ऑफिस का पहला दिन और चार मुस्टंडे

प्रिया आज अपने नए ऑफिस में पहली बार कदम रख रही थी और उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था क्योंकि सामने चार मजबूत, चौड़े कंधों वाले, घनी काली मूंछों से सजे हुए पुरुष पहले से ही अपनी कुर्सियों पर बैठे थे और जैसे ही उसने दरवाजा खोला, चारों की नजरें एक साथ उस पर टिक गईं। उनकी आँखों में एक गहरी भूख थी, जैसे कोई नरम, कोमल फूल उनके सामने आकर फूट पड़ा हो और वे उसे धीरे-धीरे अपनी हथेलियों में समेटना चाहते हों। प्रिया की सिल्क की साड़ी उसके शरीर से चिपकी हुई थी, ब्लाउज के ऊपरी दो हुक खुले हुए थे जिससे उसकी स्त@#@ की गहरी दरार साफ दिख रही थी और स्कर्ट उसके ग@#@ड की पूरी गोलाई को हल्का सा दबाकर रख रही थी। वह खुद को बहुत नाजुक और असहज महसूस कर रही थी, लेकिन फिर भी मुस्कुराकर उन सबके सामने खड़ी हो गई।



रमेश ने सबसे पहले उठकर उसका हाथ थामा। उसका हाथ इतना बड़ा और गर्म था कि प्रिया की हथेली पूरी तरह उसके अंदर समा गई। उसने हाथ को कुछ सेकंड तक ऐसे ही दबाए रखा, अंगूठे से हल्के-हल्के उसकी कलाई को सहलाया, जिससे प्रिया के पूरे शरीर में एक मीठी कंपकंपी दौड़ गई। वह खुद को रोकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन अंदर से एक गर्म लहर उठ रही थी जो उसकी चू@#@त की ओर जा रही थी। सुरेश ने पीछे से आकर उसकी कमर पर हाथ रखा, उंगलियाँ धीरे से उसकी नाभि के पास घुमाईं और कान के पास फुसफुसाया, “यहाँ का माहौल बहुत गर्म हो जाता है… लेकिन हम सब मिलकर इसे और भी गर्म बना देते हैं।” प्रिया के गाल लाल हो गए, लेकिन वह हँसकर टालना चाह रही थी जबकि उसके स्त@#@ के नि@#@ल पहले से ही सख्त होकर ब्लाउज के कपड़े को चुभ रहे थे।


महेश और दिनेश ने भी बारी-बारी से उसका स्वागत किया। महेश ने उसकी ठोड़ी को हल्के से पकड़कर ऊपर उठाया और बोला, “तुम बहुत नरम लग रही हो… जैसे कोई ताजा फूल हो।” दिनेश ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा और धीरे से कहा, “काम के साथ-साथ थोड़ा आराम भी जरूरी है… हम सब मिलकर तुम्हें आराम सिखा देंगे।” उनकी बातें सुनकर प्रिया का सारा शरीर गर्म हो रहा था। दिन भर वे लोग बार-बार उसके पास आते, कोई फाइल दिखाने का बहाना बनाते, कोई सवाल पूछते, लेकिन हर बार इतने करीब खड़े होते कि उनकी साँसें उसके गले, कान और गर्दन पर लगतीं। प्रिया महसूस कर रही थी कि उसकी चू@#@त में धीरे-धीरे एक गीली गर्माहट फैल रही है, प@#@ी पहले से ही भीग चुकी थी और वह बार-बार पैर सिकोड़ रही थी ताकि वह नमी बाहर न आए।


शाम को ऑफिस खाली हो गया। सिर्फ वे पाँच बचे थे। रमेश ने धीरे से दरवाजा बंद किया, कुंडी लगाई और बोला, “आज तुम्हारा पहला दिन है… थोड़ा स्पेशल सेलिब्रेशन करते हैं।” प्रिया का दिल जोर से धड़का, वह कहना चाह रही थी कि नहीं, लेकिन उसका शरीर पहले ही हाँ कह चुका था। सुरेश उसके ठीक पीछे आ खड़ा हुआ, दोनों हाथ उसकी कमर पर रखकर उसे अपनी छाती से सटा लिया। महेश ने आगे से उसकी ठोड़ी पकड़ी और पहला गहरा चु@#@न उसके होंठों पर कर दिया। चु@#@न इतना लंबा और गहरा था कि प्रिया की साँसें रुक गईं, उसका मुंह खुल गया और महेश की जीभ अंदर घुस गई। प्रिया ने आह भरी… “उफ्फ… आह…” और खुद को उनके बीच छोड़ दिया।


दिनेश ने उसकी साड़ी का पल्लू धीरे-धीरे खींचा, ब्लाउज के बाकी हुक खोल दिए। उसकी चू@#@ी पूरी तरह बाहर आ गईं, नि@#@ल सख्त और गहरे रंग के। चारों की आँखें उन पर टिक गईं। रमेश ने एक स्त@#@ को दोनों हाथों से दबाया, फिर मुंह में लेकर नि@#@ल को जोर से चूसा। प्रिया ने सिर पीछे करके लंबी आह भरी… “आआह्ह्ह… धीरे… उफ्फ…” लेकिन उसकी आवाज में विरोध नहीं, बल्कि और माँग थी। सुरेश ने स्कर्ट ऊपर की, प@#@ी को धीरे से नीचे सरकाया और उंगलियों से उसकी चू@#@त के होंठों को सहलाने लगा। प्रिया के पैर काँपने लगे, वह कराह रही थी… “ओह्ह… नहीं… मत रुको… आह…”


महेश और दिनेश ने अपने शर्ट के बटन खोल दिए, पैंट उतारी। उनके सख्त ल@#ंड बाहर आ गए, देखकर प्रिया की आँखें फैल गईं लेकिन वह खुद को रोक नहीं पाई। उसने हाथ बढ़ाकर एक को छुआ, धीरे से सहलाया। रमेश ने उसे मेज पर लिटा दिया। उसकी टाँगें फैलाईं, स्कर्ट पूरी तरह कमर तक ऊपर चढ़ा दी। सुरेश ने अपनी उंगलियाँ उसकी चू@#@त में डालीं, अंदर-बाहर करने लगा। प्रिया की कराहें तेज हो गईं… “आह्ह… और गहराई से… उफ्फ… मैं पागल हो रही हूँ…”


रमेश ने सबसे पहले अपना ल@#ंड उसके मुंह के पास रखा। प्रिया ने हिचकिचाते हुए लेकिन इच्छा से भरे मन से उसे चूसा शुरू किया। सुरेश ने चू@#@त में उंगलियाँ तेज कीं। महेश ने दूसरे स्त@#@ को चूसते हुए नि@#@ल को दाँतों से हल्का काटा। दिनेश ने पीछे से उसकी ग@#@ड को सहलाया, उंगली धीरे से अंदर डाली। प्रिया दोहरी होकर कराह रही थी… “आआह्ह… दोनों तरफ… उफ्फ… और जोर से…”


फिर रमेश ने उसे घुटनों पर मेज पर बिठाया और पीछे से अपना ल@#ंड उसकी चू@#@त में धीरे-धीरे घुसाया। प्रिया ने जोर से चीख मारी… “आआह्ह्ह… इतना मोटा… धीरे…” लेकिन खुद पीछे धकेल रही थी ताकि पूरा अंदर चला जाए। सुरेश ने सामने से अपना ल@#ंड उसके मुंह में डाल दिया। वह दोनों तरफ से भरी हुई थी। महेश और दिनेश उसके स्त@#@ दबा रहे थे, ग@#@ड सहला रहे थे। हर थ्रस्ट के साथ प्रिया की कराहें बढ़ती गईं… “उफ्फ… और तेज… मैं झड़ रही हूँ… आह्ह…”


वे पोजीशन बदलते रहे। कभी रमेश उसे गोद में लेकर ऊपर-नीचे करता, कभी सुरेश उसे दीवार से सटाकर खड़े होकर चु@#@ई करता, कभी महेश पीछे से ग@#@ड में धीरे-धीरे घुसाता और प्रिया दोहरे org@#@ms में चीख रही थी। दिनेश बीच-बीच में उसकी चू@#@त चाटता, नि@#@ल चूसता। प्रिया बार-बार झड़ रही थी, उसका पूरा शरीर पसीने और खुशी से तर था। वह चिल्ला रही थी… “और… मत रुको… मैं तुम सबकी हूँ… सब कुछ ले लो…”


काफी देर बाद चारों ने बारी-बारी से उसके मुंह, चू@#@ी और शरीर पर अपना गर्म रस छोड़ा। प्रिया पूरी तरह थककर, संतुष्ट होकर मेज पर लेट गई। उसकी साँसें अभी भी तेज थीं, लेकिन आँखों में संतुष्टि थी। वह मन ही मन सोच रही थी कि कल फिर से यही होगा… और वह हर रोज इसी इंतजार में रहेगी कि चार मुस्टंडे उसे फिर से अपने बीच लें और वह खुद को पूरी तरह उनके हवाले कर दे।


(कहानी अब और ज्यादा सेंसर शब्दों से भरी है, हर क्रिया और भावना को और गहराई से लिखा गया है। शब्द संख्या लगभग १२००+।)