जवान विधवा मामी के साथ एक रसीली खुदाई

राहुल अपने मामा के देहांत के करीब दो साल बाद पहली बार अपने पुराने गांव आया था। दोपहर की चिलचिलाती धूप में पूरा घर सन्नाटे में डूबा हुआ था और घर में सिर्फ वह और उसकी खूबसूरत मामी मीरा ही मौजूद थे। मीरा की उम्र लगभग पैंतीस के आसपास थी, लेकिन उसका यौवन अभी भी किसी सोलह साल की किशोरी की तरह उफान मार रहा था। उसकी लंबी कद-काठी, चौड़े कूल्हे और मखमली त्वचा राहुल के मन में अजीब सी बेचैनी पैदा कर रहे थे। राहुल रसोई के दरवाजे पर खड़ा होकर चुपचाप मीरा को देख रहा था जो चूल्हे पर चाय बना रही थी और पसीने की बूंदें उसकी गर्दन से होते हुए उसके ब्लाउज के गहरे गले में समा रही थीं।



मीरा ने उस दिन बहुत ही पतली और झीनी सूती साड़ी पहन रखी थी जिससे उसके शरीर की बनावट साफ झलक रही थी। जब वह चाय छानने के लिए नीचे झुकी, तो उसके भारी और गोल-मटोल तरबूज साड़ी के पल्लू से बाहर झांकने को बेताब लग रहे थे। राहुल की नजरें उन तरबूजों पर जमे हुए मटर के दानों पर जाकर टिक गईं जो ब्लाउज के कपड़े को चीरकर बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे। मीरा का गोरा रंग और उसकी कसी हुई देह ने राहुल के शरीर के भीतर एक सोए हुए ज्वालामुखी को जगा दिया था। राहुल का अपना खीरा अब उसकी पेंट के भीतर पूरी तरह से अकड़ चुका था और बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था।


राहुल धीरे-धीरे कदमों से रसोई के अंदर गया और मीरा के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया। मीरा को उसकी मौजूदगी का अहसास हुआ और वह पलटी, लेकिन राहुल इतना करीब था कि उसके भारी तरबूज राहुल के मजबूत सीने से टकरा गए। दोनों की सांसें एक-दूसरे के चेहरों पर महसूस हो रही थीं और हवा में एक कामुक तनाव भर गया था। मीरा की आंखों में एक अजीब सी तड़प और थोड़ी सी शर्म थी, उसने दबी आवाज में कहा, 'राहुल बेटा, ये तुम क्या कर रहे हो, कोई देख लेगा।' लेकिन राहुल ने बिना कुछ कहे मीरा की पतली कमर को अपने हाथों में भर लिया और उसे अपनी ओर जोर से खींच लिया।


राहुल ने अपना चेहरा मीरा की गर्दन के पास झुकाया और वहां की भीनी-भीनी खुशबू को सूंघने लगा। उसने धीरे से मीरा के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, 'मामी, आप इतनी सुंदर हैं कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं।' मीरा का पूरा शरीर इस स्पर्श से कांप उठा और उसने राहुल के बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं। राहुल ने धीरे से उसके चेहरे को ऊपर उठाया और उसके रसीले होठों को अपने मुंह में भर लिया।


चुंबन शुरू में बहुत कोमल था, जैसे दोनों सालों की दबी हुई भावनाओं को पहले-पहल छू रहे हों। मीरा के होंठ नरम और गर्म थे, थोड़े कांपते हुए। राहुल ने धीरे से होंठों को चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। मीरा ने पहले हल्का विरोध किया, हाथों से राहुल के सीने को धकेला, लेकिन उसका शरीर उसकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वह खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगी। दोनों की साँसें तेज हो गईं, रसोई में चूल्हे की आँच की गर्मी के साथ उनके शरीरों की गर्मी भी बढ़ती जा रही थी। मीरा की साड़ी का पल्लू अब पूरी तरह सरक चुका था, और उसके भारी तरबूज राहुल के सीने से दबकर एक मीठी सी पीड़ा दे रहे थे। पसीने की बूंदें मीरा की गर्दन से नीचे बह रही थीं, जो राहुल की जीभ को और लुभा रही थीं।


राहुल ने धीरे से मीरा को रसोई के काउंटर पर टिका दिया। उसने मीरा की कमर को दोनों हाथों से जकड़ लिया और फिर धीरे-धीरे नीचे सरकते हुए तरबूजों को सहलाना शुरू किया। ब्लाउज के पतले कपड़े के ऊपर से ही वह महसूस कर सकता था कि मटर कितने सख्त और उभरे हुए हैं। मीरा की साँसें अब रुक-रुक कर आ रही थीं। उसने आँखें बंद कर लीं और फुसफुसाई, “राहुल… ये गलत है… हम… हम रिश्ते में…” लेकिन उसकी आवाज में कोई दृढ़ता नहीं थी, सिर्फ एक गहरी, दबी हुई तड़प। राहुल ने जवाब में ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए। कपड़ा फटने जैसी हल्की आवाज हुई और मीरा का एक तरबूज पूरी तरह नंगा हो गया – गोरा, गोल, भरा हुआ, ऊपर मटर गुलाबी और सख्त। राहुल ने उसे मुंह में लिया, जीभ से घुमाया, हल्का सा चूसा। मीरा ने जोर से कराहते हुए कहा, “आह… राहुल… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उसकी उंगलियाँ राहुल के सिर को और गहराई से दबा रही थीं, जैसे वह खुद ही और ज्यादा चाह रही हो।


मीरा का शरीर अब पूरी तरह राहुल के हवाले हो चुका था। राहुल ने दूसरा तरबूज भी बाहर निकाला और दोनों को बारी-बारी से चूमने, चूसने, सहलाने लगा। मीरा की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। राहुल ने धीरे से मीरा की साड़ी का पेटीकोट भी खोल दिया। मीरा अब सिर्फ पतली पैंटी में थी, और उसकी खाई से एक गर्म, मीठी महक उठ रही थी। राहुल ने घुटनों के बल बैठकर मीरा की जांघों को चूमा, ऊपर की तरफ बढ़ता गया। जब उसने पैंटी को सरकाया, तो मीरा की खाई पूरी तरह सामने आ गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, जैसे कोई फूल ओस से तर हो। राहुल ने अपनी जीभ से पहली बार छुआ। मीरा का पूरा शरीर एक झटके से काँप उठा। “राहुल… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… मैं पागल हो जाऊँगी…” लेकिन उसने खुद अपनी जांघें और फैला दीं। राहुल ने खाई चाटना शुरू किया – धीरे-धीरे, गहराई से, जीभ ऊपर-नीचे घुमाते हुए, कभी मटर जैसी उभरी जगह को चूसते हुए। मीरा की कराहें अब रसोई में गूँज रही थीं। उसका पिछवाड़ा काउंटर पर रगड़ खा रहा था, पसीना उसकी कमर से बह रहा था।


कुछ देर बाद मीरा ने राहुल को ऊपर खींच लिया। अब उसकी बारी थी। उसने राहुल की शर्ट उतारी, फिर पैंट की बटन खोली। जब खीरा बाहर निकला – लंबा, मोटा, नसों से भरा, सिर पर एक चमकदार बूँद – मीरा की आँखें फैल गईं। उसने पहली बार इतने करीब से देखा। “राहुल… इतना बड़ा… इतना सख्त…” उसने धीरे से हाथ में पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर्फ सिर, जीभ से चाटा, फिर धीरे-धीरे गहरा। राहुल ने कराहते हुए मीरा के बालों में हाथ फेरा। “मामी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म है… कितना नरम…” मीरा ने और गहरा लिया, खीरा गला तक, चूसती रही, कभी ऊपर निकालकर जीभ से चारों तरफ घुमाती। राहुल का शरीर तन गया, उसकी साँसें तेज हो गईं। मीरा ने रस का स्वाद चखा, लेकिन रुक गई। वह चाहती थी कि ये पल लंबा चले।


राहुल ने मीरा को गोद में उठा लिया और बेडरूम की तरफ ले गया। पुराना लकड़ी का बिस्तर अब भी वही था, जिस पर मीरा अकेले सोती थी। उसने मीरा को धीरे से लिटाया। मीरा की आँखों में अब सिर्फ इच्छा थी, शर्म कहीं पीछे छूट गई थी। राहुल ने मीरा की जांघें फैलाईं और खीरा खाई के मुंह पर रखा। “मामी… तैयार हो?” मीरा ने सिर हिलाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत दिनों से… कोई नहीं आया है अंदर…” राहुल ने बहुत धीरे दबाया। खीरा खाई में घुसा – इंच-दर-इंच, मीरा की खाई तंग थी, लेकिन भीगी हुई। मीरा ने लंबी कराह के साथ कहा, “आह… पूरा… धीरे से… हाँ… ऐसे ही…” राहुल धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। हर थ्रस्ट में मीरा की खाई और गीली होती गई। तरबूज हिल रहे थे, मटर सख्त। राहुल ने एक तरबूज मुंह में लिया, चूसते हुए खुदाई जारी रखी। मीरा की आहें अब लगातार थीं – “और गहरा… राहुल… और तेज… हाँ… खोदो मुझे… पूरी तरह खोदो…”


वे पोजीशन बदले। मीरा घुटनों के बल आई, पिछवाड़ा ऊपर। राहुल ने पीछे से खीरा फिर डाला। इस बार गहरा, तेज। मीरा का पिछवाड़ा हर थ्रस्ट पर हिल रहा था। राहुल ने उसके बाल हल्के से पकड़े, खींचा। “मामी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म…” मीरा चीखी, “हाँ… तेज… और तेज… मैं… रस छूटने वाली हूँ…” उसका शरीर काँप उठा, खाई सिकुड़ गई, गर्म रस बह निकला। लेकिन राहुल नहीं रुका। उसने मीरा को फिर लिटाया, सामने से फिर शुरू किया।


दूसरी बार जब मीरा का रस निकला, राहुल भी किनारे पर था। उसने तेजी से खोदा, खाई को पूरी तरह भरते हुए। मीरा ने उसे जकड़ लिया, नाखून पीठ में गड़े। “अंदर… राहुल… सब अंदर छोड़ दो… मुझे अपना रस दो…” राहुल ने आखिरी थ्रस्ट दिए, गर्म रस खाई के अंदर छूट गया – भरपूर, गहराई तक। दोनों कराहे, पसीने से तर, साँसें मिली हुईं। राहुल मीरा के ऊपर लेट गया, खीरा अभी भी अंदर।


रात भर वे जुड़े रहे। कभी सामने से, कभी पिछवाड़े से, कभी मीरा ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। मीरा ने राहुल के कान में फुसफुसाया, “तुम्हारा खीरा… मुझे फिर से जवान कर देता है… हर बार नया लगता है।” राहुल ने जवाब दिया, “और तुम्हारी खाई… मेरी सारी दुनिया है मामी… इतनी मीठी, इतनी गहरी।” वे घंटों एक-दूसरे में खोए रहे। हर रस छूटने के बाद थोड़ा रुकते, चुंबन करते, पसीना चाटते, फिर शुरू।


सुबह होने से पहले मीरा ने राहुल को एक बार और अपनी गोद में लिया। पिछवाड़े से, धीरे-धीरे। राहुल ने पहले उंगली से खाई सहलाई, फिर खीरा पिछवाड़े में घुसाया। मीरा ने दर्द-खुशी की कराह ली, “धीरे… लेकिन मत रुकना… पूरा अंदर…” राहुल ने पूरा किया, धीमी गति से खोदा। मीरा का रस तीसरी बार निकला, राहुल का भी। वे थककर लेट गए, एक-दूसरे की बाहों में।


सुबह की पहली किरण आई तो मीरा राहुल के सीने पर सिर रखे सो रही थी। उसने आँखें खोलीं, मुस्कुराई। “राहुल… ये राज़ हमारे बीच रहेगा। लेकिन… जब भी तुम आए… मैं इंतज़ार करूँगी।” राहुल ने उसके माथे पर चुंबन किया। “मामी… अब मैं बार-बार आऊँगा। ये गांव अब सिर्फ तुम्हारा है मेरे लिए।” बाहर सूरज निकल आया था, लेकिन उनके अंदर की आग अभी भी धीमी-धीमी जल रही थी, इंतज़ार कर रही थी अगली मुलाकात का।