पुस्तकालय की वह मदहोश दोपहर

पुरानी हवेली के उस विशाल और शांत पुस्तकालय में हवा जैसे ठहर सी गई थी, जहाँ धूल के कण सूरज की मद्धम रोशनी में नाच रहे थे। समीर और कविता पिछले दो घंटों से पुरानी पांडुलिपियों को सहेजने में व्यस्त थे, लेकिन उनके बीच की खामोशी शब्दों से कहीं ज्यादा शोर मचा रही थी। कविता ने रेशमी साड़ी पहन रखी थी, जिसके ढीले पल्लू से उसके सुडौल और कसे हुए तरबूज बार-बार झाँक रहे थे, जो समीर की एकाग्रता को पूरी तरह भंग कर रहे थे। समीर की नजरें बार-बार कविता के उन गोल और भारी तरबूजों पर टिक जाती थीं, जिनकी गहराई में वह खो जाना चाहता था। कमरे की गर्मी और कविता के शरीर से आती मोगरे की महक ने समीर के भीतर एक अजीब सी बेचैनी भर दी थी, जिससे उसके पतलून के भीतर उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगा था।



कविता भी समीर की उन प्यासी नजरों से अनजान नहीं थी, वह जानबूझकर झुककर किताबें उठा रही थी, जिससे उसका पिछवाड़ा पूरी तरह उभर कर समीर के सामने आ जाता था। समीर ने देखा कि कविता के उस भारी और गोल पिछवाड़े की बनावट इतनी सम्मोहक थी कि उसकी उंगलियां उन्हें सहलाने के लिए तड़प उठीं। समीर की सांसें अब भारी होने लगी थीं और उसका ध्यान पूरी तरह से कविता के बदन की उस बनावट पर था, जो किसी तराशी हुई मूरत जैसी लग रही थी। कविता के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान और आँखों में एक शरारती चमक थी, जैसे वह समीर को अपनी कामुकता के जाल में और गहरा खींचना चाहती हो। वह बार-बार अपने बालों को कान के पीछे करती, जिससे उसके गले और कंधों की गोलाई समीर को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी।
अचानक एक भारी किताब नीचे गिरी और जब दोनों उसे उठाने के लिए झुके, तो समीर का हाथ कविता की कोमल उंगलियों से टकरा गया। वह स्पर्श बिजली की तरह उनके शरीरों में दौड़ गया और कविता ने अपनी आँखें बंद कर लीं, जिससे उसकी लंबी पलकें उसके गालों पर साया करने लगीं। समीर ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ कविता की कमर पर रखा, जहाँ की त्वचा मखमल जैसी मुलायम और तप रही थी। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह समीर के और करीब आ गई, जिससे उसके विशाल तरबूज समीर की चौड़ी छाती से दबने लगे। समीर को अपने सीने पर उन तरबूजों की नरमी और उनके ऊपर उभरे हुए सख्त मटरों का अहसास हुआ, जिसने उसकी धड़कनों को बेकाबू कर दिया और उसके खीरे में एक जोरदार टीस उठी।
समीर ने धीरे से कविता के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों का स्वाद लेना शुरू किया, जो शहद की तरह मीठे और रसीले लग रहे थे। कविता की सिसकारी कमरे की खामोशी को चीरती हुई समीर के कानों में रस घोलने लगी, जब उसने समीर के खीरे को अपनी जांघों के बीच महसूस किया। समीर ने अपनी उंगलियों से कविता के रेशमी ब्लाउज के हुक खोले, जिससे उसके दूधिया और भारी तरबूज पूरी तरह आजाद होकर सामने आ गए। समीर ने अपनी जुबान से कविता के उन लाल मटरों को सहलाया, जिससे कविता का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। वह बेतहाशा सिसकारियां भरते हुए समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसाने लगी और उसे अपने और करीब खींचने की कोशिश करने लगी।
समीर ने अपनी उंगलियों को कविता की साड़ी के नीचे सरकाया, जहाँ उसे घने रेशमी बाल महसूस हुए जो उसकी गहरी और गीली खाई की रखवाली कर रहे थे। कविता की खाई से निकलता हुआ प्राकृतिक रस समीर की उंगलियों को भिगोने लगा था, जो इस बात का सबूत था कि वह भी उतनी ही प्यासी थी। समीर ने अपनी मध्यम उंगली से उस खाई में उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे कविता की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह केवल समीर का नाम पुकारने लगी। उसकी सांसें तेज और छोटी हो गई थीं और उसका शरीर हर स्पर्श पर बुरी तरह कांप रहा था। समीर ने देखा कि कविता की वह रेशमी खाई अब उसके खीरे का स्वागत करने के लिए पूरी तरह से तैयार और रसभरी हो चुकी थी।
समीर ने बिना और देर किए अपनी पतलून उतारी और अपना विशाल और सख्त खीरा कविता की आँखों के सामने पेश किया, जिसे देखकर कविता की सांसें थम सी गईं। कविता ने आगे बढ़कर उस गर्म खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे इतनी शिद्दत से चूसने लगी कि समीर के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। समीर को अपनी रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन महसूस हुई, जब कविता की जीभ उसके खीरे के हर कोने को सहला रही थी। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद, कविता ने समीर को अपनी ओर खींचा और उसे अपने ऊपर आने का इशारा किया। समीर ने कविता को मेज पर लिटाया और उसके भारी पिछवाड़े को हाथों में भरकर उसे अपनी ओर खींच लिया।
समीर ने अपने खीरे की नोक को कविता की रसीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से भीतर धकेलना शुरू किया, जिससे कविता ने एक लंबी आह भरी। वह खाई इतनी तंग और गर्म थी कि समीर को अपना खीरा भीतर ले जाने में मशक्कत करनी पड़ रही थी, लेकिन कविता के गीलेपन ने उसे रास्ता दिया। समीर ने धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्के के साथ वह कविता की गहराइयों को नाप रहा था और कविता उसके तालमेल में अपनी कमर ऊपर उठा रही थी। उनके शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी भारी सांसें पुस्तकालय के शांत माहौल में एक संगीत की तरह गूँज रही थीं। समीर की रफ्तार अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी और वह पूरी ताकत से कविता की खाई की खुदाई करने में जुट गया था।
कविता ने अपने पैरों को समीर की कमर के चारों ओर लपेट लिया ताकि वह और अधिक गहराई तक पहुँच सके, उसका चेहरा पसीने से भीग चुका था और उसकी आँखें बंद थीं। समीर ने अब कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे उसे एक नया और गहरा आनंद मिलने लगा। कविता के भारी तरबूज नीचे की ओर लटक रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों से मसलते हुए पीछे से जोरदार धक्के लगा रहा था। हर धक्के के साथ कविता की सिसकारियां और भी तीखी होती जा रही थीं, "ओह समीर, और तेज... मुझे पूरी तरह खोद दो!" उसके शब्द समीर के भीतर की आग को और भड़का रहे थे और वह बिना रुके उसकी गहराइयों में अपने खीरे से प्रहार करता रहा।
अंत में, जब दोनों का चरम आनंद करीब आया, तो समीर ने अपनी गति को अपनी चरम सीमा पर पहुँचा दिया और कविता का शरीर जोर-जोर से थरथराने लगा। जैसे ही समीर का रस छूटना शुरू हुआ, उसने अपनी पूरी ताकत कविता के भीतर झोंक दी और कविता ने भी अपना सारा रस निकाल दिया। दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए मेज पर ढह गए, उनके शरीर पसीने से लथपथ थे और उनकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। उस खुदाई के बाद कविता के चेहरे पर एक असीम संतुष्टि थी और समीर उसे अपनी बाहों में भरकर उसके माथे को चूम रहा था। पुस्तकालय की वह दोपहर उनके जीवन की सबसे यादगार और रसीली दास्तान बन गई थी, जिसकी गूँज उनके मन में हमेशा बनी रहने वाली थी।