भाभी की रसीली खाई में देवर की गहरी खुदाई

गर्मी की वो दोपहर आज भी समीर के जेहन में किसी दहकते अंगारे की तरह ताज़ा थी जब घर के बाकी लोग किसी रिश्तेदार की शादी में शहर से बाहर गए हुए थे। घर में सिर्फ समीर और उसकी बेहद खूबसूरत भाभी नताशा ही अकेले थे जो अपनी अपनी किताबों और यादों में डूबे हुए थे। नताशा भाभी की उम्र करीब सत्ताईस साल थी और उनके बदन का ढांचा किसी तराशी हुई मूरत जैसा था जिसे देखकर किसी भी पुरुष का मन डोल जाए। समीर पिछले कई महीनों से अपनी पढ़ाई के बहाने उन्हें चोरी-छिपे निहारा करता था और उसके मन में उनके प्रति एक अजीब सी कशिश और खिंचाव पैदा होने लगा था जो अब बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा था।



नताशा भाभी ने उस दिन एक बहुत ही पतली और झीनी सी साड़ी पहनी हुई थी जिसके नीचे से उनके गदराए हुए तरबूज साफ झलक रहे थे और उनके उभारों पर उभरे हुए नन्हे मटर साड़ी के कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। उनका पिछवाड़ा इतना भारी और सुडौल था कि जब वह चलती थीं तो समीर की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं और उसे अपनी पतलून के भीतर अपने खीरे की बढ़ती हुई सख्ती महसूस होने लगती थी। उनके शरीर की बनावट में एक अजीब सा ठहराव और कामुकता का मिश्रण था जो समीर को उनकी तरफ किसी चुंबकीय शक्ति की तरह खींच रहा था और वह चाहकर भी अपनी नज़रें उनके अंगों से नहीं हटा पा रहा था।


समीर और नताशा के बीच का रिश्ता हमेशा से ही बहुत प्यारा और सम्मानजनक रहा था लेकिन पिछले कुछ दिनों से बातों के लहजे में एक अनकही सी शरारत घुलने लगी थी। नताशा भी शायद समीर की नज़रों की तपिश को महसूस कर रही थीं और कभी-कभी वह भी जानबूझकर पल्लू गिरा देती थीं जिससे उनके सफ़ेद और रसीले तरबूज समीर की आँखों के सामने पूरी तरह नुमाया हो जाते थे। इस भावनात्मक जुड़ाव ने अब एक शारीरिक प्यास का रूप ले लिया था जहाँ दोनों ही एक दूसरे के करीब आने का बहाना ढूंढ रहे थे लेकिन लोक-लाज की दीवार उन्हें रोकने की कोशिश कर रही थी।


उस दोपहर जब नताशा रसोई में काम कर रही थीं तो समीर पानी पीने के बहाने वहां गया और देखा कि पसीने की कुछ बूंदें उनकी गर्दन से होते हुए उनके तरबूजों की गहरी घाटी में समा रही थीं। उस दृश्य को देखकर समीर के भीतर आकर्षण का ज्वालामुखी फट पड़ा। वह धीरे-धीरे नताशा के पीछे पहुँचा, इतना करीब कि उसकी साँसें भाभी की गर्दन पर महसूस हो रही थीं। नताशा ने पलटकर देखा, उनकी आँखों में शर्म, झिझक और एक गहरी, दबी हुई लालसा थी। “समीर… तुम… यहां क्या कर रहे हो?” उनकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन विरोध में नहीं।


समीर ने बिना कुछ कहे नताशा की कमर को दोनों हाथों से जकड़ लिया और उन्हें अपनी ओर घुमाया। दोनों की साँसें एक-दूसरे के चेहरों पर टकरा रही थीं। समीर ने धीरे से उनका चेहरा ऊपर उठाया और उनके रसीले होंठों को अपने मुंह में भर लिया। चुंबन शुरू में बहुत कोमल था – जैसे दोनों सालों से दबी भावनाओं को पहली बार छू रहे हों। नताशा के होंठ गर्म, नरम और थोड़े काँपते हुए थे। समीर ने धीरे से उन्हें चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। भाभी ने पहले हल्का विरोध किया, हाथों से समीर के सीने को धकेला, लेकिन उनका शरीर उनकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वे खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगीं। दोनों की साँसें तेज हो गईं, रसोई में गर्मी और उनकी गर्माहट मिलकर असहनीय हो गई थी। नताशा की साड़ी का पल्लू सरक गया, और उनके तरबूज समीर के सीने से दबकर एक मीठी कंपकंपी दे रहे थे।


समीर ने भाभी को काउंटर पर टिका दिया। उसने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। कपड़ा सरकते ही नताशा के दो बड़े, गोल, गोरे तरबूज बाहर आ गए – पसीने से चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। समीर ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। नताशा ने लंबी कराह के साथ कहा, “समीर… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उनकी उंगलियाँ समीर के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और गहराई से दबा रही थीं। समीर ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। भाभी की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। पसीना उनकी कमर से बह रहा था।


समीर ने साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। नताशा अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। समीर ने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और भाभी की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, गर्मी से और गर्म। समीर ने घुटनों के बल बैठकर जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। नताशा का शरीर झटके से काँप उठा। “समीर… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… पागल हो जाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें और फैला दीं। समीर ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। भाभी की कराहें अब रसोई में गूँज रही थीं। उनका पिछवाड़ा काउंटर पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।


कुछ देर बाद नताशा ने समीर को ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने समीर की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। भाभी की आँखें फैल गईं। “समीर… इतना… इतना मजबूत…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। समीर कराहा, “भाभी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना मीठा…” भाभी ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ घुमाती रहीं। समीर का शरीर तन गया।


समीर ने भाभी को बेडरूम ले जाया। बिस्तर पर लिटाकर जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “भाभी… तैयार हो?” नताशा ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत दिनों से… कोई नहीं आया…” समीर ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। भाभी ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” समीर धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। समीर ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। भाभी बोलीं, “और गहरा… समीर… तेज… खोदो मुझे… पूरी तरह खोदो… मेरी रसीली खाई में गहराई तक…”


पोजीशन बदली। भाभी घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। समीर ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। भाभी का पिछवाड़ा हिल रहा था। समीर ने बाल पकड़े। “भाभी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म… कितनी रसीली…” नताशा चीखीं, “तेज… और तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला, गर्म, बहता हुआ। समीर नहीं रुका। फिर सामने से।


दूसरी बार रस निकला तो समीर भी किनारे पर। तेज खोदा। भाभी ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर छोड़ दो… मेरी खाई को अपना रस दो…” समीर ने आखिरी थ्रस्ट दिए, गर्म रस खाई के अंदर छूट गया – भरपूर, गहराई तक। दोनों कराहे, पसीने से तर, साँसें मिली हुईं।


रात भर जुड़े रहे। कभी सामने से, कभी पिछवाड़े से, कभी भाभी ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। नताशा फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे पागल कर देता है… हर बार गहरा लगता है…” समीर बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी दुनिया है भाभी… इतनी रसीली, इतनी गहरी…” घंटों खोए रहे। हर रस छूटने के बाद थोड़ा रुकते, चुंबन करते, पसीना चाटते, फिर शुरू।


सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। भाभी की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना… पूरा अंदर…” समीर ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।


सुबह की पहली किरण आई तो नताशा समीर के सीने पर सिर रखे सो रही थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “समीर… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी घर सूना हो… आ जाना।” समीर ने चुंबन किया। “भाभी… अब हर दोपहर मेरी है… तुम्हारी रसीली खाई की।” बाहर गर्मी फिर शुरू हो रही थी, लेकिन उनके अंदर की आग अभी भी धीमी-धीमी जल रही थी।


(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और गहरी खुदाई पर फोकस के साथ।)