पुराना बंगला, शहर से थोड़ा दूर, चारों तरफ आम के बागान और पुरानी दीवारें। आयुष २२ साल का था, कॉलेज की छुट्टियाँ थीं। पिता ने कहा था – “चाची रेखा अकेली हैं, बंगले का थोड़ा सामान साफ करने में मदद कर दे।” रेखा चाची ३७ साल की थीं, पति के गुजर जाने के बाद अकेली रहती थीं। उनका चेहरा अभी भी खिलखिलाता था, लेकिन आँखों में एक गहरी उदासी छिपी रहती थी। शरीर – गोरा, भरा हुआ, कमर पतली, तरबूज भारी और मटर हमेशा उभरे हुए।
जैसे ही आयुष बंगले में घुसा, चाची ने मुस्कुराते हुए गले लगाया। “आ गया मेरा लाडला।” उनकी छाती आयुष से लगी तो उसे महसूस हुआ – कितने नरम और गर्म तरबूज हैं। चाची ने हल्के से कहा, “देखो ना, कितना सामान बिखरा पड़ा है अटारी में। तुम्हारे बिना कैसे साफ होता?” आयुष मुस्कुराया, “चाची, मैं पूरा हफ्ता हूँ। जो कहोगी, करूँगा।”
पहले दिन अटारी साफ करने लगे। धूल भरी अलमारियाँ, पुरानी किताबें, पुरानी तस्वीरें। चाची सीढ़ी पर चढ़ीं। साड़ी का पल्लू सरक गया। आयुष नीचे खड़ा था। उसकी नजर ऊपर गई – चाची के तरबूज ब्लाउज से उभरे हुए, मटर साफ दिख रहे थे। चाची ने देख लिया। मुस्कुराईं, “क्या देख रहे हो बेटा?” आयुष शरमाया, “कुछ नहीं चाची… बस… सावधानी से।” चाची हँसीं, “अब बड़ा हो गया है तू, फिर भी शरमाता है।” उन्होंने जानबूझकर पल्लू और थोड़ा सरका दिया। आयुष का खीरा हल्का सा हिला।
शाम को चाय पीते समय चाची बोलीं, “आयुष, अकेलापन बहुत सताता है बेटा। दिन भर काम करती हूँ, रात को बस छत पर बैठकर तारे देखती हूँ।” आयुष ने कहा, “चाची, अब मैं हूँ ना। जो चाहिए, बोलो।” चाची ने उसकी आँखों में देखा, “सच में… सब कुछ?” आयुष ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। चाची की उँगलियाँ चाय के कप पर थोड़ी काँपीं।
दूसरे दिन अटारी में फिर काम। चाची नीचे झुकीं किताबें उठाने। आयुष पीछे खड़ा था। उनकी साड़ी का पिछवाड़ा उभरा हुआ, गोल और भारी। आयुष का हाथ अनजाने में उनकी कमर छू गया। चाची रुकीं, मुड़कर देखा। “बेटा… ध्यान रखना।” लेकिन आवाज़ में शिकायत नहीं, हल्की शरारत थी। आयुष ने हिम्मत करके कहा, “चाची, आपकी कमर में दर्द तो नहीं?” चाची हँसीं, “है तो… लेकिन कौन मलेगा?” आयुष ने तुरंत कहा, “मैं मल दूँ?” चाची ने शरमा कर कहा, “अच्छा… शाम को।”
शाम को चाची लेट गईं। आयुष ने तेल लिया। चाची ने ब्लाउज का हुक खोल दिया, सिर्फ एक हुक बाकी। आयुष ने तेल लगाया। उँगलियाँ कमर पर, फिर धीरे-धीरे तरबूजों के नीचे तक। चाची की साँसें भारी हो गईं। “आयुष… वहाँ… हल्का दबाओ।” आयुष ने तरबूजों को हल्के से दबाया। मटर सख्त। चाची ने आह भरी, “हाँ… ऐसे ही… बहुत अच्छा लग रहा है।” आयुष का खीरा पूरा अकड़ गया। चाची ने महसूस किया, लेकिन कुछ नहीं बोलीं। सिर्फ मुस्कुराईं।
तीसरे दिन बारिश शुरू हो गई। दोनों छत पर पुराने सामान ढक रहे थे। पूरी तरह भीग गए। चाची की साड़ी पारदर्शी हो गई। तरबूज साफ नजर आ रहे थे। घर लौटे। चाची बोलीं, “कपड़े बदल लो, नहीं तो सर्दी लग जाएगी।” बाथरूम में चाची पहले गईं। दरवाजा आधा खुला रह गया। आयुष ने देखा – चाची नंगी खड़ी पानी में। उनके तरबूज पानी से चमक रहे थे। चाची ने देख लिया। मुस्कुराईं, “आ गया जासूस?” आयुष अंदर चला गया। चाची ने उसे तौलिया दिया। आयुष ने उनके तरबूजों पर तौलिया फेरा। चाची ने आँखें बंद कर लीं। “आयुष… तुम बहुत प्यारे हो।” आयुष ने हिम्मत करके एक मटर को उँगली से छुआ। चाची काँपीं, लेकिन रुकीं नहीं।
रात को दोनों छत पर बैठे। बारिश रुक गई थी। चाची बोलीं, “आयुष, मैं बहुत अकेली हूँ बेटा। कोई है ही नहीं जो मुझे छू ले, प्यार कर ले।” आयुष ने उनका हाथ थामा, “मैं हूँ ना चाची।” चाची ने उसकी आँखों में देखा, “सच में… सब कुछ?” आयुष ने सिर हिलाया। चाची मुस्कुराईं, “तो आज रात… मेरे पास सो जाना।”
रात को अंधेरा। मोमबत्ती जल रही थी। दोनों एक ही बिस्तर पर। चाची ने आयुष को अपनी बाहों में लिया। “आज डर मत लगाना… जो मन करे, करो।” आयुष ने उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया। तरबूज बाहर। चूमा, चूसा, दबाया। चाची कराह रही थीं – “हाँ बेटा… जोर से चूसो… बहुत दिनों से… आह…” आयुष ने ब्लाउज पूरा उतारा। नाइटी भी। चाची अब पूरी नंगी। आयुष ने उनकी खाई को चाटा। चाची ने सिर पकड़ लिया, “आयुष… वहाँ… जीभ डालो… हाँ… ऐसे…” चाची का पहला रस निकला। वे काँप रही थीं।
फिर आयुष ने खीरा निकाला। चाची ने उसे हाथ में लिया, “इतना सख्त… मेरा लाडला…” उन्होंने मुंह में लिया, चूसा, चाटा। “स्वादिष्ट है तेरा…” आयुष ऊपर आया। चाची ने जांघें फैलाईं, “धीरे से अंदर करो… लेकिन पूरा…” आयुष ने धीरे-धीरे पूरा खीरा डाला। चाची चीखीं, “आह… भर गया… मेरी खाई… तेरी हो गई…” आयुष ने धीरे-धीरे खोदना शुरू किया। चाची बोल रही थीं – “हाँ बेटा… और गहरा… तेज… मुझे खोदो… मेरी प्यास बुझा दो… आह… हाँ… ऐसे ही…” हर थ्रस्ट पर चाची की कराह बढ़ती। “तेरा खीरा… कितना मोटा… पूरी खाई भर रही है…”
पोजीशन बदली। चाची ऊपर आईं। खुद हिल रही थीं – “देख… मैं तुझे खोद रही हूँ… आह… कितना मजा…” उनके तरबूज आयुष के सीने से रगड़ खा रहे थे। आयुष ने उन्हें दबाया, “चाची… तुम बहुत गर्म हो… बहुत रसीली…” चाची हँसीं-कराहतीं, “तेरी वजह से… आज पहली बार… पूरा महसूस हो रहा है…”
फिर पिछवाड़े से। चाची घुटनों के बल। आयुष ने पीछे से पूरा डाला। चाची चीखीं, “हाँ… गहरा… मेरी पिछवाड़े को भी खोदो… सब कुछ तुम्हारा…” आयुष तेज़ हो गया। चाची का दूसरा रस निकला। “रुकना मत… अंदर ही अंदर… अपना रस दो मुझे…”
आखिरी राउंड में दोनों पसीने से तर। चाची बोलीं, “आयुष… मुझे अपना बना ले… हमेशा के लिए…” आयुष ने तेजी से खोदा। दोनों का रस साथ छूटा। चाची चीखीं, “हाँ… भर दो… मेरी खाई को… तेरे रस से…” दोनों थककर लेट गए। चाची आयुष को जकड़े हुए थीं। “ये रात… कभी मत भूलना बेटा।”
उसके बाद हर रात होती रही। कभी छत पर, कभी अटारी में, कभी बारिश में भीगकर। चाची अब खुलकर कहतीं – “आज मुझे ऊपर बैठा… आज पिछवाड़े से… आज बहुत जोर से खोदो…” और आयुष देता रहता।
ये हफ्ता दोनों के लिए सबसे गहरी, सबसे प्यारी और सबसे यादगार बन गया। बंगला रेनोवेशन पूरा हुआ, लेकिन उनके रिश्ते का रेनोवेशन कभी खत्म नहीं हुआ।
