दरवाजा खोला। अजय सामने खड़े थे, सिर्फ बनियान और पाजामा में। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो देविका को सहमा भी रहा था और आकर्षित भी कर रहा था।


"आइए अंदर, गिलास ले लीजिए," देविका ने धीरे से कहा और पीछे हटी। अजय अंदर आए, लेकिन दरवाजा बंद नहीं किया। कमरे की मद्धिम रोशनी में उनका चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था। देविका ने गिलास आगे बढ़ाया, लेकिन हाथ काँप रहे थे। अजय ने गिलास लेते हुए जानबूझकर उसके हाथ को छुआ। वह स्पर्श बिजली-सा लगा। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देखते रह गए। "भाभी... आप आज बहुत सुंदर लग रही हैं," अजय ने धीरे से कहा, आवाज में एक अजीब सी गहराई थी। देविका का गला सूख गया। "अजय... इतनी रात में... आपको सो जाना चाहिए," उसने झिझकते हुए कहा, लेकिन उसकी आवाज में दृढ़ता नहीं थी।


अजय एक कदम और आगे बढ़े। अब उनके बीच सिर्फ एक हाथ की दूरी थी। "भाभी, मैं जानता हूँ कि रवि भैया नहीं हैं। और मैं भी... कई सालों से आपको देख रहा हूँ। आपकी वो मुस्कान, वो चलने का अंदाज... सब कुछ मुझे पागल कर देता है।" देविका पीछे हटी, लेकिन उसकी पीठ दीवार से जा टकराई। "नहीं अजय... ये गलत है। मैं आपकी भाभी हूँ... ये पाप है," उसने कहा, लेकिन उसकी साँसें तेज हो रही थीं। अजय ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। "पाप तभी होता है जब दिल न माने। लेकिन मेरा दिल तो आपका नाम ही पुकारता है, भाभी।"


देविका की आँखें नम हो गईं। वह खुद को रोकना चाहती थी, लेकिन शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी। अजय ने धीरे से उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और अपनी उँगलियों से उसके गालों को सहलाया। फिर धीरे-धीरे उसके होंठों के पास अपना मुँह ले गए। पहला रस चूसना हल्का-सा था, जैसे कोई मीठा आम चखा जा रहा हो। देविका ने आँखें बंद कर लीं। उसका शरीर काँप रहा था। अजय का रस चूसना गहरा होता गया। उनकी जीभें एक-दूसरे से खेलने लगीं, जैसे दो रसीले फल आपस में रस मिला रहे हों। देविका के मन में हजार सवाल उठ रहे थे – ये सही है या गलत? लेकिन शरीर अब आज्ञा नहीं मान रहा था।


अजय ने धीरे से देविका की साड़ी का पल्लू खींचा। साड़ी सरककर गिर गई। सामने दो बड़े-बड़े तरबूज थे, जो सख्त अंगूरों के साथ थिरक रहे थे। अजय ने उन्हें दोनों हाथों से थामा, जैसे कोई भारी फल तोल रहा हो। "भाभी... कितने रसीले हैं ये," उसने फुसफुसाया। देविका की साँसें तेज हो गईं। अजय ने एक तरबूज को मुँह में लिया, अंगूर को धीरे-धीरे चूसा। देविका के मुँह से हल्की-सी आह निकली। "अजय... आह... मत रुको..." उसने खुद को हैरान करते हुए कहा।


अजय ने देविका को बिस्तर पर धीरे से लिटाया। उनकी उँगलियाँ अब देविका की कमर पर, फिर पेट पर, फिर नीचे की ओर सरक रही थीं। जहाँ हल्की-हल्की झाड़ी थी, वहाँ अजय ने उँगलियाँ फेरनी शुरू कीं। देविका की खाई पहले से ही गीली हो चुकी थी, जैसे बारिश के बाद कोई गहरा बगीचा रस से भरा हो। अजय ने अपनी उँगली धीरे से अंदर डाली। देविका का शरीर तन गया। "अजय... धीरे... पहली बार..." उसने काँपती आवाज में कहा। अजय चौंके। "भाभी... मतलब... रवि भैया ने...?" देविका ने शर्म से सिर हिलाया। "नहीं... वो कभी... पूरी तरह नहीं..."


अजय की आँखों में एक नई चमक आ गई। "तो आज... मैं आपकी वो मुहर तोड़ूँगा, भाभी। धीरे-धीरे... बहुत प्यार से।" उन्होंने अपना पाजामा उतारा। सामने एक लंबा, मोटा और सख्त केला खड़ा था, जो धड़क रहा था। देविका ने उसे देखा और सिहर उठी। "अजय... वो... बहुत बड़ा है..." अजय मुस्कुराए। "चिंता मत करो, भाभी। आपकी खाई इसे पूरा अंदर ले लेगी।"


अजय ने देविका की टाँगें धीरे से फैलाईं। केले का सिरा खाई के मुहाने पर रखा। देविका की साँसें रुक गईं। अजय ने धीरे से धक्का दिया। पहले सिरा अंदर गया। देविका चीखी, "आह... दर्द हो रहा है..." लेकिन अजय रुके नहीं। धीरे-धीरे, बहुत धैर्य से पूरा केला अंदर सरकने लगा। देविका की आँखों से आँसू निकल आए। "अजय... बस... रुक जाओ..." लेकिन अजय ने उसके होंठों पर रस चूसना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे दर्द कम होने लगा। जगह जगह रस बनने लगा। अब खाई उस मोटे केले को पूरा निगल रही थी।


अजय ने खुदाई शुरू की। पहले धीमे-धीमे, फिर गति बढ़ाई। हर धक्के के साथ देविका की कराह बढ़ती गई। "आह... अजय... और गहराई में... हाय... कितना अच्छा लग रहा है..." कमरे में सिर्फ उनकी साँसों की आवाज, चमड़ी की टकराहट और बिस्तर की हल्की चरमराहट थी। अजय ने देविका को पलटा, अब वो घुटनों के बल थी। गोंडा ऊपर उठा हुआ था। अजय ने पीछे से केला फिर से खाई में डाला। इस बार और गहराई तक। देविका के मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं – "हाय... मार डालोगे मुझे... आह... और जोर से..."


अजय की गति अब तेज हो गई थी। दोनों का पसीना एक-दूसरे में मिल रहा था। देविका का शरीर काँपने लगा। "अजय... कुछ हो रहा है... हाय... रस निकलने वाला है..." अजय ने और जोर से खुदाई की। अचानक देविका का शरीर सख्त हो गया। खाई सिकुड़ने लगी। एक लंबी, गहरी आह के साथ उसका रस निकला। तरबूज काँप रहे थे। अजय भी अब रुक नहीं पाए। "भाभी... मैं भी... आ रहा हूँ..." और एक जोरदार धक्के के साथ उनका रस देविका की खाई में भर गया। दोनों थककर एक-दूसरे पर गिर पड़े।


काफी देर तक वे ऐसे ही लेटे रहे। साँसें धीमी हुईं। अजय ने देविका के माथे पर रस चूसा। "भाभी... अब ये राज हमारे बीच रहेगा।" देविका ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, "हाँ अजय... लेकिन अब तुम्हें हर रात... मेरी खाई की खुदाई करनी होगी।" दोनों हँसे। रात अभी बाकी थी, और उनका नया रिश्ता अभी-अभी शुरू हुआ था।