सावन की वह तूफानी रात थी, जब आसमान से पानी किसी झरने की तरह गिर रहा था और मीरा, जो अपने दफ्तर से काफी देर से निकली थी, सड़क के किनारे खड़ी होकर किसी सवारी का इंतज़ार कर रही थी, उसकी साड़ी बारिश के पानी से पूरी तरह भीग चुकी थी और उसके बदन से ऐसे चिपकी हुई थी जैसे दूसरी त्वचा हो, जिससे उसके शरीर के उभार, खास तौर पर उसकी छाती पर लटके हुए दो बड़े और रसीले तरबूज, स्पष्ट रूप से उभर आए थे, जो ठंडक के कारण अकड़ रहे थे। सड़क बिल्कुल सूनसान थी और स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में बारिश की बूंदें चमक रही थीं, तभी अंधेरे को चीरता हुआ एक ऑटो रिक्शा आया, जिसके इंजन की आवाज़ इस सन्नाटे में किसी उम्मीद की तरह गूंजी, और मीरा ने राहत की सांस लेते हुए हाथ हिलाया, यह नहीं जानते हुए कि आज की रात उसे किस तरह का अनुभव मिलने वाला था।
ऑटो चालक, जिसका नाम राजू था, एक गठीले बदन का नौजवान था, जिसकी बाहों की नसें स्टेयरिंग पकड़ते समय साफ दिखाई दे रही थीं, उसने ऑटो रोका और पीछे मुड़कर देखा, तो उसकी नज़र मीरा के भीगे हुए बदन पर अटक गई, जहां उसके ब्लाउज के अंदर कैद दो भारी-भरकम आम पानी के वजन से और भी ज्यादा रसीले और आकर्षक लग रहे थे, और साड़ी का पल्लू गिरने से उसके अंगूर ठंड से सख्त होकर कपड़े को भेदने की कोशिश कर रहे थे। मीरा ने झिझकते हुए ऑटो में कदम रखा, और जैसे ही वह पिछली सीट पर बैठी, उसका भारी और गोल कद्दू सीट पर जम गया, और राजू ने रियर-व्यू मिरर (शीशे) को इस तरह सेट किया कि वह गाड़ी चलाते वक्त पीछे बैठी इस भीगी हुई अप्सरा के हर इंच का मुआयना कर सके, उसके मन में एक अजीब सी गर्मी पैदा हो रही थी जो बाहर की ठंडक के बिल्कुल विपरीत थी।
राजू ने ऑटो स्टार्ट किया और ऊबड़-खाबड़ सड़क पर गाड़ी दौड़ा दी, हर झटके के साथ मीरा के सीने पर मौजूद वो रसीले संतरे बुरी तरह हिल रहे थे, और वह अपनी बाहें सिकोड़े बैठी थी, लेकिन उसकी नज़र बार-बार शीशे में राजू की आंखों से टकरा रही थी, जिनमें एक जंगली भूख दिखाई दे रही थी, और मीरा को यह महसूस हो रहा था कि राजू की नज़रें उसके चेहरे पर नहीं, बल्कि उसकी भीगी हुई साड़ी के नीचे छिपी उस गहरी और रहस्यमयी खाई की ओर इशारा कर रही हैं। शहर पीछे छूट चुका था और अब वे एक सुनसान, पेड़-पौधों से घिरे रास्ते से गुज़र रहे थे, तभी अचानक ऑटो के इंजन ने एक जोर की आवाज़ की और गाड़ी एक झटके के साथ रुक गई, जिससे मीरा का शरीर आगे की ओर झुका और उसके आम लोहे की जाली से जा टकराए।
"क्या हुआ?" मीरा ने घबराई हुई आवाज़ में पूछा, लेकिन उसकी आवाज़ में डर से ज्यादा एक अजीब सी उत्तेजना थी क्योंकि बाहर का माहौल बहुत ही नशीला था। राजू बिना कुछ बोले अपनी सीट से उतरा और पीछे की तरफ आया, बारिश में भीगते हुए उसकी शर्ट उसके सीने से चिपक गई थी, और उसकी पैंट के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा और सख्त केला अपना आकार ले चुका था, जो कपड़े के अंदर से साफ तौर पर एक विशाल गाजर की तरह तना हुआ दिखाई दे रहा था। वह मीरा के पास आया और बोला, "मैडम, इंजन गर्म हो गया है, थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा," लेकिन उसकी आवाज़ भारी थी और वह मीरा के बहुत करीब आ गया था, इतना करीब कि मीरा उसके पसीने और बारिश की मिली-जुली मर्दाना गंध को महसूस कर सकती थी।
मीरा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, उसे राजू को मना करना चाहिए था, लेकिन जब राजू की नज़र उसके भीगे हुए तरबूजों पर पड़ी, तो मीरा के अंदर की प्यास जाग उठी; राजू ने धीरे से हाथ बढ़ाया और मीरा के गाल को छूते हुए अपनी उंगलियां नीचे सरकाईं, और जैसे ही उसका खुरदरा हाथ मीरा के भीगे हुए अंगूर पर लगा, मीरा के मुंह से एक सिसकी निकल गई। वह खुद को रोक नहीं पाई, माहौल की गर्मी और उस सुनसान जगह के अकेलेपन ने उसे कमजोर कर दिया था, और उसने विरोध करने के बजाय अपनी आंखें मूंद लीं, जिससे राजू को और हिम्मत मिल गई और उसने अपने दोनों हाथों से मीरा के रसीले आमो को पकड़ लिया और उन्हें किसी पके हुए फल की तरह दबाने लगा।
राजू अब पूरी तरह से पिछली सीट पर मीरा के पास आ गया था, जगह कम थी लेकिन जज़्बात बहुत ज्यादा थे; उसने मीरा की साड़ी को ऊपर उठाया, जहां उसकी चिकनी जांघों के बीच एक घनी झाड़ी थी, जो बारिश की नमी और मीरा के अंदर से बहने वाले प्राकृतिक रस के कारण गीली हो चुकी थी। मीरा ने शर्म से अपनी जांघें बंद करने की कोशिश की, लेकिन राजू ने अपनी मजबूत टांगों से उसके पैरों को चौड़ा कर दिया, जिससे उसकी गहरी और गुलाबी खाई राजू की नज़रों के सामने अनावृत हो गई, जो किसी प्यासे किसान का इंतज़ार कर रही थी। राजू ने अपनी पैंट की ज़िप खोली और वहां से उसका मोटा, लंबा और सख्त केला बाहर उछल आया, जो लाल और गुस्से में तनी हुई किसी गाजर जैसा लग रहा था, जिसके सिरे पर नारियल का पानी छलकने को बेताब था।
मीरा ने उस विशाल सब्जी को देखा और उसकी सांसें अटक गईं, उसने कभी इतना बड़ा और मोटा फल नहीं देखा था; राजू ने मीरा को अपनी ओर खींचा और उसके रसीले अंगूरों को अपने मुंह में भरकर उनका रस चूसना शुरू कर दिया, जबकि उसका एक हाथ नीचे जाकर मीरा की झाड़ी के बीच रास्ता बनाते हुए उस गीली खाई के मुहाने पर उंगलियों से खेलने लगा। मीरा का पूरा शरीर बिजली के झटके की तरह कांप रहा था, उसकी खाई अब इतनी गीली हो चुकी थी कि वहां बाढ़ आने जैसी स्थिति थी, और वह तड़पते हुए बोली, "राजू... अब और इंतज़ार नहीं होता, अपनी गाजर से मेरी इस जमीन की खुदाई कर दो।"
राजू ने अब और देर नहीं की, उसने मीरा को सीट पर थोड़ा लिटाया, उसके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रखा जिससे उसका भारी पिछवाड़ा हवा में उठ गया और उसकी खाई पूरी तरह से खुल गई। राजू ने अपने सख्त केले की नोक को उस रसीली गुफा के द्वार पर सेट किया और एक ही झटके में अपनी कमर को आगे धकेल दिया; मीरा चीख पड़ी क्योंकि वह मोटी गाजर उसकी तंग और संकरी खाई को चौड़ा करते हुए गहराई तक उतर गई थी, जैसे किसी ने उपजाऊ जमीन में हल चला दिया हो। यह दर्द और आनंद का एक ऐसा मिश्रण था जिसने मीरा की आंखों से आंसू निकाल दिए, लेकिन उसने अपनी टांगें राजू की कमर के इर्द-गिर्द कस लीं।
अब ऑटो के हिलने की वजह इंजन नहीं, बल्कि राजू की कमर की रफ्तार थी; वह एक लय में अपनी गाजर को बाहर निकालता और फिर पूरी ताकत से उस गीली खाई में ठोक देता, हर धक्के के साथ एक 'चप-चप' की आवाज़ आ रही थी जो फलों के रस के बहने का संकेत थी। राजू अपने हाथों से मीरा के बड़े-बड़े तरबूजों को मसल रहा था, कभी उन्हें दबाता तो कभी उनके अंगूरों को दांतों से हल्का काटता, जबकि नीचे उसकी खुदाई का काम पूरी तीव्रता पर चल रहा था। मीरा का सिर पीछे की ओर लुढ़क गया था, वह राजू के हर वार का जवाब अपनी कमर को ऊपर उठाकर दे रही थी, चाहती थी कि वह केला उसकी गहराई की आखिरी सीमा तक पहुंचे।
बारिश बाहर तेज हो गई थी, और अंदर तूफ़ान अपने चरम पर था; राजू की गाजर अब घर्षण के कारण और भी ज्यादा सख्त और गर्म हो गई थी, और मीरा की खाई ने उसे चारों तरफ से जकड़ लिया था। दोनों की सांसें एक हो गई थीं, पसीना और बारिश का पानी मिलकर उनके नग्न शरीरों पर चमक रहा था, तभी मीरा का शरीर अकड़ने लगा, उसकी खाई ने राजू के केले को भींचना शुरू कर दिया, और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी क्योंकि उसके अंदर का फल पूरी तरह पक चुका था और अब उसमें से रस निकलने वाला था। राजू ने भी यह महसूस किया और अपनी रफ्तार दोगुनी कर दी, पागलों की तरह धक्के मारते हुए वह अंतिम सीमा तक गया।
अचानक, मीरा के शरीर में एक जोरदार कंपन हुआ और उसकी खाई से प्रचुर मात्रा में रस बह निकला, जिसने राजू की गाजर को नहला दिया; उसी पल राजू भी अपनी बर्दाश्त की सीमा पार कर गया, उसने एक गहरा धक्का मारा और रुक गया, उसकी गाजर के मुख से गाढ़ा और गर्म नारियल का पानी पिचकारी की तरह छूटकर मीरा की खाई के सबसे गहरे कोने में भर गया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए, हांफते रहे, जबकि ऑटो की छत पर बारिश की बूंदें अब किसी संगीत की तरह लग रही थीं, और मीरा के अंदर भरा हुआ वह गर्म मलाईदार रस उसे एक अद्भुत सुकून दे रहा था, जो उस तूफानी रात की सबसे मीठी याद बन गया।
