तन्हाई में देवर-भाभी की मदहोश खुदाई

दोपहर की उस खामोश बेला में पूरा घर सन्नाटे की चादर ओढ़े सोया हुआ था, सिवाय मीरा के कमरे के जहाँ हवा की एक हल्की सी सरसराहट खिड़की के पर्दों को हिला रही थी। मीरा, जिसकी उम्र अभी मुश्किल से तीस के पार थी, अपनी रेशमी साड़ी को संभाले बिस्तर पर लेटी पुरानी यादों में खोई हुई थी। उसके शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, जहाँ उसके उभार यानी दो रसीले तरबूज साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी थी और उनके ऊपर छोटे-छोटे दाने जैसे मटर ठंडक और उत्तेजना से अकड़ रहे थे।



तभी दरवाजे पर एक हल्की सी दस्तक हुई और रोहन, उसका देवर, कमरे में दाखिल हुआ जो शहर से अपनी पढ़ाई पूरी कर लौटा था। रोहन की नजरें जैसे ही मीरा के बिखरे हुए बालों और उसकी ढीली पड़ती साड़ी पर पड़ी, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। मीरा की सुडौल कमर और उसका भारी पिछवाड़ा बिस्तर की चादर पर एक उभार पैदा कर रहा था जो रोहन के अंदर दबी हुई इच्छाओं को जगाने के लिए काफी था। उन दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता था, जो दुख और तन्हाई की बुनियाद पर खड़ा था, लेकिन आज उस तन्हाई में एक अजीब सी गर्माहट महसूस हो रही थी जो शब्दों से परे थी।


रोहन धीरे से मीरा के करीब आकर बैठ गया और उसकी रेशमी जुल्फों को अपने हाथों में भर लिया, जिससे मीरा के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। मीरा ने अपनी आँखें खोलीं और रोहन की आँखों में छिपी उस आग को देखा जिसे वह अब तक अनदेखा करती आ रही थी। उसकी साँसों की गति बढ़ गई थी और उसके हृदय की धड़कनें उसके सीने में दबे उन दो भारी तरबूजों को ऊपर-नीचे उछाल रही थीं। रोहन का हाथ धीरे से मीरा के चेहरे से होता हुआ उसकी गर्दन तक आया, जहाँ उसकी उंगलियों का स्पर्श बिजली के झटके की तरह मीरा के पूरे बदन में फैल गया और उसकी झिझक धीरे-धीरे पिघलने लगी।


मीरा ने रोहन का हाथ पकड़ना चाहा लेकिन उसकी अपनी उंगलियाँ कांप रही थीं, क्योंकि उसे पता था कि यह स्पर्श कहाँ ले जाएगा। रोहन ने बिना कुछ कहे मीरा के चेहरे को अपने करीब खींचा और उसके गुलाबी होंठों को अपने होंठों से ढंक लिया, जिसे हम रसीला स्पर्श कहते हैं। उस स्पर्श में बरसों की प्यास और तन्हाई सिमटी हुई थी। चुंबन शुरू में बहुत कोमल था – जैसे दोनों सालों से दबी उदासी और इच्छा को पहली बार छू रहे हों। मीरा के होंठ नरम, गर्म और थोड़े काँपते हुए थे। रोहन ने धीरे से उन्हें चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। मीरा ने पहले हल्का विरोध किया, हाथों से रोहन के सीने को धकेला, लेकिन उनका शरीर उनकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वे खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगीं। दोनों की साँसें तेज हो गईं, कमरे में सिर्फ पंखे की हवा और उनकी गर्म साँसों की आवाज़ थी। मीरा की साड़ी का पल्लू सरक गया, और उनके तरबूज रोहन के सीने से दबकर एक मीठी कंपकंपी दे रहे थे। पसीने की बूंदें मीरा की गर्दन से नीचे बह रही थीं, जो रोहन की जीभ को और लुभा रही थीं।


रोहन ने मीरा को धीरे से बिस्तर पर लिटा दिया। उसने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। कपड़ा सरकते ही मीरा के दो बड़े, गोल, गोरे तरबूज बाहर आ गए – पसीने से चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। रोहन ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। मीरा ने लंबी कराह के साथ कहा, “रोहन… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उनकी उंगलियाँ रोहन के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और गहराई से दबा रही थीं। रोहन ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। मीरा की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। पसीना उनकी कमर से बह रहा था।


रोहन ने साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। मीरा अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। रोहन ने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और मीरा की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, तन्हाई की प्यास से तर। रोहन ने जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। मीरा का शरीर झटके से काँप उठा। “रोहन… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… सह नहीं पाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें और फैला दीं। रोहन ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। मीरा की कराहें अब कमरे में गूँज रही थीं। उनका पिछवाड़ा बिस्तर पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।


कुछ देर बाद मीरा ने रोहन को ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने रोहन की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। मीरा की आँखें फैल गईं। “रोहन… इतना… इतना मजबूत…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। रोहन कराहा, “भाभी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना मीठा…” मीरा ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ घुमाती रहीं। रोहन का शरीर तन गया।


रोहन ने मीरा को बिस्तर पर लिटाया। जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “भाभी… तैयार हो?” मीरा ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत तन्हा रही हूँ…” रोहन ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। मीरा ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” रोहन धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। रोहन ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। मीरा बोलीं, “और गहरा… रोहन… और तेज… खोदो मुझे… मेरी तन्हाई को पूरी तरह भर दो…”


पोजीशन बदली। मीरा घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। रोहन ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। मीरा का पिछवाड़ा हिल रहा था। रोहन ने बाल पकड़े। “भाभी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म…” मीरा चीखीं, “तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला। रोहन नहीं रुका। फिर सामने से।


दूसरी बार रस निकला तो रोहन भी किनारे पर। तेज खोदा। मीरा ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर छोड़ दो…” रोहन का रस छूटा, गर्म, भरपूर। दोनों कराहे, पसीने से तर।


रात भर जुड़े रहे। कभी सामने से, कभी पिछवाड़े से, कभी मीरा ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। मीरा फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे फिर से जीने का एहसास देता है…” रोहन बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी तन्हाई की दुनिया है भाभी…” घंटों खोए रहे।


सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। मीरा की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना…” रोहन ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।


सुबह की पहली किरण आई तो मीरा रोहन के सीने पर सिर रखे सो रही थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “रोहन… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी तन्हाई सताए… मेरे कमरे में आ जाना।” रोहन ने चुंबन किया। “भाभी… अब हर दोपहर मेरी है… तुम्हारी मदहोश खाई की।” बाहर धूप चढ़ रही थी, लेकिन उनके अंदर की आग अभी भी जल रही थी।


(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और तन्हाई में मदहोश खुदाई पर फोकस के साथ।)