रिसॉर्ट की मालकिन को चो@@दा

 छब्बीस साल का था। दिल्ली में सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से काम का बोझ इतना बढ़ गया था कि वो थक गया था। बॉस ने कहा, एक महीने का ब्रेक ले लो, रिफ्रेश होकर आना। आरव ने सोचा, कुछ अलग ट्राई करूं। हिमाचल के एक छोटे से गांव में बने शांति रिट्रीट रिसॉर्ट में एक महीने का साइलेंस रिट्रीट बुक किया – जहां कोई बात नहीं करता, सिर्फ ध्यान, योगा, प्रकृति और खुद से मुलाकात। फोन बंद, कोई चैट नहीं, बस मौन। रिसॉर्ट पहाड़ की ढलान पर था। चारों तरफ देवदार के पेड़, नीचे नदी की हल्की आवाज, ऊपर बादल छाए रहते। रिसॉर्ट में सिर्फ आठ-दस मेहमान रहते थे, हर कोई अपने कमरे में, अलग-अलग समय पर योगा और ध्यान। नियम सख्त – कोई आवाज नहीं, सिर्फ लिखकर नोट्स पास कर सकते थे या आंखों से इशारा।



आरव पहुंचा तो सबसे पहले मिली अनन्या – रिसॉर्ट की मालकिन। अड़तीस साल की, लेकिन देखने में तीस की लगती थीं। लंबी, गोरी, बालों में हल्की चांदी की लकीरें, लेकिन आंखें बहुत गहरी और शांत। वो सफेद कुर्ता-पजामा पहनती थीं, लेकिन तरबूज इतने भरे हुए कि कुर्ते का कपड़ा तनकर उभार दिखाता था। पिछवाड़ा गोल और मुलायम। अनन्या ने हाथ जोड़े, मुस्कुराईं और एक नोट दिया – स्वागत है। आपका कमरा नंबर सात। मौन रखें। आरव ने नोट पढ़ा, सिर हिलाया। अनन्या की नजर उस पर ठहरी – जैसे सालों बाद किसी को गौर से देख रही हों। आरव का मन थोड़ा अजीब सा हो गया। वो यहां शांति के लिए आया था, लेकिन अनन्या की मौजूदगी में कुछ और ही महसूस हो रहा था – एक हल्की सी कंपकंपी, एक अनजानी प्यास।


पहला दिन सिर्फ नजरों और हल्के स्पर्श का था। सुबह योगा सेशन में सब लोग लाइन में बैठे। अनन्या आगे बैठकर गाइड कर रही थीं। आरव की नजर बार-बार उस पर जाती। जब अनन्या आगे झुकतीं तो पिछवाड़ा हल्का उभरता। आरव शर्मा जाता, नजर फेर लेता। ब्रेक में अनन्या चाय सर्व करतीं। आरव के पास आईं तो हाथ छू गया – अनजाने में। उंगलियां एक सेकंड ज्यादा रुकीं। अनन्या ने नजरें नीची कीं, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। आरव का दिल तेज धड़कने लगा। वो सोच रहा था, ये क्या हो रहा है। यहां मौन है, इच्छा कैसे जाग रही है। दोपहर में ध्यान सेशन। आरव आंखें बंद करके बैठा था, लेकिन मन में अनन्या का चेहरा घूम रहा था। शाम को वॉकिंग मेडिटेशन – सब चुपचाप जंगल में चलते। अनन्या आगे-आगे। आरव पीछे से देखता – उसकी चाल में एक लय थी, पिछवाड़ा हल्का लहराता। एक बार अनन्या रुकीं, मुड़ीं, आरव की तरफ देखा। आंखें मिलीं। अनन्या ने हाथ से इशारा किया – आगे आओ। आरव आगे बढ़ा। दोनों साथ चलने लगे। कोई बात नहीं, लेकिन कंधे छू रहे थे। ठंडी हवा में दोनों के शरीर गर्म हो रहे थे। आरव की सांसें अनन्या की गर्दन पर लग रही थीं। अनन्या ने एक बार पीछे मुड़कर देखा, आंखों में एक सवाल था। आरव ने बस सिर हिलाया। दोनों चुपचाप चलते रहे, लेकिन दिलों की धड़कनें एक हो रही थीं।


रात को डिनर के बाद सब अपने कमरे में चले गए। आरव को नींद नहीं आ रही थी। खिड़की से बाहर देखा – अनन्या आंगन में अकेली बैठी थीं, चांदनी में। वो बाहर निकला। अनन्या ने देखा, मुस्कुराईं। दोनों एक बेंच पर बैठ गए। अनन्या ने एक नोट दिया – नींद नहीं आ रही? आरव ने लिखा – आपकी वजह से। अनन्या ने पढ़ा, शर्मा गईं। उसने लिखा – मैं भी अकेली हूं। दोनों ने हाथ थामा। उंगलियां आपस में उलझ गईं। अनन्या की सांसें तेज हो गईं। आरव ने धीरे से उसकी हथेली पर होंठ रखे। अनन्या कांपीं, लेकिन हाथ नहीं छोड़ा। वो उठीं, कमरे की तरफ इशारा किया। आरव ने सिर हिलाया – नहीं। अनन्या ने फिर लिखा – कल। आरव कमरे लौटा, लेकिन नींद नहीं आई। मन में अनन्या की महक, उनकी सांसें, उनका स्पर्श घूम रहा था।


दूसरा दिन स्पर्श और करीबियां बढ़ने का था। सुबह योगा में अनन्या ने आरव को पास बिठाया। आसन करते वक्त उनके हाथ छुए। अनन्या ने धीरे से आरव की कमर पर हाथ रखा – सही पोजिशन। लेकिन हाथ ज्यादा देर तक रहा। आरव का शरीर सिहर उठा। ब्रेक में अनन्या ने चाय देते हुए नोट दिया – तुम्हारी आंखें बहुत बोलती हैं। आरव ने लिखा – आपकी आंखें भी। दोनों की नजरें मिलीं, और एक पल के लिए दुनिया रुक गई।


दोपहर में रिसॉर्ट की छोटी लाइब्रेरी में आरव किताब देख रहा था। अनन्या आईं। दोनों एक ही किताब पर हाथ रखा – ओशो की कोई किताब। दोनों हंसे बिना आवाज के। अनन्या ने किताब उठाई, आरव के पास बैठ गईं। कंधे लग गए। अनन्या ने धीरे से अपना सिर आरव के कंधे पर रखा। आरव ने उसकी कमर पर हाथ रखा। अनन्या ने आंखें बंद कीं। दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। अनन्या की सांसें आरव की गर्दन पर लग रही थीं। आरव ने धीरे से उसकी गर्दन पर होंठ रखे – सिर्फ छुआ। अनन्या की हल्की कराह निकली। वो उठीं, नोट पर लिखा – रात को मेरे कमरे में आना। आरव का दिल जोर से धड़का। वो जानता था कि आज रात कुछ होगा।


शाम को वॉकिंग मेडिटेशन में अनन्या ने आरव का हाथ पकड़ा। दोनों जंगल में चले। एक जगह छोटा झरना था। अनन्या ने पानी में पैर डाले। आरव भी। पानी ठंडा था। अनन्या ने आरव के पैर पर अपना पैर रखा। दोनों हंस पड़े। अनन्या ने आरव को खींचा, गले लगाया। उनका पहला पूरा संतरा चूसना हुआ – गहरा, धीमा, जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो। अनन्या की जीभ आरव की जीभ से खेल रही थी। दोनों की सांसें मिल गईं। अनन्या ने आरव की छाती पर हाथ रखा – नोट पर लिखा – तुम्हारा दिल मेरे लिए धड़क रहा है। आरव ने जवाब में उसके तरबूज के ऊपर से हाथ फेरा। अनन्या कांपीं – नोट पर लिखा – धीरे अभी नहीं रात को। आरव का शरीर आग की तरह जल रहा था। वो जानता था कि आज रात मौन टूटेगा।


रात दस बजे आरव अनन्या के कमरे में गया। दरवाजा खुला था। अंदर सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी। कमरा हल्की रोशनी में डूबा था, हवा में अगरबत्ती की मीठी महक। अनन्या कुर्ता-पजामा में थीं। वो उठीं, दरवाजा बंद किया। दोनों आमने-सामने खड़े हो गए। अनन्या ने नोट दिया – मैं डर रही हूं लेकिन चाहती हूं। आरव ने लिखा – मैं भी। अनन्या ने धीरे से कुर्ता उतारा। तरबूज बाहर निकले – नरम, भरे हुए, मटर सख्त और उठे हुए, चांदनी में चमक रहे थे। आरव ने उन्हें देखा, सांस रुक गई। वो आगे बढ़ा, दोनों तरबूज हाथों में लिए। अनन्या की आंखें बंद हो गईं। आरव ने धीरे से उन्हें सहलाया, हल्के से दबाया। अनन्या की आह निकली – छू प्यार से। आरव ने मटर को जीभ से छुआ, हल्के से चाटा। अनन्या का शरीर लहरा उठा – हाय कितने साल बाद किसी ने ऐसा किया। आरव ने एक तरबूज मुंह में लिया, मटर को जीभ से घुमाया, हल्के से काटा। अनन्या की कराहें बढ़ीं – और चूसो आरव मेरे तरबूजों को प्यार दो। आरव ने दोनों तरबूजों को बारी-बारी चूमा, चाटा, हल्के से दांतों से दबाया। अनन्या की उंगलियां आरव के बालों में फंस गईं – बस ऐसे ही मत रुको। आरव ने तरबूजों को और जोर से चूसा, मटर को जीभ से घुमाता रहा। अनन्या की सांसें तेज हो गईं, पसीना उनकी गर्दन से नीचे सरक रहा था। वो आरव की पीठ पर नाखून गाड़ रही थीं – हां और जोर से चूसो।


अनन्या ने आरव का शर्ट उतारा। उसकी छाती पर किस करती हुईं। आरव की छाती पर जीभ फेरी, निप्पल को हल्के से काटा। आरव कांप उठा। अनन्या ने पजामा नीचे सरकाया। आरव का खीरा सख्त और तैयार था। अनन्या ने उसे हाथ में लिया – कितना सख्त मेरे लिए बना है। वो धीरे से सहलाने लगीं, ऊपर-नीचे। आरव की सांसें तेज हो गईं। अनन्या ने झुककर खीरा मुंह में लिया – धीमे से चूसना शुरू किया। जीभ से सिरा चाटा, फिर गहराई तक लिया। आरव की कराह निकली – अनन्या बस मैं नहीं रुक पाऊंगा। अनन्या ने और गहराई से चूसा, हाथ से सहलाते हुए, जीभ से चारों तरफ घुमाती हुईं। आरव का शरीर कांप रहा था। अनन्या ने नोट पर लिखा – आओ सामने से। आरव ने अनन्या को बिस्तर पर लिटाया। पजामा पूरी तरह उतार दिया। अनन्या की खाई गीली चमक रही थी। आरव ने उंगली से छुआ – धीरे से अंदर डाला। अनन्या की कराहें बढ़ीं – आरव और गहराई मेरी खाई को जगाओ। आरव ने दो उंगलियां डालीं, अंदर-बाहर किया। अनन्या का शरीर लहरा रहा था – हां ऐसे ही और तेज लेकिन प्यार से। आरव ने उंगलियां तेज कीं, खाई को सहलाया, अंदर की दीवारों को छुआ। अनन्या की आहें कमरे में गूंज रही थीं – मैं जल रही हूं आरव। आरव ने उंगली से खाई के ऊपर के हिस्से को भी सहलाया, अनन्या की कमर ऊपर उठ गई – हां वहां और छुओ।


आरव ने अपना खीरा खाई के पास रखा। अनन्या ने पैर फैलाए – आओ अंदर। आरव ने धीरे से खीरा डाला – बहुत धीमा। अनन्या की आंखें बंद हो गईं – हां ऐसे पूरी तरह भर दो। खीरा धीरे-धीरे अंदर गया। अनन्या की खाई ने उसे पूरा घेर लिया। आरव रुका, फिर धीरे से अंदर-बाहर शुरू किया। हर धक्के में अनन्या की कराह बढ़ती गई – और गहराई से आरव मुझे खोदो। आरव ने लय पकड़ी – धीमी लेकिन गहरी। अनन्या के तरबूज हिल रहे थे, मटर सख्त होकर कंपकंपा रहे थे। पसीना दोनों के शरीर पर बह रहा था। अनन्या ने आरव की पीठ पर नाखून गाड़े – जोर से लेकिन प्यार से। आरव ने गति बढ़ाई, लेकिन भावनाओं से भरी। अनन्या बोलीं – रुकना मत मैं तुम्हारी हूं आज पूरी तरह। आरव ने और गहराई से खोदा, खाई को भरते हुए। अनन्या की कराहें अब चीख में बदल रही थीं – हां बस ऐसे मेरी खाई फाड़ दो प्यार से। आरव ने एक हाथ से तरबूज दबाया, दूसरे से कमर पकड़ी। अनन्या की कमर ऊपर उठ रही थी – और तेज आरव मैं पहुंच रही हूं। आरव ने जोर से धक्का दिया, खीरा पूरी तरह अंदर। अनन्या की आंखें खुल गईं – हाय राम इतना गहरा। आरव ने रुक-रुक कर खोदा, हर बार गहराई बढ़ाते हुए। अनन्या की खाई सिकुड़ रही थी, रस बह रहा था।


फिर अनन्या घुटनों पर आईं। पिछवाड़ा ऊपर। आरव ने पहले खाई चाटी – जीभ से गहराई तक, मीठा रस चखते हुए। अनन्या की चीख निकली – और चाटो मेरी खाई को चूसो। आरव ने जीभ अंदर डाली, चाटता रहा। अनन्या का शरीर कांप रहा था। फिर आरव ने खीरा पिछवाड़े के पास रखा। धीरे से दबाया। अनन्या ने आह भरी – हां धीरे से। खीरा धीरे-धीरे अंदर गया। अनन्या की कराहें बढ़ीं – हाय इतना मोटा मेरी पिछवाड़ा में। आरव ने धीमे से अंदर-बाहर किया। अनन्या का शरीर लहरा रहा था – और गहराई से आरव मुझे पूरी तरह ले लो। आरव ने गति बढ़ाई, पिछवाड़े को भरते हुए। अनन्या की उंगलियां चादर पकड़ रही थीं – हां बस ऐसे मैं पहुंच रही हूं। आरव ने एक हाथ से खाई को सहलाया, दूसरे से पिछवाड़े को पकड़ा। अनन्या की कराहें अब लगातार – और जोर से आरव मुझे फाड़ दो। आरव ने जोर से धक्का दिया, खीरा पूरी गहराई में। अनन्या का शरीर कांप उठा – हां अब रस छूट रहा है।


चरम आया। अनन्या का शरीर कांप उठा – खाई और पिछवाड़ा सिकुड़ने लगे। रस छूट गया – गर्म, भरपूर, जैसे कोई फव्वारा फूट पड़ा हो। अनन्या की चीख कमरे में गूंजी – आरव मैं आ गई। आरव भी रुक नहीं सका – उसका रस निकल आया, अनन्या की खाई में भरते हुए। दोनों थककर एक-दूसरे पर गिर पड़े। सांसें भारी, पसीना बहता हुआ। अनन्या ने नोट पर लिखा – ये मौन अब टूट गया लेकिन अगली रातें और होंगी। आरव ने उसे गले लगाया। दोनों देर तक लिपटे रहे। बाहर चांदनी अभी भी थी, लेकिन उनके अंदर एक नई रोशनी जल चुकी थी।