एक छोटे से उत्तर भारतीय गाँव की कहानी है, जहाँ सुबह की धूप में खेतों की हरियाली चमकती और शाम को नदी किनारे की हवा में मिट्टी की सोंधी महक और बाँसुरी की धुन घुली रहती। वहाँ एक साधारण झोपड़ी में रहती थीं सरिता, उम्र में तैंतीस साल की एक विवाहित महिला – गोरी त्वचा वाली जो धूप में भी चमकती रहती, कद मध्यम लेकिन शरीर वक्राकार और इतना मोहक कि साड़ी पहनकर बाहर निकलते ही गाँव वालों की नजरें टिक जातीं, बड़े-बड़े रसीले आम जो ब्लाउज में मुश्किल से समेटे जाते और हर सांस के साथ हल्के से ऊपर-नीचे होकर किसी का मन मोह लेते, छोटे लेकिन मीठे अंगूर जो छूने भर से सख्त हो जाते और ब्लाउज पर हल्का उभार बना देते, कमर पतली जो पिछवाड़े की गोलाई को और उभार देती, पिछवाड़ा भारी और गोल-मटोल जो साड़ी के नीचे से अपनी मजबूत उपस्थिति महसूस कराता, बाल लंबे काले जो कमर तक लहराते और चूड़ियाँ चांदी की पतली जो हर कदम पर खनकतीं, आँखें गहरी काली जिनमें हमेशा एक छिपी हुई शर्म और भूख मिश्रित रहती। उनका पति मजदूरी के लिए शहर गया हुआ था, सरिता घर संभालती और खेतों में काम करती लेकिन पिछले कुछ दिनों से शरीर में एक अजीब सी बेचैनी थी जो रातों को नींद चुरा लेती।
एक दोपहर सरिता घर पर अकेली थीं, घर में पूरी शांति थी, हवा में चूल्हे की लकड़ी की महक और बाहर से आती गर्मी की उमस। सरिता को अकेलेपन में एक नई जिज्ञासा हुई, उन्होंने सोचा आज कुछ अलग ट्राई करें। बाथरूम में गईं, दरवाजा बंद किया, साड़ी ऊपर समेटी और एक ताजा मध्यम आकार का बैंगन – जो बाजार से लाई थीं – हाथ में लिया। बैंगन लंबा, मोटा और चिकना था, जैसे कोई मजबूत गाजर लेकिन ज्यादा नरम और रसीला। सरिता ने उसे अच्छे से धोया, थोड़ा तेल लगाया और धीरे से अपनी गहरी रसीली जगह के मुहाने पर रखा, चारों तरफ हल्की हरियाली वाली झाड़ी थी। उन्होंने आँखें बंद कीं और धीरे-धीरे बैंगन को अंदर धकेला। खुदाई शुरू हुई – बहुत धीमी गति से, गहराई में लगाते हुए। सरिता की सांसें तेज हो गईं, चूड़ियाँ खनक रही थीं, शरीर में सिहरन दौड़ रही थी। बैंगन अंदर-बाहर हो रहा था और रस निकलने की तैयारी में जगह और गीली हो रही थी। सरिता कराही हल्की लेकिन दबी हुई, आनंद की लहरें उठ रही थीं, बैंगन और गहराई में जा रहा था।
अचानक एक तेज धक्का दिया तो बैंगन का दंठल टूट गया, बैंगन का बड़ा हिस्सा पूरी तरह गहरी जगह में फंस गया। सरिता चौंक गईं, हाथ से निकालने की कोशिश की लेकिन वह और गहराई में चला गया। दर्द नहीं था लेकिन शर्म और घबराहट से चेहरा लाल हो गया। सरिता की सांसें रुक गईं, "अरे राम, यह क्या हो गया," उन्होंने फुसफुसाया। हाथ से निकालने की बहुत कोशिश की लेकिन बैंगन फिसल रहा था और और अंदर जा रहा था। शर्म से आँखें नम हो गईं, शरीर कांप रहा था। सरिता ने सोचा अब क्या करें, पड़ोसियों को नहीं बता सकतीं, पति को फोन नहीं कर सकतीं। बहुत देर तक कोशिश की लेकिन बैंगन नहीं निकला। आखिरकार बहुत सोचने के बाद क्लिनिक जाने का फैसला किया। गाँव का क्लिनिक पास ही था, डॉक्टर रीता वहाँ काम करती थीं लेकिन सरिता को पता था कि दोपहर में अक्सर डॉक्टर शहर जाती हैं, फिर भी चल पड़ीं।
क्लिनिक पहुँचीं तो दरवाजा खुला था लेकिन डॉक्टर नहीं थीं। अंदर कंपाउंडर मोहन अकेला बैठा था, दवाओं की शीशियाँ सजी हुईं और हवा में एंटीसेप्टिक की तेज गंध फैली हुई। सरिता ने झिझकते हुए कहा, "डॉक्टर साहब किधर हैं?" मोहन ने मुस्कुराकर कहा, "बहन जी, वो शहर गई हैं, शाम को आएंगी, लेकिन आप बताओ क्या समस्या है, मैं देख लूँगा।" सरिता की आँखें नीची हो गईं, शर्म से चेहरा और लाल हो गया, "नहीं... मैं कल आऊँगी," लेकिन मोहन ने कहा, "घबराइए मत, मैं सब संभाल लूँगा, क्लिनिक में कोई नहीं है, अंदर आ जाओ।" सरिता बहुत हिचकिचाईं लेकिन दर्द और शर्म की वजह से अंदर चली गईं।
मोहन ने दरवाजा बंद किया। छोटे कमरे में जहाँ एक बिस्तर था और पर्दे लटके हुए, हवा में दवाओं की महक और बाहर से आती ठंडी हवा। सरिता ने धीरे से सब बता दिया, "मोहन जी... मैंने... बैंगन... फंस गया है... बहुत शर्म आ रही है," उनकी आवाज कांप रही थी, आँखें नम। मोहन की आँखें चमक उठीं लेकिन उसने शांत स्वर में कहा, "घबराइए मत बहन जी, यह आम बात है, मैं निकाल दूँगा, लेकिन पूरी जांच करनी पड़ेगी, लेट जाओ।" सरिता ने झिझकते हुए बिस्तर पर लेट गईं, साड़ी का पल्लू सरक गया, बड़े रसीले आम उभरे हुए दिख रहे थे। मोहन पास आया, हाथ धोया और सरिता की साड़ी ऊपर सरकाई। गहरी जगह में देखा, बैंगन गहराई में फंसा था। मोहन की उंगलियाँ जगह में डालीं, धीरे-धीरे घुमाया। सरिता कराही हल्की, "ओह... धीरे।" मोहन की सांसें भी तेज हो गईं, बैंगन फिसल रहा था लेकिन और गहराई में जा रहा था।
मोहन ने कहा, "यह आसानी से नहीं निकलेगा, थोड़ा रिलैक्स करना पड़ेगा।" सरिता की झिझक साफ थी लेकिन मोहन की उंगलियाँ जगह में घूम रही थीं, स्पर्श इतना नरम लेकिन गहरा कि सरिता की कराह निकल गई। मोहन ने सरिता को कहा, "बहन जी, पैर थोड़े फैलाओ और घुटने मोड़ो, जैसे स्क्वाट करने की पोजीशन।" सरिता ने वैसा किया। मोहन ने सरिता को धीरे से उठाकर स्क्वाट पोजीशन में बिठाया, "अब धीरे-धीरे पुश करो जैसे मल त्यागने की कोशिश कर रही हो।" सरिता ने कोशिश की, बैंगन थोड़ा नीचे आया। मोहन ने उंगलियाँ डालकर उसे पकड़ा, धीरे से बाहर खींचा। सरिता की कराह ऊँची हो गई लेकिन बैंगन धीरे-धीरे निकलने लगा। मोहन ने दोनों हाथों से पकड़ा और आखिरकार पूरा बैंगन बाहर निकाल लिया। सरिता की जगह से रस और गीलापन निकला, शरीर कांप रहा था, शर्म से आँखें बंद।
बैंगन निकलने के बाद सरिता की सांसें अभी भी तेज थीं। मोहन ने देखा कि जगह अभी भी गीली और संवेदनशील है। उसने कहा, "बहन जी, अब सब ठीक है लेकिन जांच पूरी करनी पड़ेगी कि कोई चोट तो नहीं।" सरिता ने शर्म से सिर हिलाया। मोहन ने अपना केला निकाला जो पहले से सख्त था, लंबा और मोटा जैसे कोई मजबूत गाजर। सरिता की आँखें चौड़ी हो गईं, "नहीं... यह क्या?" लेकिन मोहन ने कहा, "रिलैक्स रहो, यह जांच है।" सरिता खुद को रोक नहीं पाईं। मोहन ने अपना केला जगह के मुहाने पर रखा, धीरे से धकेला। केला अंदर घुसा और खुदाई शुरू हुई – बहुत गहन, धीमी गति से, गहराई में लगाते हुए। सरिता की कराहें दबी हुईं लेकिन कमरे में गूंज रही थीं। मोहन ने पोजीशन बदली – सरिता को बिस्तर पर लिटाया, खुद ऊपर। केला पूरी गहराई में, खुदाई लयबद्ध और गहरी। सरिता की चूड़ियाँ खनक रही थीं, बड़े आम दबाए जा रहे थे, अंगूर चूसे जा रहे थे। रस निकलने की क्रिया हुई – सरिता का शरीर कांपा, रस छूटा जैसे फल पककर रस छोड़ दे। मोहन भी रस निकालकर थक गया। दोनों लेट गए।
सरिता शर्म से आँखें बंद किए लेटी रहीं। मोहन ने कहा, "अब सब ठीक है, लेकिन अगली बार सावधानी रखना।" सरिता ने मुस्कुराकर सिर हिलाया लेकिन मन में एक नई इच्छा जाग गई थी। बैंगन निकालने की प्रक्रिया ने एक गहन अनुभव दे दिया था जो उन्हें भूल नहीं पा रही थीं।
इसके बाद सरिता कभी-कभी क्लिनिक जातीं, बहाने से। और अगर डॉक्टर नहीं होती तो मोहन समझ जाता। खुदाई गहन होती, विभिन्न पोजीशन में – कभी स्क्वाट में, मोहन पीछे से, केला जगह में गहराई तक। सरिता की कराहें दबी हुईं। कभी बिस्तर पर लेटकर, मोहन ऊपर। खुदाई तेज और लयबद्ध। रस निकलना बार-बार। चूड़ियाँ खनकतीं, सांसें तेज होतीं। गंध पसीने और दवाइयों की मिश्रित। शर्म कम हो गई लेकिन आकर्षण बढ़ता गया। गाँव बाहर से शांत रहा लेकिन क्लिनिक की दीवारें उन गुप्त मुलाकातों की गवाह बनीं जहाँ एक छोटी सी गलती ने एक गहन रिश्ते को जन्म दिया, और सरिता की जिंदगी में एक नया रंग आ गया जो उन्हें हर रात याद आता।
