रोहन अपनी कॉलेज की छुट्टियों में अपनी वंदना मौसी के घर रहने के लिए आया था। वंदना मौसी की उम्र करीब अड़तीस साल थी, लेकिन उनकी देखभाल और सादगी ने उनके यौवन को जैसे थाम कर रखा था। उनका शरीर आज भी उतना ही कसा हुआ और भरा हुआ था कि कोई भी उन्हें देखकर धोखा खा जाए।
वंदना मौसी का रंग दूध जैसा सफेद था और उनकी कद-काठी एकदम सुडौल थी। उनके शरीर के अंग, खासकर उनके भारी तरबूज और चौड़ा पिछवाड़ा, रोहन को हमेशा से ही अपनी ओर आकर्षित करते रहे थे। रोहन जब भी उन्हें देखता, उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी और प्यास जागने लगती थी।
मौसा जी बिजनेस के सिलसिले में अक्सर हफ्तों बाहर रहते थे, इसलिए मौसी घर में अकेली ही रहती थीं। रोहन का आना उनके लिए एक सुखद अहसास था। वह रोहन का बहुत ख्याल रखती थीं, उसकी पसंद का खाना बनातीं और घंटों उसके साथ बैठकर पुरानी यादें ताज़ा किया करती थीं।
उस दोपहर घर में सन्नाटा पसरा हुआ था और बाहर तेज धूप खिली हुई थी। रोहन अपने कमरे में लेटा हुआ था, तभी वंदना मौसी कमरे में आईं। उन्होंने एक पतली सी सूती साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें से उनके बदन की गोराई साफ झलक रही थी। उनकी चाल में एक गजब की नजाकत थी।
"रोहन, क्या तुम सो रहे हो?" मौसी ने धीरे से पुकारा। रोहन ने अपनी आँखें खोलीं और मौसी के उन लचकते हुए अंगों को देखने लगा। मौसी के ब्लाउज का गला थोड़ा गहरा था, जिससे उनके तरबूजों की गहरी लकीर साफ दिख रही थी। रोहन का मन बुरी तरह डोलने लगा और धड़कनें तेज हो गईं।
"नहीं मौसी, बस लेटा हुआ था," रोहन ने अपनी आवाज को संभालते हुए कहा। मौसी उसके पास बेड पर ही बैठ गईं। उनकी साड़ी उनके घुटनों तक सरक गई थी, जिससे उनकी गोरी पिंडलियां नजर आ रही थीं। रोहन की नजरें बस वहीं टिक गई थीं, जिसे देखकर मौसी मुस्कुरा दीं।
मौसी ने रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फिराईं, जिससे रोहन के पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। "तुम काफी बड़े हो गए हो रोहन, अब तुम्हारी पसंद भी बदल गई होगी," मौसी ने शरारत भरी नजरों से कहा। रोहन ने हिम्मत जुटाकर उनके हाथ को अपने हाथ में थाम लिया।
उनके बीच एक अजीब सा तनाव और आकर्षण बढ़ता जा रहा था। रोहन ने देखा कि मौसी की सांसें भी अब थोड़ी तेज चलने लगी थीं। उनके तरबूज ब्लाउज के अंदर ऊपर-नीचे हो रहे थे। रोहन ने अपनी उंगली से धीरे से उनके हाथ को सहलाया, जिससे मौसी की आँखों में चमक आ गई।
"मौसी, आप बहुत सुंदर हैं," रोहन ने धीमी आवाज में कहा। वंदना मौसी ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन उन्होंने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। उन्होंने रोहन की आँखों में देखा और एक गहरी सांस ली। रोहन को लगा कि अब झिझक की दीवारें धीरे-धीरे गिर रही थीं।
अचानक रोहन ने मौसी को अपनी ओर खींचा और उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। मौसी ने पहले तो थोड़ा विरोध किया, लेकिन फिर उन्होंने खुद को रोहन के हवाले कर दिया। रोहन ने उनके गर्दन पर अपना चेहरा टिका दिया और उनकी खुशबू को अपने अंदर उतारने लगा। मौसी का शरीर कांप रहा था।
रोहन की उंगलियां मौसी की पीठ पर रेंगने लगीं और धीरे-धीरे उनके ब्लाउज की डोरी तक पहुँच गईं। मौसी ने एक लंबी आह भरी और रोहन के कंधे पर अपना सिर रख दिया। रोहन ने धीरे से उनके ब्लाउज की हुक खोल दी, जिससे उनके दोनों भारी तरबूज आजाद हो गए।
वंदना मौसी के तरबूज इतने सफेद और बड़े थे कि रोहन उन्हें देखकर दंग रह गया। उनके बीच में छोटे-छोटे मटर जैसे निप्पल कड़े हो गए थे। रोहन ने अपनी जीभ से एक मटर को छुआ, जिससे मौसी के मुँह से एक सिसकारी निकल गई। वह रोहन के बालों को कसकर पकड़ने लगीं।
रोहन ने अपनी जीभ से मौसी के तरबूजों को सहलाना शुरू किया। मौसी के शरीर में एक अजीब सी बेचैनी और गर्मी बढ़ती जा रही थी। उनका पसीना रोहन की जीभ पर एक नमकीन स्वाद छोड़ रहा था। रोहन ने मौसी के साड़ी को पूरी तरह से उनके बदन से अलग कर दिया।
अब वंदना मौसी बिना कपड़ों के रोहन के सामने थीं। उनका पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और गोल था कि रोहन से रहा नहीं गया। उसने मौसी को उल्टा लेटा दिया और उनके पिछवाड़े को अपने हाथों से सहलाने लगा। मौसी अपनी कमर लचका रही थीं और सिसकारियां भर रही थीं।
"रोहन, यह तुम क्या कर रहे हो?" मौसी ने दबी हुई आवाज़ में पूछा, लेकिन उनकी आंखों में साफ़ तौर पर प्यास दिख रही थी। रोहन ने उनके कानों के पास जाकर फुसफुसाया, "वही जो आप बरसों से चाहती थीं मौसी।" मौसी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया।
रोहन ने अपने हाथ मौसी की गहरी खाई की ओर बढ़ाए। वहाँ पहले से ही काफी नमी थी, जिससे पता चल रहा था कि मौसी कितनी उत्तेजित थीं। रोहन ने अपनी एक उंगली को खाई में उतारा, जिससे मौसी का पूरा शरीर अकड़ गया और उन्होंने रोहन को कसकर जकड़ लिया।
रोहन ने अपनी उंगली से खाई की गहराई को मापना शुरू किया। मौसी अब बेकाबू हो रही थीं। उन्होंने रोहन के पेंट की जिप खोली और उसके कड़े हो चुके खीरे को अपने हाथ में ले लिया। खीरे की मोटाई और लंबाई देखकर मौसी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
मौसी ने धीरे-धीरे रोहन के खीरे को चूसना शुरू किया। उनके मुँह की गर्मी और जीभ के स्पर्श ने रोहन को पागल कर दिया। रोहन ने उनके सिर को पकड़ लिया और लय में अपने खीरे को उनके मुँह के अंदर-बाहर करने लगा। कमरे में सिर्फ सिसकारियों और गीली आवाज़ों का शोर था।
जब रोहन का सब्र जवाब दे गया, तो उसने मौसी को सीधा लेटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे की नोक को मौसी की गीली खाई पर रखा और एक गहरा दबाव बनाया। मौसी ने जोर से रोहन की पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए।
धीरे-धीरे रोहन ने पूरा खीरा खाई के अंदर उतार दिया। मौसी की खाई बहुत तंग थी, जिससे रोहन को काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। हर धक्के के साथ मौसी के मुँह से "ओहह... उम्मम..." जैसी आवाजें निकल रही थीं। रोहन ने सामने से खुदाई करना शुरू कर दिया और लय बढ़ा दी।
कमरे में खुदाई की आवाज़ गूँजने लगी। रोहन के धक्के इतने जोरदार थे कि मौसी का पूरा शरीर बेड पर उछल रहा था। उनके तरबूज बुरी तरह हिल रहे थे और रोहन बारी-बारी से उन्हें अपने मुँह में भर रहा था। पसीना दोनों के शरीरों को एक-दूसरे से चिपका चुका था।
"और तेज रोहन... मुझे और जोर से खोदो," मौसी ने चिल्लाते हुए कहा। रोहन ने अपनी गति और बढ़ा दी। वह पूरी ताकत से मौसी की खाई को खोद रहा था। मौसी की आँखों से खुशी के आंसू निकल रहे थे और वह अपनी कमर को ऊपर उठाकर रोहन का साथ दे रही थीं।
रोहन ने अब मौसी को घुमाया और उन्हें पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया। मौसी ने घुटनों के बल बैठकर अपना भारी पिछवाड़ा रोहन की तरफ कर दिया। रोहन ने एक बार फिर अपना खीरा उनकी खाई में पीछे से उतारा। यह अहसास मौसी के लिए एकदम नया और जबरदस्त था।
खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। रोहन के शरीर की हर नस फड़क रही थी और मौसी का शरीर अब ढीला पड़ने लगा था। उनकी खाई से निकलने वाला रस अब सफेद होने लगा था। रोहन को महसूस हुआ कि अब उसका रस भी छूटने वाला है और उसने अंतिम धक्के लगाए।
अचानक मौसी का पूरा शरीर कांपने लगा और उनकी खाई से भारी मात्रा में रस छूट गया। उसी पल रोहन ने भी अपने खीरे से सारा रस मौसी की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े और जोर-जोर से सांसें लेने लगे। कमरे में शांति छा गई, लेकिन दिलों की धड़कनें तेज थीं।
कुछ देर बाद मौसी ने रोहन के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में भर लिया। "तुमने मुझे आज जो सुख दिया है, वह मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी," उन्होंने धीमी आवाज में कहा। रोहन ने बस मुस्कुराकर उन्हें और कसकर पकड़ लिया। उनके शरीर अभी भी पसीने से लथपथ थे।
बाहर सूरज ढलने लगा था, लेकिन घर के अंदर एक नया रिश्ता जन्म ले चुका था। वंदना मौसी के चेहरे पर एक अजीब सा संतोष था और रोहन को अपनी मर्दानगी पर गर्व महसूस हो रहा था। उन्होंने तय किया कि यह राज सिर्फ उन दोनों के बीच ही रहेगा और यह खुदाई का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा।
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