दोपहर की वह सुनसान घड़ी थी जब पूरी सोसाइटी में सन्नाटा पसरा हुआ था और सूरज की तपिश खिड़कियों के कांच से टकराकर अंदर की गर्मी को और भी बढ़ा रही थी। आर्यन अपने कमरे में बैठा किताब पढ़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसका ध्यान बार-बार पड़ोस में रहने वाली सुनीता भाभी के ख्यालों में भटक रहा था। सुनीता भाभी की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी लेकिन उनका यौवन किसी अंगूर की बेल की तरह लहलहा रहा था जो देखने वाले की आँखों में प्यास जगा देता था। आर्यन पिछले कई हफ्तों से उनके हर कदम और हर अदा पर गुपचुप नजरें गड़ाए बैठा रहता था और आज मौका तब मिला जब भाभी ने उसे कुछ सामान ठीक करने के बहाने अपने घर बुलाया था।
सुनीता भाभी के घर का दरवाजा आधा खुला था और जैसे ही आर्यन अंदर दाखिल हुआ उसे रसोई से आती हुई उनकी खुशबू ने बेचैन कर दिया। वह एक हल्की नीली साड़ी में खड़ी थीं जो उनके गोरे बदन पर किसी झरने की तरह लिपटी हुई थी और उनकी पीठ का खुला हिस्सा आर्यन के दिल की धड़कनें तेज कर रहा था। उनके शरीर की बनावट ऐसी थी कि हर कोई दंग रह जाए उनके भारी-भरकम तरबूज साड़ी के ब्लाउज के अंदर जैसे कैद होने के लिए छटपटा रहे थे और हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। आर्यन ने उन्हें पीछे से देखते हुए अपनी सूखी गर्दन को सहलाया और धीरे से उन्हें आवाज दी जिसके बाद भाभी ने मुड़कर उसे एक ऐसी मुस्कान दी जिसने आर्यन के इरादों को और भी मजबूत कर दिया।
आर्यन और सुनीता भाभी के बीच पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सा तनावपूर्ण खिंचाव महसूस हो रहा था जो शब्दों से ज्यादा आँखों की भाषा में बयां होता था। भाभी भी जानती थीं कि जवान आर्यन उन्हें किस नजर से देखता है और शायद उनके मन के किसी कोने में भी उस दबी हुई आग की चिंगारी सुलग रही थी जिसे उनके पति के अक्सर बाहर रहने ने ठंडा छोड़ दिया था। उन दोनों के बीच एक भावनात्मक जुड़ाव सा बन गया था जहाँ बिना कुछ कहे भी वे एक-दूसरे की जरूरतों और अकेलेपन को महसूस कर पा रहे थे। कमरे में पसरी खामोशी अब केवल उनकी तेज होती सांसों से टूट रही थी और आर्यन ने महसूस किया कि अब पीछे हटने का समय निकल चुका है क्योंकि भाभी की नजरों में भी वही प्यास थी जो उसके दिल में थी।
भाभी ने धीरे से आर्यन का हाथ पकड़ा और उसे सोफे की ओर ले गईं लेकिन आर्यन ने हिम्मत जुटाकर उनके हाथ को कसकर थाम लिया और उन्हें अपनी ओर खींच लिया। सुनीता भाभी की धड़कनें अब उनके सीने में कैद तरबूजों के साथ और तेज हो गईं। आर्यन ने उनका चेहरा ऊपर उठाया और धीरे से उनके रसीले होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन शुरू में सिर्फ स्पर्श था – नरम, काँपता हुआ, जैसे दोनों सालों से दबी इच्छा को पहली बार आज़ाद कर रहे हों। सुनीता भाभी के होंठ गर्म थे, थोड़े कांपते हुए। आर्यन ने धीरे से उन्हें चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। भाभी ने पहले हल्का विरोध किया, हाथों से आर्यन के सीने को धकेला, लेकिन उनका शरीर उनकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वह खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगीं। दोनों की साँसें तेज हो गईं, कमरे में एसी की ठंडक के बावजूद उनकी गर्मी बढ़ती जा रही थी। भाभी की साड़ी का पल्लू अब सरक चुका था, और उनके तरबूज आर्यन के सीने से दबकर एक मीठी पीड़ा दे रहे थे। पसीने की बूंदें भाभी की गर्दन से नीचे बह रही थीं, जो आर्यन की जीभ को और लुभा रही थीं।
आर्यन ने भाभी को सोफे पर धीरे से बिठा दिया। उसने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। कपड़ा सरकते ही भाभी के दो बड़े, गोल, गोरे तरबूज बाहर आ गए – पसीने से चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। आर्यन ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। सुनीता भाभी ने लंबी कराह के साथ कहा, “आर्यन… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उनकी उंगलियाँ आर्यन के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और गहराई से दबा रही थीं। आर्यन ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। भाभी की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। पसीना उनकी कमर से बह रहा था, और कमरे की गर्मी अब असहनीय हो चुकी थी।
आर्यन ने भाभी की साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। भाभी अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। आर्यन ने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और भाभी की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, दोपहर की गर्मी से और गर्म। आर्यन ने घुटनों के बल बैठकर जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। सुनीता भाभी का शरीर झटके से काँप उठा। “आर्यन… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… पागल हो जाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें और फैला दीं। आर्यन ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। भाभी की कराहें अब कमरे में गूँज रही थीं। उनका पिछवाड़ा सोफे पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।
कुछ देर बाद सुनीता भाभी ने आर्यन को ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने आर्यन की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। भाभी की आँखें फैल गईं। “आर्यन… इतना… इतना मजबूत…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। आर्यन कराहा, “भाभी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना मीठा…” भाभी ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ घुमाती रहीं। आर्यन का शरीर तन गया।
आर्यन ने भाभी को बेडरूम ले जाया। बिस्तर पर लिटाकर जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “भाभी… तैयार हो?” सुनीता ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत अकेली रही हूँ…” आर्यन ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। भाभी ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” आर्यन धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। आर्यन ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। भाभी बोलीं, “और गहरा… आर्यन… तेज… खोदो मुझे… पूरी तरह खोदो…”
पोजीशन बदली। भाभी घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। आर्यन ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। भाभी का पिछवाड़ा हिल रहा था। आर्यन ने बाल पकड़े। “भाभी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म…” सुनीता चीखीं, “तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला। आर्यन नहीं रुका। फिर सामने से।
दूसरी बार रस निकला तो आर्यन भी किनारे पर। तेज खोदा। भाभी ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर छोड़ दो…” आर्यन का रस छूटा, गर्म, भरपूर। दोनों कराहे, पसीने से तर।
रात भर जुड़े रहे। कभी सामने, कभी पिछवाड़े से, कभी भाभी ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। सुनीता फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे फिर से जवान कर देता है…” आर्यन बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी दोपहरों की दुनिया है भाभी…” घंटों खोए रहे।
सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। भाभी की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना…” आर्यन ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।
दोपहर ढल रही थी, सुनीता आर्यन के सीने पर सिर रखे सोई थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “आर्यन… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी दोपहर सूनी लगे… दरवाजा खटखटाना।” आर्यन ने चुंबन किया। “भाभी… अब हर दोपहर मेरी है… तुम्हारी।” बाहर सूरज ढल रहा था, लेकिन उनके अंदर की गर्मी अभी भी जल रही थी, अगली दोपहर का इंतज़ार करती हुई।
(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और दोपहर की थीम के साथ।)