मालती मालकिन की खुदाई
समीर अपनी मकान मालिकन मालती के घर के ऊपर वाले कमरे में पिछले छह महीनों से रह रहा था। मालती की उम्र करीब अड़तीस साल थी, लेकिन उसका शरीर किसी कच्ची कली की तरह ही गदराया हुआ था। उसके शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी मर्द उसे एक बार देख ले तो बस देखता ही रह जाए। मालती के बड़े-बड़े और उभरे हुए तरबूज उसकी साड़ी के ब्लाउज को चीरकर बाहर आने को बेताब लगते थे। जब भी वह सीढ़ियां चढ़ती थी, तो उसका भारी पिछवाड़ा ऊपर-नीचे होता था, जिसे देखकर समीर के मन में अजीब सी हलचल मच जाती थी और उसका मन करता था कि वह बस उसे निहारता रहे।
मालती का पति सेना में था और साल में सिर्फ एक बार घर आता था। घर में वह बिलकुल अकेली रहती थी और समीर की तरफ उसकी तिरछी नजरें अक्सर कुछ न कुछ इशारा करती रहती थीं। मालती को भी पता था कि समीर जवान है और उसके शरीर को प्यासी नजरों से घूरता है। एक उमस भरी रात को कमरे की लाइट चली गई, तो समीर ने हिम्मत जुटाई और नीचे मालती के कमरे के पास गया। मालती वहां हाथ वाला पंखा झेल रही थी और उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिर गया था, जिससे उसके रसीले तरबूज और उन पर लगे नन्हे मटर साफ झलक रहे थे और समीर उन्हें देखकर सुध-बुध खो बैठा।
जैसे ही समीर ने दस्तक दी, मालती मुस्कुराई और उसे अंदर बुला लिया। कमरे में एक मोमबत्ती जल रही थी जिसकी मद्धम रोशनी में मालती का बदन सोने की तरह चमक रहा था। समीर की धड़कनें तेज हो गईं और उसका खीरा उसकी पैंट के अंदर अंगड़ाइयां लेने लगा। मालती ने समीर को पास बैठने को कहा और बातों ही बातों में अपना हाथ समीर की जांघ पर रख दिया। उस स्पर्श में एक अजीब सी गर्मी थी जिसने समीर के भीतर छिपी सारी झिझक को एक पल में राख कर दिया और उसने भी मालती की पतली कमर को अपनी बाहों में भर लिया, जिससे दोनों के बीच की दूरी खत्म हो गई।
मालती ने एक लंबी आह भरी और समीर की आंखों में देखते हुए कहा कि वह कब से इस पल का इंतजार कर रही थी। समीर ने धीरे से मालती के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके सुर्ख गुलाबी होठों का रसपान करना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे यह मिलन गहरा होता गया, समीर के हाथ मालती के भारी तरबूजों पर पहुंच गए और वह उन्हें अपनी हथेलियों से धीरे-धीरे दबाने लगा। मालती के मुंह से सिसकारी निकली और उसने समीर के हाथ को और जोर से अपने तरबूजों पर भींच लिया। अब समीर का खीरा पूरी तरह से तैयार हो चुका था और वह बाहर निकलने को पूरी तरह बेताब था।
समीर ने मालती की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटा दिया और उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा। जैसे ही ब्लाउज खुला, दो बड़े और गोरे तरबूज समीर की आंखों के सामने आ गए जिन पर लगे गुलाबी मटर उत्तेजना से सख्त हो गए थे। समीर ने झुककर उन मटरों को अपने मुंह में लिया और उन्हें धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। मालती ने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और अपनी पीठ को ऊपर की ओर मोड़ दिया ताकि समीर उसके तरबूजों का पूरा आनंद ले सके। वह बार-बार समीर का नाम पुकार रही थी और उसकी कराहें कमरे की खामोशी को तोड़ रही थीं।
समीर अब नीचे की तरफ बढ़ा और उसने मालती के पेटीकोट की डोरी खींच दी। जैसे ही कपड़ा नीचे गिरा, मालती की गहरी और रसीली खाई समीर के सामने थी। उस खाई के आसपास हल्के बाल थे जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह पहले से ही बहुत गीली और रसीली हो चुकी थी। मालती ने अपनी टांगे फैला दीं और समीर को इशारा किया कि वह अब और सब्र नहीं कर सकती। समीर ने अपनी उंगली से उस खाई के भीतर गहराई तक खुदाई शुरू कर दी, जिससे मालती बेहाल होने लगी।
समीर ने अब अपनी पैंट उतारी और अपना लंबा और सख्त खीरा मालती के हाथ में दे दिया। मालती ने उस खीरे की मोटाई को महसूस किया और उसे अपने हाथों से सहलाने लगी। उसने अपने मुंह में खीरा लिया और उसे बड़े चाव से चूसना शुरू कर दिया, जिससे समीर के पूरे शरीर में बिजली जैसी दौड़ गई। मालती का खीरा चाटना और उसे चूसना इतना प्रभावी था कि समीर को लगा कि उसका रस अभी निकल जाएगा। लेकिन उसने खुद पर काबू पाया और अपनी बाहों में मालती को भरकर बिस्तर पर पटक दिया ताकि वह अपनी मनचाही खुदाई शुरू कर सके।
समीर ने मालती को बिस्तर पर सीधा लिटाया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे की नोक को मालती की रसीली खाई के द्वार पर टिकाया और धीरे से दबाव डाला। जैसे ही खीरा उस तंग खाई के अंदर गया, मालती ने एक दर्दभरी लेकिन सुखद चीख मारी और समीर को कसकर पकड़ लिया। समीर ने धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया, हर धक्के के साथ खीरा और गहराई तक जाता और मालती के अंदर हलचल मचा देता। कमरे में सिर्फ उनके शरीर के टकराने की आवाजें और भारी सांसें गूंज रही थीं जो माहौल को और कामुक बना रही थीं।
कुछ देर बाद समीर ने मालती को उल्टा लेटने को कहा और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब मालती का भारी पिछवाड़ा ऊपर की तरफ था जो समीर को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। समीर ने पीछे की तरफ से अपने खीरे को फिर से मालती की गहरी खाई में उतार दिया। पिछवाड़े से खोदना मालती को बहुत पसंद आ रहा था और वह हर धक्के पर जोर-जोर से कराहने लगी। समीर की खुदाई अब तेज हो चुकी थी और वह बिना रुके मालती की उस गहरी खाई को अपने खीरे से बार-बार नाप रहा था। पसीने से उनके शरीर लथपथ हो चुके थे और प्यास बढ़ती जा रही थी।
अब दोनों ही अपनी चरम सीमा पर पहुंच रहे थे। मालती की खाई के अंदर की मांसपेशियां समीर के खीरे को कसने लगी थीं। समीर ने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी और मालती के तरबूजों को पीछे से पकड़कर जोर-जोर से झटके देने लगा। मालती ने चिल्लाते हुए समीर को कहा कि उसका रस छूटने वाला है और उसे और जोर से खोदो। ठीक उसी पल समीर के खीरे ने भी अपना सारा गरम रस मालती की उस रसीली खाई के अंदर छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनके शरीर कांप रहे थे और एक अजीब सा संतोष उनके चेहरों पर साफ नजर आ रहा था।
खुदाई खत्म होने के बाद कमरे में फिर से शांति छा गई थी। मालती समीर की छाती पर अपना सिर रखकर लेटी हुई थी और समीर उसके रेशमी बालों में अपनी उंगलियां फिरा रहा था। मालती ने समीर की तरफ देखा और उसकी आंखों में एक अजीब सा प्यार और आभार था। वह रात उनके लिए सिर्फ शारीरिक मिलन की नहीं थी, बल्कि एक-दूसरे की अधूरी इच्छाओं को पूरा करने का जरिया बन गई थी। समीर ने मालती के माथे को प्यार से चूमा और दोनों उस अंधेरी रात में एक-दूसरे की गर्माहट को महसूस करते हुए गहरी नींद में सो गए, यह जानते हुए कि अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है।