रात के करीब ग्यारह बज रहे थे और पूरे कॉलेज कैंपस में सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन प्रोफेसर आर्यन के केबिन में अभी भी रोशनी जल रही थी। नेहा अपनी थीसिस पूरी करने के लिए उनके पास आई थी, लेकिन किताबों के पन्नों के बीच एक अलग ही तरह की गरमाहट महसूस हो रही थी। आर्यन की गहरी आवाज़ और उनके समझाने का अंदाज़ नेहा के दिल की धड़कनें बढ़ा रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पढ़ाई पर ध्यान दे या आर्यन की उन गहरी आँखों पर जो बार-बार उसे निहार रही थीं।
नेहा ने आज एक पतली सी रेशमी साड़ी पहनी थी, जिसमें से उसके शरीर का उभार साफ झलक रहा था और उसके यौवन की महक पूरे कमरे में फैली हुई थी। जब भी वह झुकती, उसके ब्लाउज में दबे दो बड़े और रसीले तरबूज आर्यन की नज़रों के सामने आ जाते, जिन्हें देखकर आर्यन का ध्यान बार-बार भटकने लगता था। उन तरबूजों के बीच की गहराई किसी गहरी घाटी की तरह लग रही थी, और उन पर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर साफ बता रहे थे कि नेहा के भीतर भी उत्तेजना की आग धीरे-धीरे सुलगने लगी है।
आर्यन ने महसूस किया कि नेहा की साँसों की गति तेज हो रही है और उसके चेहरे पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही हैं, जो उसकी बेताबी को बयां कर रही थीं। उन्होंने धीरे से अपना हाथ नेहा के हाथ पर रखा, जो मेज पर रखी किताब पर था, और उस स्पर्श ने जैसे बिजली का एक झटका दोनों के शरीरों में दौड़ा दिया। नेहा ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक लंबी आह भरी, उसे लगा जैसे उसका शरीर पिघल कर आर्यन की बाहों में समा जाना चाहता है, उसकी झिझक अब धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।
आर्यन अपनी कुर्सी से उठे और धीरे से नेहा के पीछे जाकर खड़े हो गए, उनके हाथों ने नेहा के कंधों से सरकते हुए उसके रेशमी बालों को छुआ। नेहा की गर्दन पर उनकी गरम साँसें महसूस हो रही थीं, जिससे उसके शरीर में एक थरथराहट सी पैदा हो गई और उसने पीछे मुड़कर आर्यन की आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई सवाल नहीं था, बल्कि एक गहरी प्यास थी जिसे बुझाने के लिए दोनों ही बेकरार थे।
आर्यन ने नेहा का चेहरा अपनी ओर घुमाया और धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन शुरू में बहुत कोमल था – जैसे दोनों सालों से दबी हुई भावनाओं और ज्ञान की तह में छिपी इच्छा को पहली बार छू रहे हों। नेहा के होंठ गर्म, नरम और थोड़े काँपते हुए थे। आर्यन ने धीरे से उन्हें चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। नेहा ने पहले हल्का विरोध किया, हाथों से आर्यन के सीने को धकेला, लेकिन उसका शरीर उसकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वह खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगी। दोनों की साँसें तेज हो गईं, केबिन में सिर्फ किताबों की महक और उनकी गर्म साँसों की आवाज़ थी। नेहा की साड़ी का पल्लू सरक गया, और उनके तरबूज आर्यन के सीने से दबकर एक मीठी पीड़ा दे रहे थे। पसीने की बूंदें नेहा की गर्दन से नीचे बह रही थीं, जो आर्यन की जीभ को और लुभा रही थीं।
आर्यन ने नेहा को मेज पर टिका दिया। उसने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। कपड़ा सरकते ही नेहा के दो बड़े, गोल, गोरे तरबूज बाहर आ गए – पसीने से चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। आर्यन ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। नेहा ने लंबी कराह के साथ कहा, “सर… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उसकी उंगलियाँ आर्यन के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और गहराई से दबा रही थी। आर्यन ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। नेहा की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। पसीना उसकी कमर से बह रहा था।
आर्यन ने साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। नेहा अब सिर्फ पतली पैंटी में थी। आर्यन ने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और नेहा की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, रात की तन्हाई से तर। आर्यन ने जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। नेहा का शरीर झटके से काँप उठा। “सर… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… पागल हो जाऊँगी…” लेकिन उसने खुद जांघें और फैला दीं। आर्यन ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। नेहा की कराहें अब केबिन में गूँज रही थीं। उसका पिछवाड़ा मेज पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।
कुछ देर बाद नेहा ने आर्यन को ऊपर खींच लिया। अब उसकी बारी थी। उसने आर्यन की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। नेहा की आँखें फैल गईं। “सर… इतना… इतना मजबूत…” उसने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। आर्यन कराहा, “नेहा… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना मीठा…” नेहा ने और गहरा लिया, चूसती रही, जीभ घुमाती रही। आर्यन का शरीर तन गया।
आर्यन ने नेहा को मेज पर ही लिटाया। जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “नेहा… तैयार हो?” नेहा ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… पहली बार… इतनी गहराई में…” आर्यन ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। नेहा ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” आर्यन धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। आर्यन ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। नेहा बोली, “और गहरा… सर… और तेज… खोदो मुझे… मेरी खाई को ज्ञान की गहराई तक ले जाओ…”
पोजीशन बदली। नेहा घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। आर्यन ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। नेहा का पिछवाड़ा हिल रहा था। आर्यन ने बाल पकड़े। “नेहा… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म…” नेहा चीखी, “तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला। आर्यन नहीं रुका। फिर सामने से।
दूसरी बार रस निकला तो आर्यन भी किनारे पर। तेज खोदा। नेहा ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर छोड़ दो…” आर्यन का रस छूटा, गर्म, भरपूर। दोनों कराहे, पसीने से तर।
रात भर जुड़े रहे। कभी सामने से, कभी पिछवाड़े से, कभी नेहा ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। नेहा फुसफुसाई, “सर… तुम्हारा खीरा… मुझे नया ज्ञान दे रहा है…” आर्यन बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी सबसे गहरी खोज है नेहा…” घंटों खोए रहे।
सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। नेहा की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना…” आर्यन ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।
सुबह की पहली किरण आई तो नेहा आर्यन के सीने पर सिर रखे सो रही थी। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “सर… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी थीसिस पर काम हो… केबिन में आ जाना।” आर्यन ने चुंबन किया। “नेहा… अब हर रात मेरी है… तुम्हारी गहरी खाई के ज्ञान की।” बाहर कैंपस जाग रहा था, लेकिन उनके अंदर की रात अभी भी मदहोश और गहरी थी।
(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और ज्ञान की गहरी खुदाई की थीम के साथ।)