तपती दोपहर में जब पूरा मोहल्ला गहरी नींद में सोया होता था, तब कॉलेज जाने वाला रोहित अपने कमरे की खिड़की से बगल वाले घर की बालकनी की ओर टकटकी लगाए रहता था। वहाँ सुनीता भाभी, जो उम्र में उससे करीब सात-आठ साल बड़ी थीं, अक्सर अपने गीले कपड़े सुखाने के लिए आती थीं। उनके चलने के अंदाज़ में एक ऐसी खनक और बेपरवाही थी, जो रोहित के जवान मन में हलचल मचा देती थी। वे दोनों अक्सर बालकनी से ही एक-दूसरे को देख मुस्कुरा देते थे, लेकिन उस साधारण सी मुस्कुराहट के पीछे छिपी हुई जिस्मानी तड़प हर बीतते दिन के साथ और भी गहरी और बेकाबू होती जा रही थी।
सुनीता भाभी का शरीर किसी तराशे हुए संगमरमर के समान था, जिसमें हर मोड़ पर एक अलग ही कशिश थी। जब वे सूती साड़ी पहनती थीं, तो उनके बड़े और पुष्ट 'तरबूज' पल्लू के नीचे से झाँकने की नाकाम कोशिश करते थे, जिससे रोहित की साँसें अटक जाती थीं। उनका 'पिछवाड़ा' इतना गदराया हुआ और सुडौल था कि जब वे चलती थीं, तो वह धीरे-धीरे एक लय में हिलता था, जैसे कोई मदहोश कर देने वाला संगीत बज रहा हो। उनके चेहरे की मासूमियत और उनके बदन की इस कामुक बनावट का संगम रोहित के लिए किसी नशीले जाम की तरह था, जिसे वह हर लम्हा अपनी आँखों से पीना चाहता था।
एक खास दोपहर को, जब घर के बाकी लोग बाहर गए हुए थे, सुनीता भाभी ने रोहित को आवाज़ देकर अपने घर बुलाया। बहाना यह था कि उनके बेडरूम का छत वाला पंखा बहुत आवाज़ कर रहा है और उसे ठीक करना है। रोहित जब उनके घर के अंदर पहुँचा, तो वहाँ एक अजीब सी खामोशी और परफ्यूम की खुशबू फैली हुई थी। भाभी ने उस वक्त एक बहुत ही झीनी और ढीली नाइटी पहनी हुई थी, जिसके पतले कपड़े के आर-पार उनके गोरे बदन की चमक और अंगों की रूपरेखा साफ झलक रही थी। जब रोहित स्टूल पर चढ़कर पंखा देख रहा था, भाभी उसके ठीक पीछे खड़ी थीं, और उनकी गर्म साँसों का अहसास रोहित की नंगी पीठ पर बिजली की तरह दौड़ रहा था।
रोहित ने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा, उसकी नज़रें सीधे भाभी की गहरी आँखों से टकराईं, जिनमें एक अनकही प्यास और समर्पण साफ दिख रहा था। रोहित ने हिम्मत जुटाकर धीरे से भाभी के कोमल हाथ को अपने हाथ में लिया, तो भाभी ने विरोध करने के बजाय अपनी आँखें मूँद लीं और एक लंबी साँस भरी। रोहित के हाथ अब धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगे और उन्होंने भाभी के रसीले 'तरबूज' को अपनी हथेलियों में पूरी तरह भर लिया। उनके ऊपर लगे छोटे-छोटे 'मटर' अब उत्तेजना के मारे सख्त होने लगे थे, जो रोहित की उंगलियों को एक अलग ही सुखद अहसास दे रहे थे। भाभी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली और उन्होंने रोहित को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया।
उत्तेजना अब अपने चरम पर थी और दोनों के बीच की झिझक पूरी तरह मिट चुकी थी। रोहित ने भाभी के गुलाबी होंठों को अपने होंठों के घेरे में ले लिया और उनकी ज़ुबान का स्वाद चखने लगा। भाभी की नाइटी अब फर्श पर बेजान पड़ी थी और उनका पूरा नग्न बदन रोहित की आँखों के सामने एक खुली किताब की तरह था। उनकी रेशमी त्वचा पर पसीने की नन्ही बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे फूलों पर ओस गिरी हो। रोहित ने धीरे से घुटनों के बल बैठकर भाभी की जांघों के बीच की उस रहस्यमयी 'खाई' को निहारा, जहाँ घने 'बाल' उस रसीले द्वार के रक्षक बने हुए थे। उसने अपना चेहरा वहाँ झुकाया और अपनी ज़ुबान से उस 'खाई' की गहराई को महसूस करना शुरू किया, जिससे भाभी सुख के सागर में गोते खाने लगीं।
भाभी की कराहें अब और भी मदहोश करने वाली हो गई थीं, वे रोहित के बालों को अपनी उंगलियों में फंसाकर उसे और भी ज़ोर से अपने अंगों पर रगड़ रही थीं। उधर रोहित का 'खीरा' भी अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ अकड़ चुका था और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए बेताब था। भाभी ने उसे झुककर थाम लिया और उस सख्त 'खीरे' को अपने मुँह में लेकर बड़े प्यार से चूसना शुरू किया। रोहित को लगा जैसे उसका पूरा शरीर पिघल कर बह जाएगा। अंततः, रोहित ने भाभी को बिस्तर के किनारे पर झुकाया और उन्हें 'पिछवाड़े से खोदना' शुरू किया। उनके गदराए हुए 'पिछवाड़े' के बीच जब 'खीरा' रगड़ खा रहा था, तो कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ गूँज रही थी।
अब रोहित ने उन्हें सीधा लिटाया और 'सामने से खोदना' शुरू किया। जैसे ही उसने अपने सख्त 'खीरे' को भाभी की नम और तंग 'खाई' के अंदर एक गहरा धक्का दिया, भाभी की एक तीखी सिसकारी गूँज उठी। यह दर्द नहीं, बल्कि बरसों की प्यास बुझने का असीम आनंद था। 'खुदाई' की यह प्रक्रिया काफी लंबी और दमदार थी, जिसमें दोनों एक-दूसरे के शरीर का कोना-कोना खंगाल रहे थे। रोहित के हर धक्के के साथ भाभी की 'खाई' से एक विशेष प्रकार की आवाज़ निकल रही थी जो उनकी कामुकता को और बढ़ा रही थी। अंत में, एक बहुत ही तीव्र और तेज़ धक्के के साथ रोहित का सारा गाढ़ा 'रस' भाभी की 'खाई' की गहराई में उतर गया और भाभी का भी 'रस' निकल गया, जिससे दोनों पूरी तरह निढाल हो गए।
उस भीषण 'खुदाई' के बाद दोनों पसीने से तर-बतर बिस्तर पर ही एक-दूसरे से लिपटे रहे। भाभी का सिर रोहित की चौड़ी छाती पर था और वे धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ रोहित की त्वचा पर फिरा रही थीं। कमरे में अब एक गहरा सुकून था और दोनों के चेहरों पर एक ऐसी तृप्ति थी जो शब्दों में बयान नहीं की जा सकती थी। वह दोपहर सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि दो प्यासी रूहों का एक-दूसरे में विलीन हो जाने का उत्सव था, जिसने उनके पड़ोसी वाले रिश्ते में एक कभी न खत्म होने वाला गहरा राज़ भर दिया था।