शहर की चिलचिलाती धूप और शोर-शराबे से दूर जब आर्यन अपने मामा के गांव पहुँचा, तो उसे इस बात का कतई अंदाज़ नहीं था कि ये छुट्टियाँ उसके जीवन की सबसे कामुक और भावुक यादें बन जाएंगी। उसकी मामी, निशा, जिसकी उम्र करीब 30 के आसपास थी, गांव की ताजी हवा और सादगी में और भी ज्यादा निखर आई थी। उसका शरीर किसी सजीली मूर्ति की तरह सुडौल था, जिसमें उसके भारी और रसीले तरबूज हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेते थे। जब वह अपनी सूती साड़ी का पल्लू संभालती, तो उसकी कमर का लचीलापन और चौड़ा पिछवाड़ा आर्यन के मन में अजीब सी हलचल पैदा कर देता था।
निशा का व्यक्तित्व जितना शांत था, उसकी आँखों में उतनी ही गहरी प्यास छुपी हुई थी जिसे शायद सालों से किसी ने नहीं बुझाया था। आर्यन अक्सर उसे छुप-छुप कर देखता रहता, खासकर तब जब वह आंगन में कपड़े सुखाती और उसके तरबूज साड़ी के नीचे से अपनी मौजूदगी दर्ज कराते। आर्यन का खीरा उसकी पैंट के अंदर उनकी एक झलक पाते ही अकड़ने लगता था। उन दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता पनपने लगा था, जहाँ शब्दों से ज्यादा उनकी नजरें बात करती थीं। वह शर्म और झिझक के बीच एक ऐसी डोर थी जो उन्हें धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब ला रही थी।
एक दोपहर जब घर के सभी लोग पास के मेले में गए हुए थे, घर में सिर्फ आर्यन और निशा अकेले थे। बाहर लू चल रही थी, लेकिन घर के अंदर का माहौल उससे कहीं ज्यादा गर्म था। निशा रसोई में कुछ काम कर रही थी और उसके बदन से उठती पसीने की भीनी-भीनी खुशबू आर्यन की नसों में बिजली की तरह दौड़ रही थी। आर्यन हिम्मत जुटाकर रसोई में गया और मदद के बहाने उसके करीब खड़ा हो गया। जैसे ही उसका हाथ गलती से निशा के कमर के पास छू गया, निशा के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
आर्यन ने देखा कि निशा ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी सांसें तेज चलने लगी थीं। उसने धीरे से अपने हाथ निशा के भारी तरबूजों पर रख दिए और उन्हें सहलाने लगा। साड़ी के ऊपर से ही उन गोल और सख्त तरबूजों को महसूस करना आर्यन के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं था। उसने महसूस किया कि निशा के तरबूजों के बीच मौजूद मटर अब सख्त हो चुके थे, जो उसकी उत्तेजना को साफ बयां कर रहे थे। आर्यन ने उसे अपनी ओर घुमाया और बिना कुछ कहे उसके होंठों पर अपना प्यार बरसाना शुरू कर दिया, जिसे निशा ने भी पूरी शिद्दत से स्वीकार किया।
धीरे-धीरे वे दोनों बेडरूम की ओर बढ़े, जहाँ भावनाओं और इच्छाओं का समंदर फूटने को बेताब था। आर्यन ने निशा की साड़ी को धीरे-धीरे उसके बदन से अलग किया, जिससे उसका कुंदन जैसा गोरा बदन और उसकी गहरी खाई साफ़ नजर आने लगी। निशा की खाई के आसपास के काले बाल उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे। आर्यन अब खुद को रोक नहीं पाया और उसने निशा के खीरा चाटना शुरू कर दिया, जबकि निशा उसके मजबूत खीरे को अपने हाथों में लेकर सहलाने लगी। कमरे में सिर्फ उनकी भारी होती सांसों की आवाज गूँज रही थी।
आर्यन ने नीचे झुककर निशा की गहरी खाई को अपनी उंगली से खोदना शुरू किया। जैसे-जैसे उसकी उंगली खाई के अंदर गहराई तक जाती, निशा के मुँह से सिसकियाँ निकलने लगतीं। वह कामुकता के उस शिखर पर थी जहाँ उसे सिर्फ और सिर्फ आर्यन के खीरे की जरूरत थी। कुछ देर खाई चाटने के बाद, जब निशा पूरी तरह से गीली हो चुकी थी, आर्यन ने अपने सख्त और लंबे खीरे को उसकी खाई के मुहाने पर रखा। निशा ने उसे कसकर पकड़ लिया और इशारों में खुदाई शुरू करने को कहा।
जैसे ही आर्यन ने अपना खीरा निशा की तंग खाई के अंदर डाला, दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली। वह खुदाई इतनी गहरी और सुकून देने वाली थी कि निशा का पूरा शरीर कांप उठा। आर्यन धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू कर चुका था, और हर धक्के के साथ उसके खीरे की जड़ निशा की खाई की दीवारों से टकरा रही थी। निशा ने अपने पैरों को आर्यन की कमर पर कस लिया ताकि वह खुदाई की गहराई को और करीब से महसूस कर सके। उनके पसीने से लथपथ शरीर एक-दूसरे में समाते जा रहे थे।
खुदाई की गति अब बढ़ चुकी थी, और कमरे में शरीर के टकराने की आवाजें तेज हो गई थीं। आर्यन कभी उसे पिछवाड़े से खोदता तो कभी उसे बिस्तर के किनारे पर लिटाकर उसके रस का आनंद लेता। निशा बार-बार कह रही थी, "और तेज आर्यन, मुझे पूरी तरह से खोद डालो।" आर्यन का खीरा निशा की खाई की हर गहराई को नाप रहा था। उत्तेजना अपने चरम पर थी और जल्द ही वह पल आ गया जब दोनों का रस निकलने वाला था। आर्यन ने एक आखिरी जोरदार धक्का मारा और उसका सारा गरम रस निशा की खाई के अंदर भर गया।
निशा भी उसी पल चरम सुख को प्राप्त हुई और उसका रस भी छलक पड़ा। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, उनके शरीरों की थरथराहट धीरे-धीरे शांत हो रही थी। उस खुदाई के बाद जो सुकून उनके चेहरों पर था, वह किसी भी शब्द से परे था। निशा ने आर्यन के माथे को चूमा और उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह दोपहर उन दोनों के लिए सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि दो अतृप्त आत्माओं का मिलन बन गई थी, जिसकी यादें अब ताउम्र उनके दिलों में ताजा रहने वाली थीं।