भाभी की चु@@ई


शाम का धुंधलका गाँव पर छा गया था। प्रिया, २९ साल की, भरे-भरे जिस्म वाली, गोरी त्वचा पर हल्की लाली लिए, आँगन में कपड़े सुखा रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू हवा में लहरा रहा था, जिससे उसके बड़े-बड़े आम जैसे फल आधे-आधे झलक रहे थे। अंगूर जैसे छोटे-छोटे फल ब्लाउज के पतले कपड़े से साफ़ चुभ रहे थे, जैसे कोई मीठी मिठास छिप नहीं पा रही हो। उसका पिछवाड़ा गोल, भारी और मुलायम था, हर कदम के साथ हल्का-हल्का हिलता हुआ। विक्रम, २५ साल का, खेत से लौटा था। उसकी कमीज पसीने से भीगी हुई, सीने की मांसपेशियाँ उभरी हुईं। उसकी नजरें प्रिया पर टिक गईं, दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। वह जानता था कि यह चाहत गलत है, लेकिन आज घर खाली था – सब बाहर गए थे।



प्रिया ने विक्रम को देखा, मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "विक्रम, थक गए हो ना? अंदर आओ, पानी पी लो।" विक्रम अंदर आया, लेकिन उसकी आँखें प्रिया के आमों पर अटक गईं। प्रिया को महसूस हो रहा था कि उसकी साड़ी का पल्लू सरक रहा है, वह जानबूझकर उसे और सरकने दे रही थी। विक्रम की साँसें भारी हो गईं। "प्रिया... तुम आज... इतनी... इतनी खूबसूरत लग रही हो कि..." उसकी आवाज़ रुक गई। प्रिया ने धीरे से कहा, "ऐसा मत बोलो विक्रम... हमारा रिश्ता..." लेकिन उसकी आवाज़ में अब डर कम, चाहत ज्यादा थी। विक्रम ने एक कदम बढ़ाया, प्रिया की कमर पर हाथ रख दिया। प्रिया का पूरा शरीर सिहर उठा, जैसे बिजली का झटका लगा हो। "नहीं... रुक जाओ..." उसने फुसफुसाया, लेकिन उसका हाथ विक्रम की छाती पर आ गया।


विक्रम ने प्रिया को दीवार से सटा लिया, दोनों के होंठ मिल गए। जैसे कोई प्यासा वर्षों से फल का रस चूसने का इंतज़ार कर रहा हो, दोनों ने एक-दूसरे के होंठों को चूसा, जीभें आपस में खेलने लगीं। प्रिया की साँसें तेज़, दिल की धड़कनें कान में गूँज रही थीं। विक्रम ने प्रिया की साड़ी का पल्लू खींचा, ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। प्रिया के आम जैसे फल बाहर आ गए – बड़े, रसीले, अंगूर जैसे फल सख्त और उभरे हुए। विक्रम ने एक आम को दोनों हाथों से थामा, धीरे-धीरे मसला, अंगूर को जीभ से छुआ। प्रिया ने आँखें बंद कर लीं, "आह... विक्रम... कितना... गर्म लग रहा है..." विक्रम ने अंगूर को मुंह में लिया, हल्का चूसा, जीभ से घुमाया। प्रिया की पीठ दीवार से टकराई, शरीर काँप रहा था। "मुझे... और... और सहलाओ..." उसने कराहते हुए कहा।


विक्रम ने प्रिया को गोद में उठाया, बिस्तर पर लिटाया। साड़ी धीरे-धीरे उतारी, प्रिया अब सिर्फ़ पेटीकोट में थी। उसने पेटीकोट भी सरका दिया। प्रिया की झाड़ी हल्की-हल्की गीली, खाई रसीली और तैयार। विक्रम ने उँगलियों से खाई को छुआ, धीरे-धीरे अंदर सरकाया। प्रिया ने कमर ऊपर उठाई, "ओह... विक्रम... अंदर... और अंदर..." विक्रम की उँगलियाँ खाई में खेलने लगीं, प्रिया की सिसकारियाँ कमरे में गूँजने लगीं। "तुम्हारी खाई... कितनी गर्म... कितनी गीली है..." विक्रम ने कहा, उसकी आवाज़ भारी। प्रिया ने विक्रम की कमीज उतारी, उसका केला बाहर निकाला – लंबा, मोटा, सख्त, जैसे कोई बड़ा पका फल फटने को तैयार। प्रिया ने उसे पकड़ा, सहलाया, "इतना... बड़ा... मेरी खाई में... कैसे जाएगा..." लेकिन उसकी आँखों में डर की बजाय उत्सुकता थी।


विक्रम ने प्रिया के पैर फैलाए, केले को खाई पर रगड़ा। प्रिया की सिसकारी निकली, "धीरे... पहले धीरे..." विक्रम ने धीरे से धक्का दिया, केला का सिरा अंदर सरका। प्रिया ने "आआह..." कहा, दर्द और सुख का मिश्रण। विक्रम रुका, फिर धीरे-धीरे और अंदर डाला। प्रिया की खाई ने केले को जकड़ लिया, जैसे कोई रसीली जगह उसे पूरा निगल रही हो। "विक्रम... पूरा... पूरा अंदर डालो..." प्रिया ने कराहा। विक्रम ने धक्का दिया, केला पूरी तरह अंदर चला गया। प्रिया का शरीर लहरा उठा, आँखों से आँसू छलक आए – सुख के। विक्रम ने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की, हर धक्के के साथ प्रिया की कराहें बढ़ती गईं। "आह... और गहरा... मेरी खाई को... भर दो..." प्रिया ने कहा, उसके हाथ विक्रम की पीठ पर नाखून गड़ा रहे थे।


खुदाई की रफ्तार बढ़ी, कमरे में चटक-चटक की आवाज़, दोनों की गर्म साँसें, प्रिया की सिसकारियाँ। विक्रम ने प्रिया के आमों को पकड़ा, दबाया, अंगूरों को मसला। प्रिया अब खुद कमर हिला रही थी, हर धक्के का जवाब दे रही थी। "विक्रम... मुझे... रस निकल रहा है... रुकना मत..." विक्रम ने और तेज़ किया, केला खाई में जोर-जोर से जा रहा था। प्रिया का शरीर काँप उठा, खाई सिकुड़ गई, रस निकल आया – गर्म, चिपचिपा। विक्रम भी रुक नहीं पाया, केला फड़का, गहराई में रस छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे रहे, साँसें तेज़, दिल धड़कते हुए।


लेकिन यह खत्म नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद विक्रम ने प्रिया को घुमाया, पिछवाड़ा ऊपर किया। पिछवाड़े को थपथपाया, केले को वहाँ लगाया। प्रिया ने कहा, "वहाँ... पहले कभी नहीं..." लेकिन उसकी आवाज़ में उत्सुकता थी। विक्रम ने धीरे से धक्का दिया, केला पिछवाड़े में सरका। प्रिया चीखी, "आआह... दर्द... लेकिन... अच्छा भी..." विक्रम ने धीरे-धीरे पिछवाड़े की खुदाई की, प्रिया अब खुद पीछे धक्के दे रही थी। "और जोर से... मेरे पिछवाड़े को... पूरा भर दो..." खुदाई तेज़ हुई, प्रिया की कराहें ऊँची। विक्रम ने प्रिया के आमों को पीछे से पकड़ा, अंगूरों को खींचा। दोनों फिर से रस निकालने लगे, शरीर काँपते हुए।


रात भर यही चलता रहा – कभी प्रिया ऊपर बैठकर केले पर उछलती, आम हिलते हुए, कभी विक्रम पीछे से खाई में, कभी मुंह में रस चूसते। हर बार रस निकलने के बाद भी वे रुक नहीं पाते। प्रिया की आँखों में अब सिर्फ़ संतुष्टि और प्यार था। "विक्रम... यह रात... कभी मत भूलना..." विक्रम ने उसे चूमा, "प्रिया... अब हर पल... तुम्हारी खाई... मेरी होगी।" सुबह होने से पहले दोनों थककर सो गए, लेकिन उनके मन में वह आग अब और तेज़ जल रही थी, जो कभी ठंडी होने वाली नहीं थी।