सूरज डूबने को था और खेतों पर सुनहरी रोशनी फैली हुई थी। उत्तर प्रदेश के एक छोटे गांव के बाहर फैले गेहूं के विशाल खेतों में सुनीता धीरे-धीरे चल रही थी। सुनीता की उम्र पच्चीस साल थी, उसका शरीर जवानी की चरम सीमा पर था – भरे-भरे तरबूज, घुमावदार कमर और नाजुक कदम उसे देखते ही किसी को भी आकर्षित कर सकते थे। उसके पति कई महीनों से शहर में काम पर थे और लौटने का कोई पता नहीं था। सुनीता को अकेलापन बुरी तरह सताता था, रातें बेचैनी से भर जाती थीं, शरीर में एक अनकही प्यास जाग उठती थी जो बुझने का नाम नहीं लेती थी। आज वह खेत में अपने गुप्त प्रेमी अजय से मिलने आई थी। अजय गांव का ही एक युवक था, जो खेती-बाड़ी का काम करता था। उनकी मुलाकात कई महीने पहले हुई थी और धीरे-धीरे उनका रिश्ता इतना गहरा हो गया था कि अब वे बिना एक-दूसरे के रह नहीं पाते थे। सुनीता के मन में आज भी वही पुराना द्वंद्व था – क्या यह सही है, समाज क्या कहेगा, पति की याद आते ही दिल कांप जाता था – लेकिन शरीर की इच्छा उसे खींच लाई थी। खेत की हल्की हवा उसके चेहरे को छू रही थी, फसलों की ताज़ी महक उसके मन को शांत कर रही थी मगर शरीर को और भी उत्तेजित कर रही थी। वह सोच रही थी कि आज अजय के साथ क्या होने वाला है, शर्म से गाल लाल हो रहे थे लेकिन कदम आगे बढ़ते जा रहे थे। अंत में वह उस जगह पहुंच गई जहां अजय पहले से इंतजार कर रहा था। अजय ने उसे देखते ही मुस्कुराकर हाथ बढ़ाया और उसे अपने पास खींच लिया। सुनीता ने हाथ थाम लिया, उसका दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि लग रहा था बाहर निकल आएगा।
अजय की मजबूत लेकिन कोमल उंगलियां सुनीता के हाथ पर फिसल रही थीं, जैसे नरम हवा फसलों को सहला रही हो। वे दोनों घास पर आराम से बैठ गए, चारों तरफ ऊंची फसलें उन्हें पूरी तरह घेर रही थीं, जैसे प्रकृति ने खुद उनका राज़ रखने का इंतजाम कर दिया हो। अजय ने सुनीता की आंखों में गहराई से देखा और धीरे से बोला कि तुम्हारे बिना मेरे दिन कितने खाली हो जाते हैं, तुम्हारी एक झलक मुझे सारी थकान भुला देती है। सुनीता की आंखें नम हो आईं, वह भावुक होकर बोली कि पति के दूर होने से मेरा मन भी सूना पड़ गया है, लेकिन तुमसे मिलकर लगता है जैसे कोई सहारा मिल गया हो, जैसे कोई पुराना घाव भर रहा हो। उनकी बातें धीरे-धीरे बहुत गहरी होती चली गईं, वे अपने सपनों, अपनी उदासी, अपनी छिपी हुई इच्छाओं के बारे में खुलकर बात करने लगे। सुनीता ने शर्माते हुए स्वीकार किया कि उसके शरीर में एक ऐसी प्यास है जो हर रात उसे बेचैन कर देती है, नींद नहीं आती, सांसें भारी हो जाती हैं। अजय ने उसे धीरे से गले लगाया और कहा कि वह उसकी हर इच्छा को पूरी करेगा, लेकिन आज वे सिर्फ पास बैठकर एक-दूसरे की गर्माहट महसूस करेंगे। सुनीता को उसकी बातों में इतना गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस हुआ कि उसकी आंखें बंद हो गईं, जैसे कोई लंबे समय से खोया हुआ सुख वापस आ रहा हो। खेत में हवा के झोंके आ-आकर उनकी साड़ी को हिला रहे थे, सुनीता का मन अब शांत होने लगा था लेकिन उसके शरीर में हल्की-हल्की कंपकंपी शुरू हो चुकी थी, जैसे कोई अनजान लहर धीरे से उठ रही हो।
आकर्षण अब उनके बीच स्पष्ट रूप से बहने लगा था। अजय की चौड़ी छाती और पसीने से चमकता चेहरा सुनीता को और करीब खींच रहा था। सुनीता ने शर्माते हुए अजय की छाती पर हल्का सा हाथ फेरा। अजय मुस्कुराया और सुनीता को अपने सीने से लगा लिया। अब उनके चेहरों के बीच केवल सांसों की गर्मी रह गई थी। अजय ने बहुत धीरे से सुनीता के गाल पर संतरा चूसना शुरू किया, फिर होंठों तक पहुंच गया। सुनीता की सांसें रुक सी गईं, वह पूरी तरह उस पल में खो गई। संतरा चूसना गहरा और लंबा होता गया, उनकी सांसें एक-दूसरे में घुलती चली गईं। सुनीता के शरीर में सिहरन दौड़ गई, उसके तरबूज फूलने लगे थे और ब्लाउज के अंदर मटर कड़े होकर बाहर निकलने को बेताब हो रहे थे। अजय के हाथ धीरे-धीरे सुनीता के कंधों पर फिसले और तरबूजों को बाहर से सहलाने लगे। सुनीता आह भर उठी लेकिन शर्म से उसने आंखें बंद कर लीं। मन में द्वंद्व चल रहा था – यह गलत है, अगर कोई देख लेगा तो क्या होगा – लेकिन इच्छा की लहर इतनी तेज थी कि वह खुद को रोक नहीं पा रही थी। खेत की मिट्टी की सोंधी गंध और उनकी गर्म सांसों का मेल एक अनोखा माहौल बना रहा था, जैसे पूरा खेत उनकी भावनाओं का साक्षी बन गया हो।
झिझक अब सुनीता के अंदर तूफान की तरह उठ रही थी। वह बार-बार सोच रही थी कि अगर किसी ने देख लिया तो उसकी इज्जत, उसका परिवार, सब बर्बाद हो जाएगा। पति की याद आते ही आंसू आ जाते लेकिन अजय की गर्मी और पास आने वाली इच्छा उसे रोक रही थी। अजय ने सुनीता को धीरे से घास पर लिटा दिया और उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा। सुनीता ने कमजोर विरोध किया, “नहीं अजय, कोई आ जाएगा।” लेकिन उसकी आवाज में इच्छा छिपी हुई थी। अजय ने कहा कि यहां सिर्फ हम हैं, फसलें हमें पूरी तरह छिपाए हुए हैं। सुनीता के तरबूज बाहर आ गए, उनके मटर अब पूरी तरह कड़े और संवेदनशील हो चुके थे। अजय ने पहले उंगलियों से मटर को घुमाया, फिर मुंह से संतरा चूसना शुरू किया। सुनीता की पीठ घुमड़ने लगी, वह जोर से कराह उठी, “अहह... धीरे अजय...” पसीना उसकी गर्दन से बहकर तरबूजों पर गिर रहा था। मन में शर्म थी लेकिन शरीर खुशी से झूम रहा था। सुनीता सोच रही थी कि यह पल कितना खतरनाक लेकिन कितना मीठा है, जैसे कोई लंबे समय से देखा सपना सच हो रहा हो।
पहला स्पर्श अब और गहराई में उतर चुका था। अजय ने सुनीता की साड़ी को धीरे-धीरे ऊपर किया और उसकी खाई को देखा, जो पहले से ही गीली और तैयार थी। उसने उंगली से खाई में धीरे से प्रवेश किया, खाई को उंगली से खोदने लगा। सुनीता की आंखें बंद हो गईं, वह सांस रोककर आहें भरने लगी। अजय की उंगली अंदर-बाहर होती रही, खाई के हर कोने को छूती रही। फिर अजय ने सिर झुकाया और खाई चाटना शुरू किया, अपनी जीभ से खाई को पूरी तरह सहलाने लगा। सुनीता का शरीर लहराने लगा, उसकी उंगलियां अजय के बालों में फंस गईं और वह जोर से कराहने लगी। पसीना उनके दोनों शरीरों को चिपका रहा था, खेत की मिट्टी उनकी पीठ से चिपक रही थी। सुनीता को लग रहा था जैसे उसका पूरा अस्तित्व सिर्फ इस सुख में घुल गया हो, लेकिन शर्म का एक छोटा सा कोना अभी भी था जो उसे याद दिला रहा था कि यह गुप्त है। अजय ने अपना खीरा बाहर निकाला, जो कड़ा और पूरी तरह तैयार खड़ा था। सुनीता ने शर्माते हुए उसे देखा और फिर हल्के हाथ से छू लिया।
धीरे-धीरे तीव्रता बढ़ने लगी। सुनीता ने अजय का खीरा मुंह में लेना शुरू किया, खीरा चूसना कर रही थी, अपनी जीभ को खीरे के चारों तरफ घुमाती हुई। अजय कराह उठा, उसकी सांसें तेज हो गईं और वह सुनीता के बालों को सहला रहा था। सुनीता की जीभ खीरे पर नाच रही थी, उसे पूरी तरह चूस रही थी। अजय की उंगलियां सुनीता के तरबूजों को दबा रही थीं, मटर को निचोड़ रही थीं। फिर अजय ने सुनीता को सामने से खोदना शुरू किया, अपना खीरा बहुत धीरे से खाई में डाला। सुनीता चीख उठी लेकिन खुशी की चीख थी, “अहह... पूरी तरह भर गया...” अजय धीरे-धीरे गति बढ़ा रहा था, हर थरकन के साथ सुनीता का शरीर कंप रहा था। वे दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए थे, पसीने से तर, सांसें मिली हुईं। खेत की हवा उनके गर्म शरीरों को ठंडक दे रही थी। सुनीता के मन में अब केवल सुख था, शर्म पीछे छूट चुकी थी।
वे पूरी तरह खुदाई में लीन हो चुके थे। अजय की गति अब तेज होती जा रही थी, सुनीता की खाई खीरे को पूरी तरह समो रही थी। सुनीता की आहें खेत में गूंज रही थीं, “हां अजय, और गहरा... और जोर से...” अजय पसीने से लथपथ था, उसके शरीर की हर मांसपेशी काम कर रही थी। सुनीता का शरीर तन गया, वह रस निकलने के बहुत करीब थी। लेकिन ठीक उसी पल अचानक एक भारी आवाज आई, “यह क्या हो रहा है यहां?” वे दोनों चौंककर अलग हो गए। अजय ने जल्दी से अपना खीरा छिपाया और सुनीता ने अपनी साड़ी संभालने की कोशिश की, लेकिन उसके तरबूज अभी भी बाहर थे और खाई गीली चमक रही थी। उनके सामने खड़ा था राकेश, गांव का हट्टा-कट्टा किसान और खेत का मालिक। राकेश की उम्र पैंतीस साल थी, उसका शरीर लोहे जैसा मजबूत – चौड़ी छाती, मोटी भुजाएं और पसीने से चमकता चेहरा। वह उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा था, लेकिन उसकी आंखों में साफ उत्तेजना झलक रही थी।
सुनीता शर्म से मर गई, उसने दोनों हाथों से तरबूज ढक लिए और खाई पर साड़ी खींच ली। अजय डर से कांप रहा था और भागने की कोशिश कर रहा था। राकेश ने शांत लेकिन मजबूत आवाज में कहा, “सुनीता, मैं सब कुछ देख चुका हूं। तुम्हारी यह खुदाई, अजय के साथ। अगर मैं गांव वालों या तुम्हारे पति को बता दूं तो क्या होगा?” सुनीता की आंखों में आंसू आ गए, वह गिड़गिड़ाई, “राकेश भैया, कृपा करो, किसी को मत बताना।” लेकिन राकेश की नजर सुनीता के खुले तरबूजों और गीली खाई पर अटकी हुई थी। वह बोला, “सुनीता, मैं तुम्हें कई महीनों से देखता आ रहा हूं, तुम्हारी खूबसूरती, तुम्हारे तरबूज, तुम्हारा शरीर... मुझे पागल कर देते हैं। अगर तुम मुझे भी अपना दो, तो मैं चुप रहूंगा।” सुनीता का मन फिर संघर्ष में पड़ गया, डर, शर्म, अपराधबोध, लेकिन राकेश के हट्टे-कट्टे शरीर को देखकर उसकी खाई में फिर से गर्म लहर दौड़ गई। अजय डरकर वहां से चुपचाप भाग गया। अब सिर्फ सुनीता और राकेश थे।
राकेश ने धीरे से सुनीता का हाथ पकड़ा और उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया। सुनीता ने विरोध किया लेकिन उसकी ताकत कम पड़ गई। राकेश ने सुनीता के होंठों पर गहरा संतरा चूसना शुरू किया, उसकी जीभ सुनीता के मुंह में घुस गई। सुनीता की सांसें फिर तेज हो गईं, वह राकेश के मजबूत शरीर से चिपक गई। राकेश के हाथ सुनीता के तरबूजों पर गए, उन्हें जोर से दबाया, मटर को उंगलियों से मसलने लगा। सुनीता कराह उठी, “अहह राकेश... धीरे...” राकेश ने सुनीता को घास पर लिटाया और उसकी खाई को उंगली से खोदना शुरू किया, लेकिन इस बार उंगलियां ज्यादा मजबूत और अनुभवी थीं। सुनीता का शरीर फिर लहराने लगा। राकेश ने अपना खीरा निकाला, जो अजय से भी बड़ा, मोटा और कड़ा था। सुनीता ने देखा और शर्म से आंखें फेर लीं लेकिन उसका हाथ खुद-ब-खुद बढ़ गया और खीरे को पकड़ लिया।
राकेश ने सुनीता को सामने से खोदना शुरू किया, अपना खीरा बहुत धीरे लेकिन गहराई से खाई में डाला। सुनीता जोर से चीख उठी, “ओह... इतना मोटा... पूरी तरह भर गया...” राकेश की गति धीमी लेकिन बहुत ताकतवर थी, हर धक्के से सुनीता का पूरा शरीर हिल जाता था। राकेश के पसीने की बूंदें सुनीता के तरबूजों पर गिर रही थीं, उसकी मजबूत कमर सुनीता की कमर से टकरा रही थी। सुनीता की आहें बढ़ गईं, वह राकेश की पीठ पर नाखून गड़ा रही थी। वे दोनों पूरी तरह लीन हो चुके थे, खेत की फसलें उन्हें पूरी तरह छिपाए हुए थीं। सुनीता का मन अब शर्म और इच्छा के बीच संतुलन बना रहा था, लेकिन सुख इतना गहरा था कि वह भूल गई सब कुछ। राकेश ने सुनीता को पलटा और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, उसकी मजबूत भुजाएं सुनीता की कमर को पकड़े हुए थीं। सुनीता को नया अनोखा सुख मिल रहा था, उसका पिछवाड़ा हर धक्के पर कंप रहा था।
तीव्रता अब चरम पर पहुंच चुकी थी। राकेश की गति तेज होती गई, सुनीता की खाई बार-बार सिकुड़ रही थी। सुनीता का पहला रस निकला, वह चीख उठी, “अहह... रस निकल रहा है...” लेकिन राकेश रुका नहीं, वह जारी रखा। सुनीता का दूसरा रस भी निकला, उसका शरीर थरथरा रहा था। राकेश भी अब रस निकलने के करीब था, उसकी सांसें जानवर की तरह तेज थीं। अंत में दोनों का रस एक साथ निकला, राकेश का गर्म रस सुनीता की खाई में भर गया। वे दोनों थककर एक दूसरे से लिपटे पड़े रहे। पसीना, मिट्टी और सुख का मिश्रण उनके शरीरों पर चिपका हुआ था। सुनीता के मन में अब शांति थी, शर्म के साथ संतोष भी। राकेश ने उसके कान में फुसफुसाया कि यह रहस्य हमेशा हमारे बीच रहेगा। सुनीता मुस्कुराई, उसकी आंखों में नई चमक थी। खेत अब शांत था, लेकिन उनकी यादें हमेशा के लिए खेतों में बसी रहेंगी।
सुनीता धीरे-धीरे उठी, अपनी साड़ी ठीक की, तरबूज ढके और राकेश की ओर देखा। राकेश ने उसे एक आखिरी संतरा चूसना दिया और कहा कि कल फिर मिलेंगे। सुनीता ने हामी भरी, मन में अब कोई पछतावा नहीं था। वह खेत से निकलते हुए सोच रही थी कि जीवन में कभी-कभी ऐसे पल आते हैं जो सब बदल देते हैं। उसकी चाल अब पहले से ज्यादा आत्मविश्वास भरी थी। खेत की हवा फिर से उसके चेहरे को छू रही थी, लेकिन अब वह खुश थी। यह शाम सुनीता के जीवन की सबसे यादगार शाम बन गई थी।
