जेठ की चिलचिलाती धूप ने पूरे गाँव को अपनी चपेट में ले रखा था, गर्म हवा के थपेड़े चल रहे थे और सन्नाटा इतना गहरा था कि दूर कहीं पेड़ पर बैठे पक्षी की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। घर के सभी लोग दोपहर के भारी भोजन के बाद गहरी नींद में सो चुके थे, लेकिन शहर से आई सुमन की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था क्योंकि गाँव की उमस और गर्मी ने उसके बदन को पसीने से तर-बतर कर दिया था। सुमन अभी अपनी जवानी की दहलीज पर खड़ी थी, उसका शरीर एक ऐसे 'बगीचे' की तरह था जहाँ हरियाली और फूलों की बहार तो आ चुकी थी, लेकिन किसी भी माली ने अभी तक वहाँ कदम नहीं रखा था। वह गर्मी से बेहाल होकर पीछे के बाड़े की तरफ चल दी, जहाँ ट्यूबवेल के ठंडे पानी का होज़ पाइप लगा हुआ था और जहाँ अक्सर उसके जीजाजी, रमेश, दोपहर में बैलों को चारा डालते थे।
सुमन ने साडी पहनी थी पसीने की वजह से उसके शरीर से चिपका हुआ था, जिससे उसके गठे हुए और रसीले 'तरबूज' अपनी पूरी गोलाई के साथ उभर कर दिख रहे थे, और चलते समय वे ऐसे हिलते थे जैसे डाली पर लगे पके हुए फल हवा में झूल रहे हों। रमेश, जो बाड़े की छाया में खटिया पर लेटा सुस्ता रहा था, उसकी नज़र अचानक सुमन पर पड़ी। धूप की वजह से सुमन का गोरा रंग और भी चमक रहा था, और उसके भीगे कपड़ों के नीचे से उसके सख्त 'अंगूर' साफ झांक रहे थे, जो कपड़े को भेदकर बाहर आने की जिद कर रहे थे। रमेश की साँसें यह नज़ारा देखकर अटक गईं; उसने अपनी पत्नी (सुमन की दीदी) के साथ कई बार 'खुदाई' की थी, लेकिन सुमन की जवानी में जो कच्चापन और कसावट थी, वह उसे दीवाना बना रही थी। उसकी धोती के अंदर उसका 'केला' अचानक से नींद से जाग उठा और एक मोटे, सख्त 'गाजर' में बदल गया, जो फन उठाए बाहर आने को तैयार था।
सुमन को अंदाज़ा नहीं था कि रमेश वहाँ जाग रहा है, उसने गर्मी से राहत पाने के लिए ट्यूबवेल का पाइप चालू किया और पानी की ठंडी धार अपने चेहरे और गर्दन पर डालने लगी। पानी की बूंदें उसके चेहरे से होती हुई उसकी गर्दन और फिर उसके भारी 'आमों' के बीच की घाटी में समा रही थीं, जिससे उसका कुर्ता पूरी तरह पारदर्शी हो गया। अब रमेश के लिए खुद को रोकना नामुमकिन हो गया था; सुमन के 'संतरे' पानी में भीगकर और भी बड़े और रसीले लग रहे थे, और नीचे की सलवार गीली होने से उसकी जांघों के बीच का वह गहरा 'बगीचा' और उसके ऊपर की हल्की 'झाड़ी' की परछाई साफ झलक रही थी। रमेश धीरे से उठा और बिल्ली जैसे कदमों से सुमन के पीछे जाकर खड़ा हो गया, उसकी आँखों में एक भूखे शिकारी जैसी चमक थी जो आज एक नई और अनछुई 'खाई' की गहराई नापना चाहता था।
"साली साहिबा, इतनी गर्मी में अकेले नहा रही हो? लाओ, मैं मदद कर दूँ," रमेश की भारी और मर्दाना आवाज़ सुनकर सुमन चौंक गई और पलटी, लेकिन तब तक रमेश उसके बहुत करीब आ चुका था। सुमन के गाल शर्म और घबराहट से लाल हो गए, उसने अपने हाथों से अपने गीले 'आमों' को ढकने की कोशिश की, लेकिन रमेश ने उसके हाथों को धीरे से पकड़कर हटा दिया। "जीजाजी, कोई देख लेगा... यह गलत है," सुमन ने कांपती आवाज़ में कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में विरोध से ज़्यादा एक अजीब सी कशिश थी। रमेश ने बिना कुछ बोले सुमन को अपनी बाहों में भर लिया, सुमन का नरम और नाजुक शरीर रमेश के सख्त और पसीने से लथपथ सीने से टकराया, और उसे रमेश की धोती के अंदर उस विशाल 'गाजर' की कठोरता अपनी जांघों पर महसूस हुई।
रमेश ने सुमन के भीगे बालों को पीछे किया और उसकी गर्दन पर अपना मुंह लगा दिया, वहाँ की नमकीन त्वचा का 'रस चूसने' लगा। सुमन के मुंह से एक सिसकी निकल गई, उसका शरीर उस स्पर्श से पिघलने लगा था जैसे धूप में मक्खन पिघलता है। रमेश के हाथ अब बेखौफ होकर सुमन की पीठ पर घूम रहे थे और फिर नीचे सरकते हुए उसके बड़े और गोल 'गोंडों' पर जा टिके, जो किसी भरी हुई बोरी की तरह भारी और गद्देदार थे। रमेश ने उन 'गोंडों' को अपनी मजबूत उंगलियों से जोर से भींचा और मसलना शुरू कर दिया, जिससे सुमन की 'खाई' में अचानक बाढ़ आ गई, उसका 'बगीचा' गीला हो गया और वहां से कुदरती 'रस' बहने लगा।
धूप की गर्मी और शरीर की आग मिलकर दोनों को जला रही थी। रमेश ने सुमन को वहीं पास में पड़ी घास की ढेर पर लिटा दिया, जो धूप में तपकर नरम हो चुकी थी। उसने सुमन का गीला कुर्ता ऊपर खींचा और उसके रसीले 'तरबूजों' को आज़ाद कर दिया, जो अब पूरी शान से आकाश की तरफ देख रहे थे, और उनके ऊपर के गुलाबी 'अंगूर' तने हुए थे। रमेश एक पल के लिए उस खूबसूरती को निहारता रहा और फिर एक भूखे जानवर की तरह उन पर टूट पड़ा। वह बारी-बारी से उन 'आमों' को अपने मुंह में भरता, उनका 'रस चूसता' और 'अंगूरों' को अपनी जीभ की नोक से गुदगुदाता। सुमन का शरीर धनुष की तरह तन गया, वह रमेश के बालों में उंगलियां फंसाकर उसे और जोर से चूसने के लिए उकसाने लगी, उसकी 'खाई' अब इतनी गीली हो चुकी थी कि वह 'खुदाई' के लिए तड़प रही थी।
रमेश ने अब सुमन की सलवार को नीचे खींचकर उसके पैरों से अलग कर दिया। सामने वह नजारा था जिसका वह सपना देख रहा था—सुमन का अनछुआ 'बगीचा', जिसके ऊपर हल्की भूरी 'झाड़ी' थी और बीच में वह गुलाबी, तंग 'खाई' थी जो आज तक बंद थी। रमेश ने अपनी धोती खोली और अपना विशाल, नसों वाला 'केला' बाहर निकाला, जो धूप में चमक रहा था और आकार में किसी बड़े लौकी जैसा लग रहा था। सुमन ने जब उस विशाल 'गाजर' को देखा तो उसकी आँखों में खौफ आ गया, "जीजाजी, यह बहुत बड़ा है... मैं मर जाऊंगी, यह अंदर नहीं जाएगा," वह पीछे खिसकने लगी।
लेकिन रमेश अब सुनने के मूड में नहीं था। उसने सुमन की टांगों को चौड़ा किया और अपने कंधों पर रख लिया, जिससे उसकी 'खाई' का मुंह पूरी तरह खुल गया। रमेश ने अपने 'केले' के मोटे सिरे को उस तंग और संकरी 'खाई' के दरवाजे पर रखा और थोड़ा दबाव बनाया। सुमन चीख पड़ी क्योंकि रास्ता बहुत संकरा था, बिलकुल एक बंद कली की तरह। रमेश ने सुमन के होंठों को अपने होंठों से बंद कर दिया ताकि उसकी चीख बाहर न जाए और धीरे-धीरे, लेकिन मजबूती से धक्का दिया। एक झटके के साथ, उस 'बगीचे' की बरसों पुरानी सील टूट गई, और रमेश का सख्त 'गाजर' उस तंग गुफा में जबरदस्ती घुस गया।
सुमन की आँखों से आंसू निकल आए, दर्द और जलन ने उसे घेर लिया था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा भरा-पूरा अहसास भी हो रहा था। रमेश ने कुछ पल रुककर उसे साँस लेने का मौका दिया और फिर धीरे-धीरे 'खुदाई' शुरू की। वह अपने 'केले' को बाहर खींचता और फिर वापस उस तंग, रसीली और गर्म 'खाई' में जड़ तक उतार देता। हर धक्के के साथ सुमन के 'तरबूज' हिलते और आपस में टकराते। धीरे-धीरे दर्द कम होने लगा और उसकी जगह एक मीठे आनंद ने ले ली। सुमन अब खुद अपनी कमर हिलाकर रमेश के 'गाजर' को अंदर लेने लगी थी, उसकी 'खाई' अब 'रस' से इतनी भर गई थी कि हर धक्के पर 'पच-पच' की रसीली आवाज़ें आ रही थीं।
दोपहर की खामोशी में अब सिर्फ उनकी भारी साँसें, 'गोंडों' के घास पर टकराने की आवाज़ और उस गीली 'खुदाई' का शोर था। रमेश की गति तेज़ होती गई, वह किसी किसान की तरह पूरी ताकत से अपनी ज़मीन जोत रहा था। सुमन भी अब पूरी तरह से इस खेल में शामिल थी, वह रमेश की पीठ पर अपने नाखून गड़ा रही थी और जोर-जोर से कराह रही थी। "और जोर से जीजाजी... मेरा 'रस' निकलने वाला है," वह बड़बड़ाई। रमेश ने यह सुनकर अपनी रफ्तार और बढ़ा दी, वह पागलों की तरह धक्के मार रहा था, जिससे सुमन का पूरा शरीर हिल रहा था।
अचानक, एक जोरदार धक्के के साथ सुमन का शरीर अकड़ गया, उसकी 'खाई' ने रमेश के 'केले' को कसकर जकड़ लिया और उसके अंदर से फव्वारे की तरह 'रस' छूट पड़ा। उसी पल, रमेश का संयम भी टूट गया, उसने एक गहरा धक्का मारा और रुक गया, अपना सारा गाढ़ा और गर्म 'बीज' सुमन की गहरी 'खाई' के अंदर छोड़ दिया। दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनका शरीर पसीने और 'रस' की मिली-जुली सुगंध से महक रहा था। गाँव की वह दोपहर अब ढलने को थी, लेकिन उस खेत के कोने में जो 'खुदाई' हुई थी, उसकी याद सुमन के 'बगीचे' में हमेशा के लिए ताजी रहने वाली थी।
