जवान पड़ोसन संजना की छत पर पहली खुदाई


जवान पड़ोसन संजना की छत पर पहली खुदाई
गर्मियों की वह रात बहुत ही मदहोश कर देने वाली थी जब चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था और हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। मेरे सामने वाली छत पर संजना खड़ी थी जो हाल ही में इस मोहल्ले में रहने आई थी और उसके पति अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते थे। संजना की उम्र करीब छब्बीस साल रही होगी और उसका यौवन इस समय अपने पूरे शबाब पर था जिसे देखकर किसी भी पुरुष का मन डोल सकता था। उसने नीले रंग की एक बहुत ही महीन साड़ी पहनी हुई थी जो हवा के झोंकों के साथ उसके बदन से चिपक जाती थी और उसके अंगों की बनावट को साफ बयां कर रही थी।

संजना का शरीर किसी तराशे हुए पत्थर की मूर्ति की तरह था जिसमें हर मोड़ पर एक गहरा आकर्षण छिपा हुआ था। उसकी साड़ी के पतले पल्लू से उसके उभरे हुए और भारी तरबूज साफ झलक रहे थे जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे और देखने वाले की धड़कनें बढ़ा रहे थे। उसके तरबूज इतने पुष्ट और गठीले थे कि ब्लाउज की डोरी उन्हें थामने में नाकामयाब लग रही थी और उनके बीच की गहरी घाटी मन में हलचल पैदा कर रही थी। उसका पिछवाड़ा भी काफी मांसल और गोल था जो साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहा था और हर कदम पर लचक रहा था।

हम दोनों के बीच पिछले कुछ हफ्तों से आंखों ही आंखों में बातें होने लगी थीं और एक अनकहा सा भावनात्मक जुड़ाव महसूस होने लगा था। उस रात छत की मुंडेर पर हाथ रखे जब उसने मेरी तरफ देखा तो उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचैनी और गहरी प्यास नजर आ रही थी जो शायद सालों से दबी हुई थी। मैंने हिम्मत जुटाकर उससे बात शुरू की और बातों ही बातों में हम एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए जहाँ हवाओं में भी एक अजीब सी खुशबू और गर्मी महसूस होने लगी थी। संजना की सांसें तेज होने लगी थीं और वह अपनी साड़ी का पल्लू बार-बार उंगलियों से लपेट रही थी जो उसकी घबराहट और बढ़ती हुई इच्छा का साफ संकेत था।

मेरे मन में एक तरफ झिझक थी तो दूसरी तरफ उसे पाने की तीव्र इच्छा जो मुझे अंदर ही अंदर जला रही थी। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी कमर पर रखा तो उसने एक ठंडी आह भरी और अपनी आंखें बंद कर लीं जैसे वह इसी स्पर्श का इंतजार कर रही थी। उसकी रेशमी त्वचा का अहसास होते ही मेरा खीरा भी अपनी जगह पर अकड़ने लगा था और पेंट के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटाने लगा था। संजना ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया और उसकी गर्म सांसें मेरी गर्दन पर महसूस होने लगीं जिससे मेरे पूरे बदन में एक बिजली सी कौंध गई और सारा डर काफूर हो गया।

अब हमारा पहला स्पर्श एक गहरे जुनून में बदलने लगा था और मैंने उसे अपनी बाहों में भरकर उसके होंठों का अमृत चखना शुरू कर दिया। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया था और उसके विशाल तरबूज अब मेरे सीने से पूरी तरह सट गए थे जिनका नरम और भारी अहसास मुझे पागल कर रहा था। मैंने धीरे से अपने हाथ बढ़ाकर उसके तरबूजों को सहलाना शुरू किया और उनके ऊपर मौजूद छोटे-छोटे मटरों को अपनी उंगलियों से सहलाया जिससे संजना के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल पड़ी। वह पूरी तरह से मेरे प्यार में डूब चुकी थी और उसका हाथ भी नीचे बढ़कर मेरे खीरे को सहलाने लगा था।

संजना ने धीरे से मेरे पेंट की चैन खोली और मेरे गर्म और सख्त खीरे को अपने हाथों में पकड़ लिया जिससे मुझे एक असीम आनंद की अनुभूति हुई। उसने नीचे झुककर मेरे खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे बड़े ही चाव से चूसने लगी जैसे कोई स्वादिष्ट फल खा रही हो। उसके मुंह की गर्मी और जीभ का स्पर्श मेरे खीरे को और भी ज्यादा कठोर बना रहा था और मेरा मन कर रहा था कि बस इसी पल में थम जाऊं। काफी देर तक खीरा चूसने के बाद उसने मुझे अपनी तरफ खींचा और इशारा किया कि अब वह और इंतजार नहीं कर सकती और उसकी खाई पूरी तरह से तैयार है।

संजना ने अपनी साड़ी उतारकर जमीन पर बिछा दी और उस पर लेट गई जिससे उसका पूरा नग्न बदन चांदनी रात में चमकने लगा। उसकी खाई के पास छोटे-छोटे काले बाल थे जो उसकी कामुकता को और भी बढ़ा रहे थे और उसकी खाई से बहता हुआ रस उसे पूरी तरह गीला कर चुका था। मैंने पहले अपनी उंगली से उसकी खाई में खुदाई शुरू की जिससे वह जोर-जोर से सिसकारियां भरने लगी और अपने कूल्हों को ऊपर उठाने लगी। उसकी खाई इतनी तंग और मखमली थी कि उंगली जाते ही वह उसे अपनी पकड़ में ले लेती थी और संजना का शरीर प्यास से तड़प रहा था।

आखिरकार मैंने अपने खीरे को उसकी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से अंदर की तरफ धकेला जिससे संजना ने एक लंबी आह भरी। जैसे-जैसे मेरा खीरा उसकी तंग खाई की गहराई में उतर रहा था वैसे-वैसे उसे एक मीठा दर्द और असीम सुख महसूस हो रहा था। मैंने सामने से खोदना शुरू किया और लंबी-लंबी गपागप आवाजें रात के सन्नाटे को चीरने लगीं जो हमारे बीच की बढ़ती उत्तेजना का सबूत थीं। संजना के तरबूज हवा में उछल रहे थे और मैं उन्हें अपने हाथों से भींचते हुए लगातार खुदाई की गति बढ़ाता जा रहा था जिससे वह बेहाल हो रही थी।

कुछ देर बाद उसने करवट बदली और पिछवाड़े से खोदने के लिए अपनी कमर ऊपर उठा ली जिससे उसका पिछवाड़ा पूरी तरह से मेरी तरफ आ गया। मैंने उसके पिछवाड़े को थामते हुए अपने खीरे को फिर से उसकी खाई में पीछे से उतारा और जोर-जोर से झटके देने लगा। संजना की सिसकारियां अब ऊंची होने लगी थीं और वह बार-बार कह रही थी कि आज उसे पूरी तरह से खोद दो। हम दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो चुके थे लेकिन हमारी प्यास बुझने का नाम नहीं ले रही थी और हर झटके के साथ हमारा जुड़ाव और भी गहरा होता जा रहा था।

अंत में हम दोनों ही चरम सीमा पर पहुँच गए थे जहाँ अब और रुकना मुमकिन नहीं था और शरीर का सारा नियंत्रण खत्म होता जा रहा था। संजना ने मुझे अपनी बाहों में कसकर जकड़ लिया और मेरे खीरे ने उसकी खाई के अंदर अपना सारा गरम रस छोड़ दिया जिससे उसे भी गहरा रस छूटा। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे और भारी सांसें लेते रहे जैसे हमने कोई बड़ी जंग जीत ली हो। उस रात के बाद हमारा रिश्ता सिर्फ पड़ोसी का नहीं रहा बल्कि एक ऐसी रूहानी और जिस्मानी खुदाई का हिस्सा बन गया जिसे हम कभी नहीं भूल सकते थे।