बारिश की तेज़ बूंदें खिड़कियों पर थपथपा रही थीं और पुरानी हवेली की लकड़ी की छत से पानी टपकने की आवाज़ आ रही थी। नेहा अकेली थी, उसकी साड़ी भीगकर शरीर से चिपक गई थी, ब्लाउज पारदर्शी हो चुका था और उसकी स्त@#@ की पूरी आकृति साफ़ नज़र आ रही थी। वह कमरे में घूम रही थी, हाथ में मोमबत्ती लिए, क्योंकि बिजली चली गई थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई – तेज़, लेकिन धीमी। नेहा ने डरते-डरते दरवाज़ा खोला। सामने एक अनजान आदमी खड़ा था – लंबा, चौड़ा कंधा, बारिश में भीगा हुआ, सफ़ेद कुर्ता उसकी छाती से चिपका हुआ था जिससे उसकी मजबूत मांसपेशियाँ उभरकर दिख रही थीं। उसकी आँखें नेहा पर टिक गईं, जैसे कोई पुरानी याद ताज़ा हो गई हो।
“माफ़ कीजिए… बारिश में फंस गया हूँ… थोड़ी देर शेल्टर चाहिए,” उसने गहरी आवाज़ में कहा। नेहा ने हिचकिचाते हुए उसे अंदर आने दिया। कमरे में सिर्फ़ मोमबत्ती की रोशनी थी, जो दोनों के चेहरों पर नाच रही थी। आदमी ने अपना कुर्ता उतारकर टांग दिया, उसकी नंगी छाती पर पानी की बूंदें चमक रही थीं। नेहा की नज़रें बार-बार वहाँ जा रही थीं, और वह खुद को रोक नहीं पा रही थी। आदमी ने मुस्कुराकर कहा, “आप भी भीग गई हैं… साड़ी बदल लीजिए, नहीं तो ठंड लग जाएगी।” नेहा के गाल लाल हो गए, लेकिन वह कुछ नहीं बोली, बस अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करने लगी जिससे उसकी कमर और नाभि और ज़्यादा उभर आई।
धीरे-धीरे दोनों सोफ़े पर बैठ गए। बारिश की आवाज़ के बीच चुप्पी थी, लेकिन उस चुप्पी में कुछ गहरा हो रहा था। आदमी ने अपना हाथ नेहा की ओर बढ़ाया और धीरे से उसकी उंगलियाँ थामीं। नेहा का शरीर सिहर गया, लेकिन उसने हाथ नहीं छोड़ा। उसकी उंगलियाँ नेहा की हथेली पर घूमने लगीं, जैसे कोई पुरानी लय याद आ रही हो। नेहा ने फुसफुसाया, “आप कौन हैं… मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि हम पहले मिल चुके हैं?” आदमी ने जवाब दिया, “शायद किसी सपने में… या किसी पिछले जन्म में।” उसकी बात सुनकर नेहा की साँसें तेज़ हो गईं।
आदमी ने धीरे से नेहा को अपनी तरफ़ खींचा। नेहा ने विरोध नहीं किया, बल्कि खुद आगे बढ़ गई। उनका पहला चु@#@न इतना नरम और गहरा था कि नेहा की आँखें बंद हो गईं। आदमी की जीभ नेहा के होंठों पर फिसली, फिर अंदर घुसी। नेहा ने आह भरी… “उफ्फ… इतना मीठा…” आदमी के हाथ नेहा की कमर पर फिसले, फिर ऊपर उठकर उसके स्त@#@ को सहलाने लगे। ब्लाउज के कपड़े गीले होने से नि@#@ल साफ़ महसूस हो रहे थे। आदमी ने ब्लाउज के बटन खोले, नेहा की चू@#@ी बाहर आ गईं – नरम, गोल, बारिश की ठंडक से सख्त। उसने एक को मुंह में लिया, नि@#@ल को धीरे-धीरे चूसा। नेहा ने सिर पीछे करके लंबी कराह ली… “आआह्ह… और गहराई से… उफ्फ…”
नेहा अब खुद को पूरी तरह छोड़ चुकी थी। उसने आदमी की पैंट की बेल्ट खोली, ज़िप नीचे की। उसका ल@#ंड बाहर आया – सख्त, गर्म, नसों से भरा हुआ। नेहा ने उसे हाथ में लिया, धीरे-धीरे सहलाया, ऊपर-नीचे करती हुई। आदमी की साँसें तेज़ हो गईं। नेहा ने घुटनों के बल बैठकर उसे मुंह में लिया, जीभ से चारों तरफ़ घुमाया। आदमी ने उसके बाल पकड़े और धीरे से आगे-पीछे किया। नेहा की आँखों में आँसू थे लेकिन खुशी के, वह और गहराई तक ले रही थी।
फिर आदमी ने नेहा को उठाकर बिस्तर पर लिटाया। नेहा की साड़ी पूरी तरह खुल चुकी थी, सिर्फ़ प@#@ी बची थी। आदमी ने उसे भी उतार दिया। नेहा की चू@#@त पहले से ही गीली थी, जैसे कोई पका आम रस टपका रहा हो। आदमी ने उंगलियों से उसके होंठ अलग किए, अंदर घुसाया। नेहा कराह रही थी… “आह… वहाँ… और तेज़…” आदमी ने अपना ल@#ंड उसके प्रवेश द्वार पर रखा और धीरे-धीरे अंदर धकेला। नेहा ने जोर से चीख मारी… “आआह्ह्ह… पूरा… भर दो मुझे…” जैसे ही वो पूरा अंदर गया, दोनों एक साथ सिहर उठे।
आदमी ने धीमी गति से शुरू किया, हर थ्रस्ट के साथ नेहा की चू@#@त उसे निचोड़ रही थी। नेहा की टाँगें उसकी कमर पर लिपट गईं, वह खुद ऊपर-नीचे होने लगी। उनके स्त@#@ आपस में रगड़ खा रहे थे, नि@#@ल एक-दूसरे को छू रहे थे। नेहा बार-बार org@#@ms ले रही थी, उसका शरीर काँप रहा था लेकिन वह रुक नहीं रही थी। “और जोर से… मैं तुम्हारी हूँ… सब ले लो…” आदमी ने गति बढ़ाई, गहरे-गहरे धक्के मारते हुए। आखिर में दोनों साथ झड़े – आदमी का गर्म रस नेहा की चू@#@त के अंदर भर गया, नेहा ने सिर पीछे करके चीख मारी… “आह्ह… सब अंदर… उफ्फ…”
बारिश अभी भी हो रही थी, लेकिन अब दोनों एक-दूसरे से लिपटे लेटे थे। नेहा ने फुसफुसाया, “क्या यह सपना है?” आदमी ने मुस्कुराकर कहा, “सपना हो या हकीकत… यह रात हमारी है।” और नेहा ने उसे फिर से चु@#@न दे दिया। हवेली की दीवारें इस राज़ की गवाह बन गईं…
