अंजली पहली बार अकेले ट्रेकिंग पर निकली थी, दिल्ली की भागदौड़ से दूर, हिमालय के एक छोटे से पहाड़ी गांव में। बस से उतरकर जब वह गांव की ऊबड़-खाबड़ सड़क पर चली तो हवा में ठंडी नमी महसूस हुई, चारों तरफ चीड़ के पेड़ और दूर बर्फीली चोटियां। वह एक छोटे से गेस्टहाउस में रुकी, जहां मालिक ने कहा कि कल ट्रेकिंग के लिए एक गाइड ले लो, रास्ता कठिन है। अंजली ने हां कर दी, उसके मन में रोमांच था, लेकिन थोड़ी घबराहट भी क्योंकि वह शहर की लड़की थी, इन पहाड़ों की कच्ची राहों से अनजान। शाम को कमरे में लेटकर वह सोच रही थी कि कैसा होगा कल का दिन, उसके शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ रही थी, जैसे कोई अनजान साहस उसे बुला रहा हो।
अगले दिन सुबह गेस्टहाउस के सामने एक युवक खड़ा था – नाम था विक्रम, स्थानीय गाइड, कद लंबा, चौड़ी छाती, घनी दाढ़ी, आंखें काली और तेज। उसने मुस्कुराकर कहा, "मैडम, मैं विक्रम। ट्रेकिंग के लिए तैयार हूं। लेकिन मौसम खराब हो सकता है, सावधान रहना।" अंजली ने उसकी तरफ देखा, उसकी मांसपेशियां कमीज के नीचे उभरी हुईं, और उसके मन में एक हल्की सी कंपकंपी दौड़ गई। उन्होंने ट्रेकिंग शुरू की, रास्ता संकरा था, हर कदम पर चट्टानें और जड़ें। विक्रम आगे चल रहा था, बार-बार पीछे मुड़कर देखता, "मैडम, संभलकर... हाथ पकड़ लो अगर जरूरत हो।" अंजली ने हल्का सा सिर हिलाया, लेकिन उसके मन में विचार आ रहा था कि काश कोई बहाना मिले स्पर्श का।
रास्ते में एक जगह रास्ता फिसलन भरा था, अंजली का पैर फिसला। विक्रम ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया, उसे अपनी तरफ खींचा। अंजली का शरीर उसके शरीर से सट गया, उसकी छाती अंजली के स्त@#@ से दबी। दोनों की सांसें तेज हो गईं। "मैडम... ठीक हो?" विक्रम ने पूछा, लेकिन उसका हाथ अभी भी अंजली की कमर पर था। अंजली ने हां में सिर हिलाया, लेकिन उसके गाल लाल हो गए, स्त@#@ के नि@#@ल सख्त होकर ब्लाउज को चुभ रहे थे। वे आगे बढ़े, लेकिन अब दोनों के बीच एक अजीब सी खामोशी थी, सिर्फ सांसों की आवाज और पत्तों की सरसराहट। विक्रम बार-बार पीछे मुड़ता, उसकी नजरें अंजली के कूल्हों पर, जहां जींस टाइट थी और ग@#@ड की गोलाई उभर रही थी। अंजली भी महसूस कर रही थी, उसके मन में एक छिपी इच्छा जाग रही थी कि काश यह स्पर्श और लंबा चले।
ट्रेकिंग के बीच में मौसम खराब हो गया, बादल घिर आए, बूंदाबांदी शुरू हो गई। विक्रम ने कहा, "मैडम, एक छोटी सी गुफा है पास में, वहां रुकते हैं। बारिश तेज हो सकती है।" वे गुफा में पहुंचे, अंदर अंधेरा था लेकिन सूखा। विक्रम ने अपनी जैकेट उतारकर जमीन पर बिछाई, "बैठिए मैडम।" अंजली बैठ गई, उसकी टी-शर्ट भीगकर उसके स्त@#@ से चिपक गई थी, नि@#@ल साफ दिख रहे थे। विक्रम की नजरें वहां टिक गईं, लेकिन उसने नजरें फेर ली। वे बातें करने लगे – विक्रम ने गांव की कहानियां सुनाईं, अंजली ने शहर की। लेकिन बातों के बीच दोनों की नजरें एक-दूसरे पर टिकतीं, जैसे कोई अनकही इच्छा पल रही हो। बारिश तेज हो गई, बाहर पानी की धारा बह रही थी।
गुफा में ठंड बढ़ गई। अंजली ने कहा, "बहुत ठंड लग रही है।" विक्रम ने करीब आकर कहा, "मैडम, मैं आपकी पीठ सहला दूं, गर्मी आएगी।" अंजली ने हिचकिचाते हुए हां कहा। विक्रम ने उसके पीछे बैठकर पीठ पर हाथ फेरना शुरू किया, उंगलियां धीरे-धीरे कमर तक सरकीं। अंजली की सांसें तेज हो गईं, "उफ्फ... विक्रम... अच्छा लग रहा है..." विक्रम की उंगलियां अब आगे सरकीं, अंजली के स्त@#@ को छू गईं। अंजली ने रोकने की कोशिश की, "नहीं... क्या कर रहे हो..." लेकिन उसके शब्द कमजोर थे, शरीर खुद आगे झुक रहा था। विक्रम ने उसके ब्लाउज के हुक खोल दिए, स्त@#@ बाहर आ गए। "मैडम... कितने नरम... मुझे छूने दो..." उसने एक नि@#@ल मुंह में लिया, चूसना शुरू किया। अंजली की कराह निकल गई, "आह... विक्रम... मत... लेकिन रुक मत... और चूस... जोर से..."
अंजली अब खुद को रोक नहीं पा रही थी। उसने विक्रम की शर्ट उतार दी, उसके मजबूत शरीर को सहलाने लगी। विक्रम ने उसे जमीन पर लिटा दिया, जींस उतारी, प@#@ी साइड की। अंजली की चू@#@त गीली थी, झ@#@ट चिपकी हुई। विक्रम ने उंगली डाली, अंदर-बाहर किया। अंजली चीखी, "आह... और गहराई में... विक्रम... मेरी चू@#@त तेरी उंगलियों से पिघल रही है..." विक्रम ने पैंट खोली, उसका ल@#ंड बाहर आया – मोटा, सख्त, टिप गीली। अंजली ने उसे हाथ में लिया, सहलाया, "इतना बड़ा... मेरी चू@#@त में समा जाएगा... धीरे..." विक्रम ने ल@#ंड चू@#@त पर रगड़ा, फिर धीरे से अंदर डाला। अंजली ने जोर की आह भरी, "आह्ह... पूरा... भर गया... उफ्फ... कितना गहरा..."
विक्रम ने धीमी गति से चु@#@ई शुरू की। हर थ्रस्ट पर अंजली का शरीर हिल रहा था, स्त@#@ उछल रहे थे। "आह... विक्रम... और तेज... मेरी चू@#@त तेरे ल@#ंड को निचोड़ रही है... हां... चु@#@ई कर... जोर से..." विक्रम ने गति बढ़ाई, उसके हाथ अंजली के नि@#@ल मसल रहे थे। अंजली की कराहें गुफा में गूंज रही थीं, "उफ्फ... मैं झड़ रही हूं... org@#@ms... आआह्ह... रस निकल रहा है... तेरे ल@#ंड पर..." विक्रम ने पोजीशन बदली, अंजली को ऊपर बिठाया, अब वह खुद ऊपर-नीचे होने लगी। "हां... ऐसा... तेरी चू@#@त मेरे ल@#ंड पर उछल रही है... आह... कितनी गर्म..." अंजली ने दूसरा org@#@ms लिया, शरीर कांप उठा।
फिर विक्रम ने उसे घुटनों पर किया, पीछे से ल@#ंड डाला। अंजली की ग@#@ड ऊंची, विक्रम के धक्के तेज। "आह... पीछे से... और गहरा... मेरी ग@#@ड तेरे ल@#ंड से फट रही है... लेकिन अच्छा लग रहा है... हां... और जोर से..." विक्रम ने एक हाथ से स्त@#@ दबाया, दूसरे से ग@#@ड थपथपाई। अंजली की कराहें अब पागलपन भरी – "उफ्फ... विक्रम... मैं फिर झड़ रही हूं... org@#@ms... आआह्ह... रस बह रहा है..." विक्रम ने आखिरी धक्के मारे, "आह... रस निकल रहा है... ले... मेरी मैडम..." उसका गर्म रस अंजली की चू@#@त में भर गया। दोनों थककर लेट गए, सांसें तेज, शरीर पसीने से तर।
बारिश रुक गई थी। वे कपड़े ठीक करके बाहर निकले। लेकिन अब दोनों के बीच एक राज था – पहाड़ी गांव की उस रात का। अंजली ने विक्रम को देखा, मुस्कुराई, "कल फिर ट्रेकिंग?" विक्रम ने हां कहा, उसकी आंखों में वही चमक। रात अभी शुरू हुई थी।
