रात की घनी कालिमा गांव की संकरी गलियों पर छाई हुई थी, जहां दूर-दूर तक सिर्फ झींगुरों की आवाजें गूंज रही थीं और हवा में मिट्टी की सोंधी महक फैली हुई थी, जैसे कोई पुरानी यादें फिर से जीवित हो रही हों। मीरा, एक साधारण गृहिणी जिसकी उम्र तीस के आसपास थी, अपने छोटे से मिट्टी के घर में अकेली थी, उसके पति शहर में मजदूरी करने गए हुए थे और कई दिनों तक लौटने वाले नहीं थे। वह रसोई में आखिरी काम निपटा रही थी, चूल्हे की बुझती आग की लपटें उसके चेहरे पर नाच रही थीं, जब अचानक दरवाजे पर एक हल्की खटखटाहट हुई जो उसके दिल को धड़का गई, क्योंकि रात के इस समय कोई मेहमान आने की उम्मीद नहीं थी। बाहर से तीन अजनबी पुरुषों की आवाजें आईं, जो खुद को रास्ता भटके यात्री बता रहे थे और पानी मांग रहे थे, उनकी आवाजों में एक अजीब सा आत्मविश्वास था जो मीरा को सतर्क कर रहा था।
मीरा की आंखों में थोड़ी झिझक थी, उसका मन कह रहा था कि दरवाजा न खोलें लेकिन गांव की पुरानी परंपरा ने उसे मजबूर कर दिया कि मेहमान को ठुकराना पाप है, इसलिए उसने साड़ी ठीक की और दरवाजा खोल दिया। वे तीनों मजबूत कद-काठी के थे, उनकी आंखों में एक चमक थी जो रात की अंधेरी गलियों से भी ज्यादा रहस्यमयी लग रही थी, और मीरा को असहज कर रही थी, फिर भी वह उन्हें पानी और कुछ फल देकर जल्दी विदा करने की सोच रही थी। जैसे ही वे अंदर आए, कमरे की मद्धिम लालटेन की रोशनी में उनके चेहरे साफ दिखे – एक लंबा जिसका नाम रवि था, दूसरा मोटा जिसका नाम सोहन था, और तीसरा चालाक नजर आने वाला जिसका नाम विक्रम था, उनकी मांसपेशियां जैसे कठोर पत्थर की तरह थीं और वे हंसते हुए बैठ गए, उनकी नजरें मीरा के शरीर पर टिक गईं जहां उसके साड़ी के नीचे छिपे आम जैसे रसीले फल हल्के से हिल रहे थे, जिससे मीरा का दिल तेज धड़कने लगा और वह असहज महसूस कर रही थी लेकिन खुद को संभालते हुए बोली, “भाई साहब, जल्दी से पानी पीजिए और निकल जाइए, रात बहुत हो गई है और यहां अकेली हूं।”
धीरे-धीरे बातचीत बढ़ी, वे तीनों गांव की पुरानी कहानियां सुनाने लगे, जैसे कोई जंगल की सैर या नदी के किनारे की घटनाएं, लेकिन उनकी आंखों में वह आकर्षण साफ झलक रहा था जो मीरा को बेचैन कर रहा था और उसके मन में एक अजीब सी उथल-पुथल पैदा कर रहा था। रवि, जो सबसे लंबा था, मीरा के करीब सरक आया और बोला, “बहन जी, आपकी आंखें कितनी गहरी हैं, जैसे कोई खाई हो जिसमें डूब जाने का मन करता है और कभी बाहर न निकलें,” उसकी आवाज में एक मादकता थी जो मीरा की सांसें तेज कर रही थी, वह पीछे हटना चाहती थी लेकिन उसके पैर जैसे जम गए थे और उसका शरीर एक अजीब सी गर्मी महसूस कर रहा था। सोहन ने हंसते हुए कहा, “हां, और आपके तरबूज जैसे फल कितने रसीले लगते हैं, मन करता है उन्हें छूकर देखें कि कितने मुलायम हैं,” जिससे मीरा का चेहरा लाल हो गया और वह जानती थी कि ये लोग चोर हैं क्योंकि गांव में चोरी की अफवाहें सुन चुकी थी,
लेकिन उनकी मजबूत पकड़ और आकर्षक बातों ने उसे रोक रखा था, जैसे कोई जादू जो उसके मन को बांध रहा हो। विक्रम चुपचाप मुस्कुरा रहा था, उसकी नजर मीरा के पिछवाड़े जैसे गोल और भारी हिस्से पर थी जो साड़ी से थोड़ा उभरा हुआ था और हल्के से हिल रहा था, कमरे में अब गंध बदल गई थी – पसीने की मिली-जुली महक और फलों की ताजगी जैसी जो मीरा को और ज्यादा उत्तेजित कर रही थी, बाहर से हवा की सरसराहट आ रही थी लेकिन अंदर का माहौल गर्म हो रहा था। मीरा खुद को रोकना चाहती थी, उसके मन में डर था कि यह गलत है लेकिन उनके स्पर्श की कल्पना ने उसके विचारों में एक उलझन पैदा कर दी जहां इच्छा और नैतिकता आपस में लड़ रही थीं, और वह सोच रही थी कि क्या यह सिर्फ एक रात की बात है या कुछ और।
जैसे-जैसे रात गहराती गई, वे तीनों मीरा के और करीब आते गए, उनकी बातें अब ज्यादा व्यक्तिगत हो गईं जैसे मीरा की अकेली जिंदगी पर सवाल और उसके शरीर की तारीफें, जो मीरा को और ज्यादा झिझक पैदा कर रही थीं। रवि ने मीरा का हाथ पकड़ लिया, उसकी उंगलियां मीरा की कलाई पर घूम रही थीं जैसे कोई फल का रस चूसने की तैयारी कर रहा हो, और मीरा की सांसें रुक गईं, वह झिझकते हुए बोली, “यह गलत है, आप लोग जाइए, मेरे पति आ जाएंगे,” लेकिन उसकी आवाज में वह दृढ़ता नहीं थी जो पहले थी क्योंकि उसके शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी। सोहन ने पीछे से मीरा की कमर को छुआ, जहां उसका बगीचा जैसे फैला हुआ क्षेत्र महसूस हो रहा था जो गहरा और रसीला लग रहा था, और बोला, “बहन जी, बस एक बार देखिए, हमारी गाजर कितनी लंबी और सख्त है,
जैसे आपके खाई में खुदाई के लिए बनी हो,” जिससे मीरा की अनिच्छा कमजोर पड़ रही थी और वह पीछे हटी लेकिन विक्रम ने आगे से उसके संतरों जैसे गोल और मुलायम फलों को हल्के से दबाया, जिससे एक मीठी सी सिहरन उसके पूरे शरीर में दौड़ गई और उसके मुंह से एक हल्की सी आह निकली। कमरे की हवा अब पूरी तरह गर्म हो चुकी थी, बाहर से कुत्तों की भौं-भौं की आवाजें आ रही थीं लेकिन अंदर का माहौल अलग था – स्पर्श की नरमी जो त्वचा पर बिजली जैसी दौड़ रही थी, गंध की मादकता जो पसीने और फलों की मिली-जुली थी, और ध्वनियों की मिश्रित कराहें जो अभी शुरू हो रही थीं। मीरा का मन उलझन में था, वह जानती थी कि यह पाप है लेकिन उनके आकर्षण ने उसे रोक लिया जैसे कोई जाल जिसमें फंसकर निकलना मुश्किल हो, और उसकी इच्छा अब धीरे-धीरे हावी हो रही थी जबकि अनिच्छा अभी भी लड़ रही थी।
अब निकटता की घड़ी आ गई थी, मीरा को वे तीनों धीरे से जमीन पर लिटा चुके थे जहां पुरानी चटाई की खुरदरी सतह उसके शरीर को छू रही थी और एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी, रवि ने सबसे पहले अपनी गाजर जैसी मोटी और लंबी चीज निकाली जो सख्त होकर मीरा की खाई के पास आ गई और हल्के से छू रही थी। मीरा की आंखें बंद हो गईं, वह बोली, “नहीं, यह मत करो, मैं शादीशुदा हूं,” लेकिन उसकी अनिच्छा कमजोर पड़ रही थी क्योंकि उसके शरीर में गर्मी बढ़ रही थी, सोहन और विक्रम ने मीरा के आम जैसे रसीले फलों को पकड़ा और उनके अंगूर जैसे छोटे मीठे हिस्सों को रस चूसने लगे, जिससे मीरा के मुंह से आह की ध्वनि निकली जैसे कोई फल पककर रस छोड़ रहा हो और उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। पर्यावरण में अब पसीने की गंध पूरी तरह मिली हुई थी, कमरे की दीवारों पर छाया की परछाइयां नाच रही थीं जैसे कोई नृत्य हो रहा हो, और बाहर हवा की सरसराहट सब कुछ छिपा रही थी
जबकि अंदर स्पर्श की गर्मी बढ़ रही थी। रवि ने धीरे से अपनी गाजर मीरा की खाई में खुदाई शुरू की, बारी-बारी से गहराई में धकेलते हुए जिससे मीरा का शरीर सिहर उठा और वह कराहने लगी, “आह... यह कितनी गहराई में जा रही है, धीरे करो,” लेकिन उसकी आवाज में मजा झलक रहा था। विक्रम ने अपनी बारी ली, अपनी गाजर को मीरा के पिछवाड़े जैसे गोल और भारी हिस्से में खुदाई करते हुए पीछे से मजा लेते हुए, जबकि सोहन मीरा के तरबूज जैसे बड़े और रसीले फलों को दबा रहा था और रस चूस रहा था, हर क्रिया विस्तार से हो रही थी – पहले धीरे-धीरे खुदाई करके, फिर गति बढ़ाकर, और मीरा को आराम देने के लिए रुककर, लेकिन उत्तेजना बनी रही, मीरा खुद को रोक नहीं पा रही थी क्योंकि उसकी इच्छा अब डर पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी और वह भी हल्के से अपनी कमर हिला रही थी।
गहनता अब चरम पर पहुंच गई थी, वे तीनों मीरा को अलग-अलग दिशाओं से घेर चुके थे – रवि आगे से खाई में अपनी गाजर से खुदाई कर रहा था धीरे-धीरे गहराई नापते हुए, सोहन पीछे से पिछवाड़े में अपनी गाजर से खुदाई करते हुए जहां गोलाई और भारीपन से एक नई सिहरन पैदा हो रही थी, और विक्रम ऊपर से संतरों जैसे गोल फलों का रस चूस रहा था जबकि उसके हाथ मीरा की झाड़ी जैसी हल्की हरियाली पर घूम रहे थे। मीरा की कराहें कमरे में गूंज रही थीं, “ओह... रस निकलने वाला है... आह... और गहराई में खुदाई करो,” जैसे फल पककर रस छोड़ रहे हों और उसका शरीर कांप रहा था, रवि की गाजर अब तेजी से अंदर-बाहर हो रही थी मीरा की खाई की गहराई से रगड़ खाते हुए जहां रस की चिपचिपाहट बढ़ रही थी, जबकि सोहन की गाजर मीरा के बगीचे जैसे फैले क्षेत्र में गहराई तलाश रही थी
और पीछे से धक्के दे रही थी। विक्रम ने मीरा को घुमाया, अब वह ऊपर थी अपने तरबूजों को हिलाते हुए रवि की गाजर पर बैठ गई और धीरे-धीरे नीचे-ऊपर हो रही थी, जबकि पीछे से सोहन ने अपनी गाजर से खुदाई की और हाथों से मीरा की कमर पकड़ ली, स्पर्श की नरमी अब तेज हो गई थी जैसे त्वचा पर आग लगी हो, गंध की मिश्रित मादकता पसीने और रस की थी, और ध्वनियों की आह-ओह सब मिलकर एक तूफान पैदा कर रहे थे जहां मीरा की हर कराह गूंज रही थी। मीरा की भावनाएं पूरी तरह उलझी हुई थीं – डर और शर्म अभी भी थी लेकिन मजा इतना गहन था कि वह रोक नहीं पा रही थी, वे बारी-बारी बदलते रहे हर पोजीशन विस्तार से – पहले लेटकर जहां मीरा नीचे थी और वे ऊपर से खुदाई कर रहे थे, फिर बैठकर जहां मीरा गोद में थी और हिल रही थी, फिर खड़े होकर जहां दीवार के सहारे मीरा को उठाकर खुदाई कर रहे थे ताकि थकान न आए और उत्तेजना बनी रहे, मीरा से कई बार रस निकला हर बार जैसे फल फट रहा हो, और वे तीनों भी रस निकालकर मीरा के शरीर पर फल के रस जैसा छोड़कर थके नहीं।
रात अब और गहरा रही थी लेकिन उनकी उत्तेजना कम नहीं हुई, वे मीरा को नए-नए तरीकों से घेरते रहे – एक बार सभी मिलकर जहां रवि आगे से खाई में खुदाई कर रहा था, सोहन पीछे से पिछवाड़े में, और विक्रम मीरा के अंगूरों को चूसते हुए उसके संतरों को दबा रहा था, मीरा की कराहें अब और तेज हो गईं, “आह... यह कितनी मोटी है... ओह... रस निकल गया फिर से,” और कमरे में ध्वनियां गूंज रही थीं जैसे कोई बाग में फल तोड़ रहा हो जहां चप-चप की आवाजें मिल रही थीं। पर्यावरण अब पूरी तरह बदल चुका था – पसीने की गंध, फलों की मिठास, और स्पर्श की गर्मी सब मिलकर एक अलग दुनिया बना चुके थे जहां बाहर की दुनिया भूल गई थी,
मीरा अब पूरी तरह उनके आकर्षण में फंस चुकी थी उसकी अनिच्छा गायब हो गई थी और वह खुद बारी-बारी मजा ले रही थी अपनी कमर हिलाकर और हाथों से उनकी गाजरों को पकड़कर। अंत में जब सुबह की पहली किरण कमरे में घुसी, वे तीनों थककर अलग हुए, मीरा लेटी रही उसके शरीर पर फलों के निशान और रस के छींटे छूटे हुए थे, वह जानती थी कि यह गलत था लेकिन उस रात की गहनता ने उसके मन में एक नई उलझन पैदा कर दी जहां डर और सुख आपस में गुंथ गए थे और वह सोच रही थी कि क्या यह सिर्फ एक सपना था या हकीकत जो दोबारा हो सकती है।
