शहर की उस तंग गली के आखिरी मोड़ पर समीर का छोटा सा कमरा था, जहाँ से ठीक सामने वाले घर की बालकनी साफ नजर आती थी। उस घर में श्रद्धा भाभी अपने पति के साथ रहती थीं, जो अक्सर व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते थे। श्रद्धा भाभी का व्यक्तित्व किसी ढलती शाम की रेशमी धूप जैसा था, जिसमें शांति भी थी और एक अनकही तड़प भी। उनके शरीर की बनावट ऐसी थी कि देखने वाले की सांसें थम जाएं; उनकी कमर का वह लचीलापन और साड़ी के नीचे दबे उनके पुष्ट और उभरे हुए विशाल तरबूज किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थे। समीर अक्सर अपनी खिड़की से उन्हें पौधों को पानी देते हुए देखता, और जब भी वह झुकतीं, उनके तरबूजों की गहरी घाटी और उनके बीच का वह गहरा अंतराल समीर के मन में हलचल पैदा कर देता था।
श्रद्धा भाभी के बदन का हर हिस्सा जैसे किसी कलाकार की उत्कृष्ट कृति हो। उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी, जैसे वह किसी अपने की तलाश में हों। जब वह चलती थीं, तो उनके भारी और गोल पिछवाड़े की लयबद्ध हरकत समीर के भीतर की दबी हुई इच्छाओं को जगा देती थी। वह अक्सर कल्पना करता कि साड़ी के उस महीन कपड़े के नीचे उनकी त्वचा कितनी रेशमी होगी और उनके तरबूजों के ऊपर मौजूद वे छोटे-छोटे मटर के दाने कितने सख्त और संवेदनशील होंगे। श्रद्धा भाभी को भी शायद समीर की नजरों का अहसास था, लेकिन उन्होंने कभी ऐतराज नहीं जताया, बल्कि कभी-कभी वह जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला छोड़ देती थीं, जिससे समीर की धड़कनें और तेज हो जाती थीं।
उन दोनों के बीच आकर्षण का जन्म बहुत ही खामोशी से हुआ था। एक दोपहर जब तेज गर्मी पड़ रही थी, समीर के घर की मोटर खराब हो गई और वह पानी मांगने श्रद्धा भाभी के घर गया। भाभी ने दरवाजा खोला, वह उस वक्त एक पतली नाइटी में थीं जिसके अंदर से उनके विशाल तरबूज साफ झलक रहे थे और उनके ऊपर उभरे हुए मटर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। समीर उन्हें बस देखता रह गया, और श्रद्धा ने भी अपनी नजरें नहीं झुकाईं। उस पल की खामोशी में बहुत कुछ कह दिया गया था। दोनों के बीच एक अनकहा जुड़ाव महसूस हुआ, जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं थी। समीर के मन में एक अजीब सी झिझक थी, लेकिन श्रद्धा की आँखों में छिपा आमंत्रण उस झिझक को धीरे-धीरे खत्म कर रहा था।
उस दिन के बाद मुलाकातों का सिलसिला बढ़ गया। एक शाम जब बाहर घनघोर सन्नाटा था और बिजली कटी हुई थी, समीर श्रद्धा भाभी के घर पहुँचा। कमरे में मोमबत्ती की हल्की रोशनी थी जो श्रद्धा के बदन पर पड़कर उसे और भी कामुक बना रही थी। समीर ने धीरे से अपना हाथ उनकी मखमली कमर पर रखा। श्रद्धा का पूरा शरीर एक बार कांप उठा, लेकिन उन्होंने समीर का हाथ हटाया नहीं। समीर ने अपनी उंगलियों को उनकी साड़ी के किनारे से अंदर डाला, जहाँ उनकी गर्म त्वचा का स्पर्श पाकर समीर का भीतर का खीरा पूरी तरह से अकड़ गया और अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगा। श्रद्धा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी, जिससे कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया।
समीर ने धीरे-धीरे उनके होठों के रस को पीना शुरू किया। उनके होठों की मिठास समीर के भीतर एक आग लगा रही थी। समीर के हाथ अब उनके भारी तरबूजों पर पहुँच चुके थे, जिन्हें वह अपनी हथेलियों में भरकर धीरे-धीरे दबाने लगा। श्रद्धा के मुंह से दबी-दबी सिसकियां निकलने लगीं और उन्होंने समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं। समीर ने उनके तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर को अपने दांतों से हल्का सा सहलाया, जिससे श्रद्धा का शरीर धनुष की तरह तन गया। वह बेकाबू होकर समीर के जिस्म से चिपक गईं, और समीर महसूस कर सकता था कि उनकी रेशमी खाई अब गीली होने लगी थी, जैसे वह किसी गहरी खुदाई के लिए तैयार हो रही हो।
उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। समीर ने श्रद्धा के कपड़े धीरे-धीरे उतार दिए और अब वह पूरी तरह से कुदरती अवस्था में उनके सामने थीं। उनके शरीर के निचले हिस्से में मौजूद घने बाल उनकी गहराई को और भी रहस्यमयी बना रहे थे। समीर ने अपना सख्त और लंबा खीरा बाहर निकाला, जिसे देखकर श्रद्धा की आँखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने धीरे से समीर के खीरे को अपने हाथ में लिया और उसे सहलाने लगीं। फिर उन्होंने अपना मुंह खोलकर उस खीरे को चूसना शुरू किया, जिससे समीर के पूरे बदन में बिजली की लहर दौड़ गई। श्रद्धा के मुंह की गर्मी और उनकी जीभ का स्पर्श समीर को पागल कर रहा था, और उसे महसूस हुआ कि उसका रस बस निकलने ही वाला है।
लेकिन समीर ने खुद को रोका और श्रद्धा को बिस्तर पर लेटा दिया। उसने उनकी टांगों को फैलाया और उनकी गीली और नन्ही खाई को अपनी जीभ से चाटना शुरू किया। श्रद्धा बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में भींचने लगीं और उनकी कमर हवा में उछलने लगी। समीर की जीभ उनकी खाई के हर कोने को गहराई से खोज रही थी। फिर समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई में खुदाई शुरू की, जिससे श्रद्धा का पूरा शरीर झटके लेने लगा। उनकी उत्तेजना इस कदर बढ़ गई थी कि वह बस अब उस बड़े खीरे का अपनी खाई के भीतर प्रवेश चाहती थीं। उन्होंने समीर को अपनी ओर खींचा और जोर-जोर से हांफते हुए उसे अपने ऊपर आने का इशारा किया।
समीर ने श्रद्धा को सामने से खोदना शुरू किया। जैसे ही उसका सख्त खीरा उनकी तंग और गर्म खाई के भीतर समाया, श्रद्धा के मुंह से एक लंबी चीख निकल गई। उनकी खाई इतनी तंग थी कि समीर को उसे अंदर तक धकेलने के लिए काफी जोर लगाना पड़ रहा था। हर धक्के के साथ श्रद्धा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मटर समीर के सीने से रगड़ खा रहे थे। यह खुदाई बहुत ही गहरी और लयबद्ध थी। कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाजें गूंज रही थी। श्रद्धा ने अपनी टांगें समीर की कमर के चारों ओर कस लीं ताकि वह उस खीरे की गहराई को अपने भीतर के सबसे आखिरी छोर तक महसूस कर सकें।
कुछ देर तक सामने से खोदने के बाद, समीर ने श्रद्धा को घुमा दिया और उन्हें बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह उन्हें उनके भारी पिछवाड़े की तरफ से खोदने के लिए तैयार था। पीछे से उनके उभरे हुए पिछवाड़े का नजारा समीर को और भी उत्तेजित कर रहा था। उसने दोबारा अपना खीरा उनकी खाई में उतारा और तेज धक्के लगाने शुरू किए। श्रद्धा का शरीर हर धक्के पर आगे की ओर झुक जाता और वह जोर-जोर से कराहने लगतीं। खुदाई अब अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। समीर के पसीने की बूंदें श्रद्धा की पीठ पर गिर रही थीं। दोनों ही आनंद के उस समंदर में गोते लगा रहे थे जहाँ सिर्फ जिस्मों की प्यास और रूह का सुकून था।
अंत में, जब दोनों की उत्तेजना अपनी चरम सीमा को पार कर गई, समीर ने एक आखिरी और बहुत गहरा धक्का लगाया। उस पल श्रद्धा की खाई के भीतर समीर के खीरे से रस निकलने लगा, और ठीक उसी समय श्रद्धा का भी रस छूट गया। दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए बिस्तर पर ढेर हो गए। उनकी सांसें अभी भी तेज थीं और शरीर पसीने से तर-बतर था। उस गहरी खुदाई के बाद जो सुकून उनके चेहरों पर था, वह अनमोल था। श्रद्धा ने समीर को कसकर गले लगा लिया और उसके माथे को चूमा। उस रात उस कमरे में सिर्फ जिस्मों का मिलन नहीं हुआ था, बल्कि दो अधूरी प्यास ने एक-दूसरे को मुकम्मल किया था।