दफ्तर की वो सर्द रात और रेशमी एहसास


दफ्तर की उस वीरान और शांत रात में समीर अपनी मेज पर बैठा हुआ था लेकिन उसका ध्यान सामने वाली केबिन में बैठी नैना मैम की ओर था। नैना दफ्तर की सीनियर प्रोजेक्ट लीड थी और उसकी उम्र लगभग बत्तीस साल थी, लेकिन उसका शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था जिसे देखकर समीर अक्सर अपनी सुध-बुध खो बैठता था। उस रात ऑफिस में सिर्फ वे दोनों ही बचे थे क्योंकि एक बड़े प्रोजेक्ट की डेडलाइन अगले दिन सुबह की थी और काम का बोझ बहुत अधिक था। नैना ने उस दिन एक सफेद रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी जो उसके गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रही थी और साड़ी का पल्लू बार-बार उसके कंधों से फिसल रहा था। समीर की नजरें बार-बार नैना के उन उभरे हुए और गोल-मटोल तरबूजों पर टिक जाती थीं जो टाइट ब्लाउज के अंदर कैद होने के लिए छटपटा रहे थे और साड़ी के पतले कपड़े से उनकी रूपरेखा साफ झलक रही थी।

समीर की धड़कनें तेज हो रही थीं क्योंकि नैना ने अचानक उसे अपने केबिन में फाइलें लेकर बुलाया और जब वह अंदर पहुंचा तो वहां की खुशबू ने उसे मदहोश कर दिया। नैना अपनी कुर्सी पर झुकी हुई कुछ लिख रही थी जिससे उसके तरबूजों का ऊपरी हिस्सा और उनके बीच की गहरी घाटी साफ नजर आ रही थी जो किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थी। समीर ने जब फाइल टेबल पर रखी तो उसके हाथ अनजाने में नैना की उंगलियों से छू गए और उस एक पल के स्पर्श ने उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी जिससे उसके पसीने छूटने लगे। नैना ने भी अपनी निगाहें उठाईं और समीर की आंखों में देखा, उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक और प्यास थी जो शायद इस सर्द रात की तन्हाई और थकान का नतीजा थी। समीर ने महसूस किया कि नैना के चेहरे पर हल्की सी लाली छा गई थी और वह अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करने की जगह उसे वैसे ही ढीला छोड़ चुकी थी।

कुछ देर बाद काम से ब्रेक लेने के लिए नैना ने सुझाव दिया कि वे दोनों ऑफिस की बालकनी में चलकर थोड़ी ताजी हवा लें क्योंकि अंदर का माहौल काफी बोझिल हो चुका था। बालकनी में शहर की रोशनी मद्धम दिख रही थी और ठंडी हवा के झोंके नैना के खुले बालों को समीर के चेहरे पर मार रहे थे जिससे एक बहुत ही कामुक वातावरण बन गया था। समीर ने देखा कि ठंडी हवा के कारण नैना के तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर जैसी घुंडियां अब साड़ी के ऊपर से ही सख्त होकर उभर आई थीं जो उसके भीतर की उत्तेजना को साफ बयां कर रही थीं। नैना ने समीर की ओर मुड़कर देखा और अपनी आवाज को धीमा करते हुए कहा कि आज की रात बहुत लंबी है और वह खुद को बहुत अकेला और बेचैन महसूस कर रही है। समीर ने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ नैना की रेशमी कमर पर रख दिया जहाँ साड़ी और त्वचा का मिलन हो रहा था और वह अहसास इतना मुलायम था कि उसे लगा वह स्वर्ग छू रहा है।

नैना ने कोई विरोध नहीं किया बल्कि वह और करीब आ गई और अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया जिससे उसकी सांसों की गर्मी समीर की गर्दन पर महसूस होने लगी। समीर ने धीरे से अपनी उंगलियां नैना की पीठ पर घुमानी शुरू कीं और फिर उसे अपनी ओर घुमाकर उसके गुलाबी होठों का चुंबन लिया जो शहद की तरह मीठे और रसीले लग रहे थे। दोनों के बीच की झिझक अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी और वासना की आग दोनों के शरीर में धधक रही थी जो अब और रुकने का नाम नहीं ले रही थी। समीर के हाथों ने अब नैना के उन भारी तरबूजों को अपने कब्जे में ले लिया था और वह उन्हें हल्के से दबाने लगा जिससे नैना के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई जो सन्नाटे को चीर रही थी। नैना ने समीर की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए और जल्द ही वे दोनों ऑफिस के उसी कालीन वाले फर्श पर थे जहाँ अब सिर्फ उनकी आहें और कपड़ों की सरसराहट सुनाई दे रही थी।

समीर ने नैना की साड़ी को धीरे-धीरे उसके जिस्म से अलग किया और जब वह पूरी तरह से निर्वस्त्र हुई तो उसकी खूबसूरती देख समीर की आंखें फटी की फटी रह गई क्योंकि उसका शरीर दूध जैसा सफेद और हर अंग पूरी तरह से विकसित था। नैना की खाई के आस-पास के काले बाल उसकी गोरी रंगत पर बहुत ही आकर्षक लग रहे थे और वहां से निकलने वाली प्राकृतिक गंध समीर को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी। समीर ने झुककर नैना के तरबूजों पर लगे मटर जैसे दानों को अपने मुंह में लिया और उन्हें धीरे-धीरे चूसने लगा जिससे नैना की कमर ऊपर की ओर धनुष की तरह मुड़ने लगी और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ने लगी। नैना की सिसकारियां अब तेज हो रही थीं और उसने समीर के हाथ को पकड़कर अपनी उस गीली और रेशमी खाई की ओर ले जाने का इशारा किया जो अब रस से पूरी तरह सराबोर हो चुकी थी।

समीर ने अपनी उंगली से उस गहरी खाई को खोदना शुरू किया तो उसे महसूस हुआ कि नैना कितनी ज्यादा तैयार है क्योंकि उसकी उंगली पूरी की पूरी उस फिसलन भरी जगह में समा रही थी। नैना ने तड़पते हुए समीर के पैंट की चेन खोली और उसके भीतर छिपे उस गरम और सख्त खीरे को बाहर निकाला जो अब पूरी तरह से अपना आकार ले चुका था और अपनी प्यास बुझाने के लिए बेकरार था। नैना ने उस गरम खीरे को अपने हाथों में पकड़ा और उसे सहलाने लगी, फिर उसने झुककर उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे बड़ी ही शिद्दत के साथ चूसने लगी। समीर को अपनी नसों में खून का बहाव इतना तेज महसूस हो रहा था कि उसे लगा कि उसका रस अभी निकल जाएगा, लेकिन उसने खुद पर काबू पाया और नैना को फर्श पर लिटा दिया। अब समय था उस अंतिम क्रिया का जिसके लिए दोनों का शरीर और आत्मा तड़प रहे थे, समीर ने नैना की टांगों को फैलाया और अपनी जगह बनाई।

समीर ने अपने सख्त खीरे की नोक को नैना की रसभरी खाई के द्वार पर रखा और एक गहरा सांस लेते हुए धीरे से उसे भीतर धकेला जिससे नैना की आंखों से खुशी और दर्द का एक मिला-जुला आंसू निकल पड़ा। जैसे-जैसे वह खीरा उस तंग खाई की गहराइयों को नाप रहा था, वैसे-वैसे नैना की आवाजें और भी ज्यादा सुरीली और तेज होती जा रही थीं जो बंद कमरे में गूंज रही थीं। समीर अब पूरी लय में आ चुका था और वह सामने से खोदना (मिशनरी) शुरू कर चुका था, हर धक्के के साथ नैना के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाजें उस रात के सन्नाटे में संगीत की तरह लग रही थीं। नैना ने अपने पैर समीर की कमर के चारों ओर कस लिए थे ताकि वह हर धक्के की गहराई को अपने भीतर महसूस कर सके और वह बार-बार समीर के कान में कह रही थी कि उसे और जोर से खोदा जाए। समीर का शरीर पसीने से नहा चुका था लेकिन उसकी ऊर्जा कम होने की जगह बढ़ती ही जा रही थी क्योंकि नैना की उस गर्म खाई की पकड़ बहुत ही मजबूत और सुखद थी।

थोड़ी देर बाद समीर ने नैना की पोजीशन बदली और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया ताकि वह पिछवाड़े से खोदना (डॉगी स्टाइल) शुरू कर सके, जो नैना को और भी ज्यादा पसंद आ रहा था। पीछे से देखने पर नैना का वह भारी पिछवाड़ा और उसके बीच में जाती समीर की हरकतें किसी कामुक फिल्म के दृश्य जैसी लग रही थीं जहाँ हर प्रहार नैना को चरम सुख की ओर ले जा रहा था। नैना अपनी हथेलियों को फर्श पर टिकाए हुए जोर-जोर से हांफ रही थी और उसका पूरा बदन थरथराहट के साथ कांप रहा था क्योंकि वह अब अपने रस छूटने के करीब पहुंच रही थी। समीर ने भी अपनी गति बढ़ा दी थी और वह अब पूरी ताकत के साथ उस खाई की खुदाई कर रहा था, उसका हर धक्का नैना के गर्भाशय तक महसूस हो रहा था जो उसे पागल बना रहा था। अंततः नैना के शरीर में एक जोरदार कंपन हुआ और उसकी खाई से गरम रस का फव्वारा छूट पड़ा जिसने समीर के खीरे को पूरी तरह से नहला दिया और वह निढाल होकर फर्श पर गिर पड़ी।

नैना के रस निकलने के तुरंत बाद समीर ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी और कुछ ही सेकंड के भीतर उसके खीरे ने भी अपना सारा गरम सफेद रस नैना की उस गहरी और पवित्र खाई के भीतर उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए भारी सांसें ले रहे थे और उनके शरीर से निकलता पसीना उनके मिलन की गवाही दे रहा था, उस पल दफ्तर की वो डेडलाइन और काम की चिंता कहीं बहुत पीछे छूट गई थी। नैना ने समीर के माथे को चूमा और उसकी आंखों में एक ऐसा सम्मान और प्यार था जो शायद पहले कभी नहीं देखा गया था, क्योंकि इस खुदाई ने उनके बीच के पेशेवर रिश्ते को एक रूहानी जुड़ाव में बदल दिया था। काफी देर तक वे वैसे ही लेटे रहे, शांत और संतुष्ट, उस अहसास को महसूस करते हुए जो केवल दो शरीर के पूरी तरह एक होने पर ही प्राप्त होता है। फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपने कपड़े पहने और उस बिखरे हुए माहौल को ठीक किया, लेकिन उन दोनों के मन में यह बात साफ थी कि यह रात उनके जीवन की सबसे यादगार और सुकून भरी रात बन चुकी है।

अगली सुबह जब दफ्तर के बाकी लोग आए, तो किसी को अंदाजा भी नहीं था कि उन फाइलों और मेजों के पीछे रात भर क्या रोमांचक खेल चला था, बस समीर और नैना की आंखों में एक-दूसरे के लिए एक गुप्त मुस्कान थी। नैना अब समीर के लिए सिर्फ एक बॉस नहीं थी बल्कि वह उसकी उस रात की सबसे करीबी हमराही बन चुकी थी जिसने अपनी खाई और दिल दोनों के दरवाजे उसके लिए खोल दिए थे। काम जारी रहा, लेकिन अब दफ्तर की हर शाम समीर के लिए एक नई उम्मीद लेकर आती थी क्योंकि उसे पता था कि कभी-कभी डेडलाइन के बहाने ही सही, उसे फिर से उस रेशमी साड़ी के भीतर छिपे खजाने को खोजने का मौका मिलेगा। उनकी यह कहानी अब दफ्तर की दीवारों में एक राज की तरह दफन थी, लेकिन उनके जिस्मों पर लगी वो खुशबू आज भी उन्हें उस रात की याद दिलाती थी जब उन्होंने काम के बीच अपनी प्यास बुझाई थी।