राहुल शहर से अपने गाँव जा रहा था। रात की आखिरी बस थी, जो देर रात निकली थी। बस में मुश्किल से दस-बारह सवारियाँ थीं। बारिश हो रही थी, खिड़कियाँ बंद थीं, और अंदर की लाइटें हल्की-हल्की जल रही थीं। राहुल की सीट के बगल में एक महिला बैठी थी, उम्र करीब ३५ साल की, नाम प्रिया। वह भी गाँव जा रही थी। प्रिया की साड़ी गीली हो गई थी, जो उसके शरीर से चिपक गई थी। उसके तरबूज साड़ी के ब्लाउज से उभरे हुए थे, मटर सख्त और गुलाबी, जो बस की हल्की रोशनी में चमक रहे थे। राहुल की नजरें बार-बार उस पर जा रही थीं। प्रिया ने भी महसूस किया, लेकिन वह मुस्कुरा दी। “बारिश बहुत तेज है ना?” उसने कहा। राहुल ने हाँ में सिर हिलाया, “हाँ, रोड भी खराब है। रात भर लगेगी पहुँचने में।” बातें शुरू हो गईं। प्रिया ने बताया कि वह विधवा है, गाँव में अकेली रहती है। राहुल ने कहा कि वह भी गाँव जा रहा है, काम से। बातें धीरे-धीरे गहरी होती गईं। प्रिया की आँखों में एक उदासी थी, लेकिन साथ ही एक छुपी हुई प्यास भी। राहुल को लगा कि ये रात कुछ अलग होने वाली है। बस की लाइटें अचानक बंद हो गईं, अंधेरा छा गया। बस रुक गई, ड्राइवर बोला, “लाइट चली गई, थोड़ा इंतजार करो।” कमरे जैसी बस में अंधेरा और बारिश की आवाज़ ने माहौल को और गर्म कर दिया।
प्रिया ने धीरे से कहा, “डर लग रहा है अंधेरे में।” राहुल ने हिम्मत करके उसका हाथ थामा, “डरिए मत, मैं हूँ ना।” प्रिया का हाथ गर्म था, काँप रहा था। राहुल ने उंगलियाँ आपस में फंसाईं। प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया। “तुम्हारी उंगलियाँ कितनी मजबूत हैं,” उसने फुसफुसाया। राहुल ने कहा, “आपकी कितनी नरम।” बातें धीरे-धीरे निजी होती गईं। प्रिया ने बताया कि उसके पति की मौत के बाद वह अकेली है, कोई साथी नहीं। “प्यास बहुत सताती है, लेकिन किससे कहूँ?” राहुल ने कहा, “मैं समझता हूँ। कभी-कभी तन्हाई बहुत भारी हो जाती है।” प्रिया की साँसें तेज हो गईं। उसने राहुल का हाथ अपनी जांघ पर रख दिया। राहुल का दिल जोर से धड़का। वह धीरे से जांघ सहलाने लगा। प्रिया की आँखें बंद हो गईं। “राहुल… ये… गलत है, लेकिन अच्छा लग रहा है।” राहुल ने कहा, “कुछ गलत नहीं है। बस दो दिलों की मिलन है।” बस फिर चल पड़ी, लेकिन अंधेरा अभी भी था। बस की हलचल ने उन्हें और करीब ला दिया। राहुल का हाथ अब ऊपर सरकने लगा। प्रिया ने रोकने की कोशिश नहीं की। उसकी जांघें नरम और गर्म थीं। राहुल को महसूस हुआ कि प्रिया की खाई में पहले से ही नमी है। वह धीरे से साड़ी का पल्लू सरका दिया।
प्रिया की साड़ी का पल्लू सरकते ही उसके तरबूज उभर आए। ब्लाउज के हुक ढीले थे, तरबूज आधे बाहर। राहुल ने हाथ बढ़ाकर एक तरबूज को छुआ। “प्रिया… कितने नरम हैं ये…” प्रिया ने आह भरी, “राहुल… धीरे… कोई देख लेगा…” लेकिन बस में सब सो रहे थे, अंधेरा था। राहुल ने ब्लाउज के हुक खोल दिए। तरबूज पूरी तरह बाहर – बड़े, गोल, गोरे, मटर सख्त और गुलाबी। राहुल ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया। प्रिया की साँसें रुक गईं। “आह… राहुल… कितना अच्छा लग रहा है… बहुत दिनों से किसी ने छुआ नहीं…” राहुल ने मटर को उंगलियों से घुमाया। प्रिया का शरीर काँप उठा। वह धीरे से बोली, “चूसो इन्हें… मैं… मैं पागल हो रही हूँ…” राहुल ने झुककर एक तरबूज मुंह में लिया। जीभ से मटर को चाटा, चूसा। प्रिया ने कराहा, “आह… हाँ… जोर से… राहुल… तुम्हारा मुंह कितना गरम है…” राहुल ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूसा। प्रिया की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। पसीना उनकी कमर से बह रहा था। “राहुल… नीचे… नीचे भी छुओ… मैं… मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रही…” राहुल का हाथ नीचे सरका। साड़ी का पेटीकोट ऊपर किया। प्रिया की पैंटी गीली थी। राहुल ने पैंटी सरकाई। खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई। राहुल ने उंगली से खाई को छुआ। प्रिया चीखने लगी, लेकिन दबी आवाज़ में, “आह… राहुल… उंगली डालो… अंदर…”
राहुल ने उंगली से खाई में उंगली डाली। “सासू माँ… कितनी गरम है आपकी खाई…” प्रिया बोलीं, “हाँ… तेरी वजह से… और डालो… दो उंगलियाँ…” राहुल ने दो उंगलियाँ डाली, अंदर-बाहर करने लगा। प्रिया का शरीर लहरा रहा था। “आह… हाँ… ऐसे ही… राहुल… मैं… मैं रस छूटने वाली हूँ…” उसका रस निकल आया, गर्म, बहता हुआ। राहुल ने उंगली चाटी। “ कितना मीठा है आपका रस…” प्रिया शर्मा गईं, “राहुल… अब… अब खीरा… मुझे खोदो…” राहुल ने अपना खीरा निकाला। प्रिया ने देखा, “इतना बड़ा… इतना सख्त…” उसने हाथ से पकड़ा, सहलाया। “राहुल… इसे मुंह में लेने दो…” प्रिया ने खीरा मुंह में लिया, चूसा। “आह… कितना गरम है… राहुल… अब खोदो मुझे…”
राहुल ने प्रिया को लिटाया। जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। तैयार हो?” प्रिया ने कहा, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत दिनों से कोई नहीं आया अंदर…” राहुल ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। प्रिया चीखीं, “आह… दर्द हो रहा है… लेकिन मजा भी… हाँ… पूरा डालो…” राहुल ने पूरा खीरा अंदर किया। प्रिया की आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन मुस्कान भी थी। “राहुल… अब खोदो… धीरे-धीरे…” राहुल ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। हर थ्रस्ट में प्रिया की खाई और गीली होती गई। “आह… हाँ… ऐसे ही… राहुल… कितना मजा आ रहा है… दर्द भी मीठा लग रहा है…” राहुल ने तेज किया। प्रिया बोलीं, “तेज… और तेज… मुझे अपनी र@#ड़ी बना लो… खोदो मुझे… आह… हाँ… और गहरा…” राहुल ने एक तरबूज मुंह में लिया, चूसा। “आपकी खाई कितनी तंग है… कितनी गरम…” प्रिया चीखीं, “हाँ… तेरे खीरे से और तंग हो गई है… खोद मुझे… मुझे तोड़ डाल… आह… दर्द हो रहा है लेकिन रुकना मत… और जोर से…”
वे पोजीशन बदली। प्रिया ऊपर आईं। खुद हिलने लगीं। “देख… मैं तुझे खोद रही हूँ… आह… कितना गहरा जा रहा है… राहुल… दर्द भी हो रहा है लेकिन मजा और ज्यादा…” उनके तरबूज राहुल के सीने से रगड़ खा रहे थे। राहुल ने उन्हें दबाया, “आपके तरबूज कितने मखमली हैं…” प्रिया हँसीं-कराहतीं, “तेरे दबाने से और सख्त हो गए… चूस इन्हें… काट ले… आह… हाँ… दर्द का मजा ले… मुझे दर्द दे… मजा दे…”
फिर पिछवाड़े से। प्रिया घुटनों के बल। राहुल ने पीछे से डाला। प्रिया चीखीं, “आह… पिछवाड़े से… दर्द हो रहा है… लेकिन अच्छा लग रहा है… खोदो… और गहरा… मुझे तोड़ डालो…” राहुल तेज़ हो गया। प्रिया का रस कई बार निकला। “रुकना मत… और जोर से… दर्द सह लूँगी… मजा बहुत है… आह… हाँ… खोदो … मुझे अपनी रख@#ल बना लो…”
आखिरी राउंड में दोनों पसीने से तर। प्रिया बोलीं, “राहुल… अब अंदर… अपना रस दे दो… मुझे पूरा भर दो…” राहुल ने तेजी से खोदा। प्रिया चीखीं, “आह… दर्द… मजा… हाँ… छूट रहा है मेरा रस… तेरे साथ…” दोनों का रस साथ निकला। प्रिया चीखीं, “आह… कितना गरम रस है तेरा… दर्द हो रहा है लेकिन सुकून भी… मुझे अपना बच्चा दे दो राहुल…”
दोनों थककर लेट गए। प्रिया बोलीं, “राहुल… ये पाप है… लेकिन कितना सुकून है। दर्द भी मीठा लग रहा है।”
राहुल ने कहा, “सासू माँ, ये प्यार है। आपका दर्द मेरा मजा है।”
प्रिया मुस्कुराईं, “फिर से… एक बार और… दर्द सह लूँगी… मजा लूँगी…”
रात भर वे जुड़े रहे। कभी धीरे, कभी तेज। प्रिया कहती रहीं, “और जोर से… दर्द दो… मजा दो…” सुबह प्रिया मुस्कुराईं, “ये राज़ हमारा रहेगा। लेकिन जब भी तन्हाई सताए… आ जाना। दर्द सहूँगी, मजा लूँगी।”
