सुमन भाभी की मदहोश खुदाई


दोपहर की उस सुनसान गर्मी में पूरा घर जैसे गहरी नींद में डूबा हुआ था, सिवाय मेरे और पड़ोस में रहने वाली सुमन भाभी के। भाभी अक्सर दोपहर में हमारे घर आती थीं, लेकिन आज माहौल कुछ अलग था क्योंकि घर पर कोई नहीं था। भाभी ने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहन रखी थी, जो उनके गोरे और भरे हुए बदन पर किसी कयामत से कम नहीं लग रही थी। उनके गोरे तरबूज साड़ी के ब्लाउज से बाहर झांकने को बेताब थे और साड़ी के पतले कपड़े से उनके मटर साफ़ उभर रहे थे, जिन्हें देखकर मेरे शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ने लगी थी और मेरा खीरा पैंट के अंदर ही अंगड़ाइयां लेने लगा था।

सुमन भाभी का बदन किसी ढली हुई मूरत जैसा था, उनकी कमर का घेरा इतना पतला था कि एक हाथ में समा जाए, लेकिन उनका पिछवाड़ा बहुत ही गदराया हुआ और उभरा हुआ था। जब वह चलती थीं, तो उनका पिछवाड़ा एक लय में हिलता था, जिसे देखकर किसी भी पुरुष का मन डोल जाए। उनके चेहरे पर एक भोलापन था, लेकिन उनकी आँखों में एक अनकही प्यास छिपी थी, जिसे मैं पिछले कई दिनों से महसूस कर रहा था। आज जब हम सोफे पर बैठे थे, तो उनकी सांसों की गर्मी मैं अपने चेहरे पर महसूस कर पा रहा था और उनके शरीर से आती सोंधी खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी।

हमारे बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव था, जो धीरे-धीरे आकर्षण में बदल चुका था। भाभी अक्सर अपनी तन्हाई की बातें मुझसे साझा करती थीं और मैं उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनता था। आज बातों-बातों में मैंने उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया, तो उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उनकी उंगलियों ने मेरे हाथ को और भी मजबूती से भींच लिया। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई थी। वह मन ही मन संघर्ष कर रही थीं, लेकिन उनकी देह की तड़प उनकी झिझक पर हावी हो रही थी, जिससे माहौल और भी कामुक हो गया था।

मैंने धीरे से अपना हाथ उनके तरबूजों की तरफ बढ़ाया और उन्हें अपनी हथेलियों में भर लिया। भाभी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके तरबूज इतने नरम और गर्म थे कि मुझे उनमें डूब जाने का मन कर रहा था। मैंने धीरे से उनके मटर को अपनी उंगलियों से सहलाया, जिससे वह और भी सख्त हो गए। भाभी का पूरा शरीर कांपने लगा था और उनकी सांसें तेज चलने लगी थीं। उन्होंने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया और धीरे से बुदबुदायीं, "आज कोई नहीं है, जो करना है कर लो, बस मुझे इस प्यास से आजाद कर दो।"

उनकी बात सुनते ही मेरा संयम जवाब दे गया और मैंने उन्हें खींचकर अपनी गोद में बिठा लिया। मैंने धीरे से उनकी साड़ी के पल्लू को हटाया और उनके दोनों तरबूजों को आज़ाद कर दिया। वह सफ़ेद और चमकदार तरबूज किसी बेशकीमती रत्न की तरह चमक रहे थे। मैंने झुककर उनके मटर को अपने मुंह में लिया और उन्हें चूसने लगा। भाभी ने सिसकारी भरते हुए मेरा सिर अपने तरबूजों में और भी जोर से दबा लिया। उनकी खाई अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वह अपनी जांघों को आपस में रगड़ रही थीं, जिससे उनके बालों का घर्षण साफ़ महसूस हो रहा था।

अब समय आ गया था उस गहरी खुदाई का, जिसके लिए हम दोनों ही तड़प रहे थे। मैंने उन्हें सोफे पर लिटाया और उनकी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर सरका दिया। उनकी रेशमी और चिकनी खाई के दर्शन होते ही मेरा खीरा अपनी पूरी लंबाई और मोटाई में तन गया। मैंने भाभी की खाई में अपनी उंगली डाली, तो वह गर्म शहद की तरह लस लसी थी। भाभी ने अपना पिछवाड़ा ऊपर उठाया और मुझे खुद में समाने का इशारा किया। मैंने अपना खीरा उनकी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया। भाभी ने दर्द और आनंद की एक मिली-जुली चीख मारी और मेरे कंधों को अपने नाखूनों से कुरेद दिया।

जैसे ही मेरा आधा खीरा उनकी तंग खाई के अंदर गया, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी जन्नत के द्वार पर खड़ा हूँ। मैंने धीरे-धीरे खुदाई की गति बढ़ानी शुरू की। भाभी की खाई मेरे खीरे को इतनी मजबूती से जकड़ रही थी कि हर धक्के के साथ मुझे चरम सुख का अहसास हो रहा था। हम दोनों पसीने से लथपथ थे और कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ और भाभी की मदहोश सिसकियां गूँज रही थीं। भाभी बार-बार कह रही थीं, "हाँ, ऐसे ही खोदो मुझे, और गहराई तक जाओ, आज मुझे पूरा भर दो।"

खुदाई अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी, मैं पागलों की तरह उनके पिछवाड़े को पकड़कर धक्के मार रहा था। भाभी की खाई से निकलता हुआ रस अब मेरे खीरे को और भी चिकना बना चुका था। भाभी ने अपनी दोनों टांगें मेरी कमर पर लपेट लीं और मुझे पूरी तरह अपने अंदर खींच लिया। कुछ ही मिनटों की उस दमदार खुदाई के बाद, भाभी का पूरा बदन जोर-जोर से झटकने लगा और उनकी खाई ने ढेर सारा रस छोड़ दिया। ठीक उसी पल मेरा भी रस निकलना शुरू हुआ और मैंने अपने खीरे का सारा गर्म रस उनकी खाई की गहराइयों में भर दिया। हम दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे, हमारी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं।

उस खुदाई के बाद भाभी के चेहरे पर एक गजब का सुकून था। उनकी बिखरी हुई जुल्फें और पसीने से चमकता हुआ बदन उनकी तृप्ति की कहानी कह रहा था। उन्होंने मुझे कसकर गले लगाया और मेरे माथे को चूमा। उस पल में कोई शर्म नहीं थी, बस एक-दूसरे के प्रति असीम प्यार और संतुष्टि थी। भाभी की हालत ऐसी थी कि वह हिलने के काबिल भी नहीं बची थीं, उनकी खाई अब भी मेरे रस से लबालब थी। वह बस मुस्कुरा रही थीं और मेरी बाहों में सुरक्षित महसूस कर रही थीं। वह दोपहर हमारे जीवन की सबसे यादगार दोपहर बन गई थी, जिसने हमारे रिश्ते को एक नई गहराई दे दी थी।