मेरा नाम राहुल है, और मैं दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में रहता था, जहां सड़कें संकरी होती थीं और घरों की बालकनियां इतनी करीब कि पड़ोसियों की हलचल आसानी से महसूस होती थी। कॉलेज का पहला साल था, इंजीनियरिंग की पढ़ाई में व्यस्त, लेकिन मेरा मन हमेशा उन छोटी-मोटी घटनाओं में उलझता जो जीवन को रंगीन बनातीं। एक दिन क्लासरूम में, जब प्रोफेसर जटिल गणित के सूत्र समझा रहे थे, मेरी नजर पिछली बेंच पर बैठी उस लड़की पर पड़ी, उसके बाल हल्के से लहराते, चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो पूरी क्लास की उबासी को भुला देती। उसका नाम प्रिया था, वो भी नई छात्रा थी, उसके घर वाले पारंपरिक सोच के, जहां लड़कियों को शाम होने से पहले घर पहुंचना पड़ता और दोस्ती की बातें छुपाकर करनी पड़तीं। हमारी पहली बात ग्रुप प्रोजेक्ट के दौरान हुई, जब वो मेरे पास आई और पेन मांगा, उसकी आवाज इतनी मधुर कि जैसे कोई मीठा फल का रस टपक रहा हो, हमने प्रोजेक्ट पर चर्चा की, लेकिन मेरे मन में उसके बारे में विचार घूमने लगे, उसकी हंसी की ध्वनि, उसके हाथों की नरमी, और क्लास के बाद कैफेटेरिया में चाय साझा करते हुए उसकी आंखों की चमक जो मुझे अपनी ओर खींचती रही, लेकिन मैं खुद को रोकता क्योंकि घर में मां सिखातीं कि पढ़ाई पहले, ऐसी दोस्तियां बाद में, और समाज की नजरें हमेशा देखती रहतीं।
धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ीं, क्लास के बाद लाइब्रेरी में किताबों के बहाने, जहां हवा में पुरानी किताबों की गंध फैली रहती और दूर से छात्रों की फुसफुसाहट सुनाई देती, प्रिया के घर वाले उसे ज्यादा बाहर नहीं जाने देते, इसलिए हम कैंपस के कोनों में समय बिताते, एक शाम बारिश में छतरी के नीचे खड़े होकर, उसकी साड़ी का पल्लू हवा में लहराता, और उसकी इत्र की खुशबू बारिश की मिट्टी से मिलकर एक अनोखा सुगंधित मिश्रण बनाती, मैंने उसे कॉफी के लिए पूछा, वो शर्मा कर बोली कि घर वाले डांटेंगे, लेकिन फिर भी चली आई, कैफेटेरिया में घंटों बातें हुईं, उसके बचपन की शरारतें, मेरी महत्वाकांक्षाएं, और बीच-बीच में नजरें मिलना जो जैसे अनकहे वादों का संकेत देता, मैं उसके करीब बैठा, हमारे कंधे छूते, उस स्पर्श से मेरे शरीर में एक हल्की सी सिहरन दौड़ी, लेकिन मैंने काबू किया क्योंकि जानता था कि जल्दबाजी से रिश्ते टूट सकते हैं, प्रिया भी शायद यही सोचती, उसकी सांसें तेज होतीं, वो बार-बार अपनी साड़ी संवारती जैसे शर्म छुपाने की कोशिश में। उस शाम घर लौटते हुए उसके विचारों ने मुझे घेर लिया, उसकी मुस्कान की याद, होंठों की हल्की कांपन, और मन में सवाल कि क्या ये सिर्फ दोस्ती है या कुछ ज्यादा, लेकिन घर की रूढ़िवादी परवरिश ने द्वंद्व पैदा किया, शादी से पहले ऐसी निकटता गलत मानी जाती है, फिर भी दिल मानने को तैयार नहीं।
कॉलेज फेस्ट की रात आई, जहां लाइट्स की चमक, संगीत की धुनें और भीड़ का उत्साह सब मिलकर एक जादुई वातावरण रचते, प्रिया सहेलियों के साथ आई, लाल सलवार सूट में, जो उसकी गोरी त्वचा पर चमकता, मैंने उसे देखा और दिल की धड़कनें तेज हो गईं, हम मिले, मैंने डांस के लिए कहा, वो मना करने लगी कि लोग क्या कहेंगे, घर वाले पसंद नहीं करेंगे, लेकिन मेरी आंखों की विनती से मान गई, डांस फ्लोर पर कदम मिलाते, मेरे हाथ उसकी कमर पर हल्के से रखे, वो स्पर्श जैसे बिजली का करंट, उसकी सांसें मेरे चेहरे पर गर्म महसूस होतीं, आंखों में खुशी, डर और चाहत का मिश्रण, हमारे शरीर छूते-छूटते, मैं उसके आम की नरमी महसूस कर रहा था जो मेरे सीने से टकराती, लेकिन जगह सार्वजनिक होने से खुद को रोका, प्रिया के गाल लाल हो गए, डांस खत्म होने पर वो अलग हुई लेकिन उंगलियां मेरे हाथ में रुकी रहीं जैसे छोड़ना नहीं चाहतीं। उस रात नींद नहीं आई, स्पर्श की याद, उसकी खुशबू, और वो पल मन में बस गए, लेकिन डर भी था कि अगर घर वालों को पता चला तो प्रिया की पढ़ाई रुक सकती है, हमारी फैमिलीज रूढ़िवादी हैं, फिर भी अगले दिन मिलने पर बातें वैसी ही बहती रहीं, लेकिन अब एक गहरी निकटता थी जैसे हम एक-दूसरे के दिल पढ़ लेते।
एक शाम पार्क में बैठे, सूरज डूबता हुआ, हवा ठंडी, पेड़ों की पत्तियां सरसरातीं, दूर ट्रैफिक की ध्वनियां, प्रिया मेरे बगल में, बाल उड़ते, मैंने उसका हाथ पकड़ा, वो चौंकी लेकिन मुस्कुराई, उंगलियां उलझीं, हम चुप बैठे, स्पर्श से गर्मी दौड़ी, मैं उसके चेहरे को देखता, होंठों की नरमी, मन में विचार कि रस चूसना चाहिए, लेकिन रुका क्योंकि वो तैयार नहीं लगी, उसके मन में द्वंद्व, वो बोली राहुल ये गलत है, समाज क्या कहेगा, लेकिन आंखें कुछ और कहतीं, हम बातें करते रहे, सपनों की, महत्वाकांक्षाओं की, साइलेंस हमें करीब लाता, शाम ढलते मैंने उसके गाल पर स्पर्श किया, वो शर्मा कर नीचे देखी, लेकिन सांसें बतातीं कि वो भी महसूस कर रही है, घर लौटकर सोचा कि ये प्यार है या आकर्षण, लेकिन जो भी हो रोकना मुश्किल लग रहा था, प्रिया के मैसेज रातों में आते, बातें गहरातीं, लेकिन झिझक बनी रहती जैसे कोई दीवार हो।
छुट्टी के दिन प्रिया ने बुलाया, घर वाले बाहर, मैं उसके घर गया, रिस्क था लेकिन दिल नहीं माना, घर छोटा, पारंपरिक सज्जा, देवताओं की तस्वीरें, अगरबत्ती की खुशबू, प्रिया घरेलू कपड़ों में, टी-शर्ट पजामा जो उसके शरीर की आकृति उभारता, हम लिविंग रूम में बैठे, चाय पीते बातें, लेकिन हवा में टेंशन, मैं करीब सरका, कंधे पर सिर रखा, वो हिली नहीं, फिर देखा, आंखों में चाहत और डर, बोली राहुल ये नहीं, अगर कोई आया तो, लेकिन आवाज कांपती, मैंने शांत किया, धीरे से होंठों पर रस चूसना शुरू किया, नरम जैसे दुनिया रुक गई, सांसें मिलीं, हाथ पीठ पर दबाए, फिर अलग हुई, शर्मा कर बोली शादी से पहले गलत, लेकिन शरीर कुछ और कहता, वो फिर करीब आई, इस बार गहरा रस चूसना, जीभें छूतीं, हाथ पीठ पर सरके, उसके आम की नरमी महसूस, लेकिन रुका क्योंकि आगे जाना सही नहीं, प्रिया सांस लेते बोली बस इतना, लेकिन आंखें चाहत भरीं।
उसके बाद मीटिंग्स बढ़ीं, सावधानी से, एक बार होटल रूम में, कमरा साधारण, सफेद चादर, हल्की लाइट्स, बाहर ट्रैफिक, अंदर आए, दरवाजा बंद, प्रिया गले लगी, गर्माहट दौड़ी, मैंने बेड पर लिटाया, वो लेटी बाल बिखरे, मैं ऊपर झुका, गले पर रस चूसना, त्वचा रेशम जैसी, सांसें तेज, हाथ बालों में उलझे, कपड़े ऊपर सरकाए, पेट पर हाथ फेरा, सिहरन, बोली रुक, ज्यादा हो रहा, लेकिन चाहत देख नहीं रुका, धीरे आम पर हाथ रखा, तरबूज नरम, अंगूर सख्त, वो कराहती, फिर उठी बोली घर की इज्जत, इंतजार करें, लेकिन शरीर कांपता, फिर रस चूसना गहरा, गंध पसीने की मिली नशा, मैं महसूस करता गाजर की सख्ती, लेकिन रोका क्योंकि वो तैयार नहीं, गले लगकर लेटे, बातें कीं, लेकिन आग सुलगती रही।
बारिश की रात, प्रिया का फोन, अकेली डर लग रहा, मैं गया, दरवाजा खुला, वो भीगी, कपड़े चिपके, आम की आकृति दिखती, गले लगाया, गर्माहट, कमरे में बेड पर बैठे, रस चूसना शुरू, इस बार नहीं रुकी, हाथ शर्ट बटन खोले, मैंने कपड़े उतारे, त्वचा गोरी नरम, आम पर रस चूसना, अंगूर मुंह में, कराहती, हाथ पैंट पर, केला छुआ सख्त, मैंने लिटाया, पैरों बीच आया, खाई पर हाथ फेरा गीली, झाड़ी हल्की छूती, उंगली डाली सिहरन, बोली धीरे, लॉजिक से वो लेटी मैं ऊपर, हाथ नीचे उंगली अंदर-बाहर, कराह, फिर केला निकाला खाई पर रगड़ा, तैयार, धीरे अंदर डाला दर्द से चीख, लेकिन रिदम आया, खुदाई शुरू, पिछवाड़ा पर हाथ धक्के, पीठ पर नाखून, कमरे में सांसें, बेड चरमराहट, बाहर बारिश, सब संगीत, वो रस निकलना की ओर, कांपन, अंत में दोनों साथ, लेटे पसीने भीगे, संतुष्टि लेकिन गिल्ट, अपरिहार्य था।
