पड़ोसन कविता भाभी के साथ प्यासी खुदाई

दोपहर की उस तपती धूप में पूरा मोहल्ला सन्नाटे की चादर ओढ़े सोया हुआ था, लेकिन समीर की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। वह अपनी बालकनी में खड़ा सामने वाली खिड़की की ओर देख रहा था, जहां कविता भाभी अपनी गीली साड़ी सुखा रही थीं। कविता भाभी, जिनकी उम्र करीब पैंतीस साल थी, एक ऐसी विधवा थीं जिनके शरीर की बनावट किसी को भी दीवाना बनाने के लिए काफी थी। उनके उभरे हुए बड़े-बड़े तरबूज साड़ी के पल्लू के नीचे से झांक रहे थे और उनकी कमर का वह घेरा समीर के मन में हलचल मचा रहा था। समीर पिछले कई महीनों से भाभी की उस रेशमी त्वचा और उनकी गहरी खाई के ख्यालों में खोया रहता था, लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया था। आज कविता भाभी ने उसे किसी बहाने से अपने घर बुलाया था, और समीर का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।



समीर जब भाभी के घर पहुँचा, तो वहां का माहौल कुछ अलग ही था। कविता भाभी ने हल्के नीले रंग की पतली नाइटी पहनी हुई थी, जिसमें से उनके शरीर के हर मोड़ साफ नजर आ रहे थे। उनके दोनों विशाल तरबूज नाइटी के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे और उन पर लगे नन्हे मटर के दाने साफ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। भाभी ने मुस्कुराते हुए समीर को अंदर आने का इशारा किया और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। उस बंद कमरे में कविता की खुशबू और उनकी सांसों की गर्मी समीर को मदहोश करने लगी थी। समीर ने देखा कि भाभी की आंखों में एक अजीब सी तड़प थी, जैसे वे बरसों से किसी गहरे स्पर्श के लिए तरस रही हों। उनके बीच की खामोशी अब शब्दों की मोहताज नहीं थी, क्योंकि दोनों के जिस्म एक-दूसरे के करीब आने की गवाही दे रहे थे।


समीर ने हिम्मत जुटाकर भाभी के हाथ को छुआ, तो उनके शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। भाभी ने अपनी आँखें मूंद लीं और समीर को अपने करीब खींच लिया। समीर का हाथ धीरे-धीरे ऊपर बढ़ते हुए उनके भारी तरबूजों तक जा पहुँचा, जिन्हें छूते ही समीर को एक अद्भुत कोमलता का एहसास हुआ। उसने उन तरबूजों को अपनी हथेलियों में भरकर धीरे से दबाया, जिससे भाभी के गले से एक धीमी कराह निकली। भाभी ने समीर के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों का रस पीने लगीं। यह चुंबन इतना गहरा और भावुक था कि समीर को लगा जैसे वह किसी और ही दुनिया में पहुँचा गया हो। उसका अपना खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहा था।


भाभी ने समीर को सोफे पर धीरे से बिठा दिया। नाइटी के पतले पट्टे सरक गए, और उनके तरबूज पूरी तरह सामने आ गए – गोरे, भरे हुए, पसीने से चमकते हुए। समीर ने दोनों तरबूजों को हाथों में लिया, हल्के-हल्के दबाया, अंगूठों से मटर को घुमाया। कविता भाभी की साँसें रुक-रुक कर आने लगीं। “समीर… आह… इतनी धीरे… मैं… मैं सह नहीं पा रही…” लेकिन उनकी आवाज़ में विरोध नहीं था, सिर्फ एक गहरी, लंबी तड़प। समीर ने एक तरबूज मुंह में लिया, जीभ से मटर को चूसा, हल्का सा काटा जैसा। भाभी की पीठ झुक गई, कराहें कमरे में गूँजने लगीं। पसीना उनकी गर्दन से बहकर तरबूजों की घाटी में समा रहा था, और समीर उसे जीभ से चाट रहा था।


समीर ने नाइटी पूरी तरह ऊपर सरका दी। भाभी अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। उसने पैंटी को धीरे से खींचा, और भाभी की खाई सामने आ गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, प्यास से तरबतर। समीर ने जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को पहली बार छुआ। भाभी का पूरा शरीर एक झटके से काँप उठा। “समीर… ओह… ये… क्या कर रहे हो… मैं… पागल हो जाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें फैला दीं, हाथों से समीर का सिर पकड़कर और पास खींच लिया। समीर ने खाई चाटना शुरू किया – धीरे-धीरे, गहराई से, जीभ ऊपर-नीचे घुमाते हुए, मटर को चूसते हुए। भाभी की कराहें अब लगातार थीं, उनका पिछवाड़ा सोफे पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।


कुछ देर बाद भाभी ने समीर को ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने समीर की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर एक चमकदार बूँद। भाभी की आँखें फैल गईं। “समीर… इतना… इतना जवान… इतना सख्त…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर्फ सिर चाटा, फिर धीरे-धीरे गहरा। समीर कराहा, “भाभी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना नरम…” भाभी ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ चारों तरफ घुमाती रहीं। समीर का शरीर तन गया, साँसें तेज हो गईं।


समीर ने भाभी को बेडरूम ले जाया। बिस्तर पर लिटाकर जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “भाभी… तैयार हो?” कविता ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… दो साल से… कोई नहीं छुआ है मुझे…” समीर ने बहुत धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच, भाभी की खाई तंग लेकिन भीगी हुई। भाभी ने लंबी कराह के साथ कहा, “आह… पूरा… धीरे से… हाँ… ऐसे ही भर दो मुझे…” समीर धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। हर थ्रस्ट में भाभी की खाई और गीली होती गई। तरबूज हिल रहे थे, मटर सख्त। समीर ने एक तरबूज मुंह में लिया, चूसते हुए खुदाई जारी रखी। भाभी की आहें लगातार थीं – “और गहरा… समीर… और तेज… खोदो मुझे… मेरी प्यासी खाई को पूरी तरह खोदो…”


पोजीशन बदली। भाभी घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। समीर ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। भाभी का पिछवाड़ा हर थ्रस्ट पर हिल रहा था। समीर ने बाल हल्के से पकड़े। “भाभी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी रसीली… कितनी प्यासी…” भाभी चीखीं, “तेज… और तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ… आह…” शरीर काँपा, खाई सिकुड़ गई, गर्म रस बह निकला। समीर नहीं रुका। फिर सामने से।


दूसरी बार रस निकला तो समीर भी किनारे पर। तेज खोदा। भाभी ने उसे जकड़ लिया, नाखून पीठ में गड़े। “अंदर… समीर… सब अंदर छोड़ दो… मेरी खाई को अपना रस दो… मुझे फिर से जीने दो…” समीर ने आखिरी थ्रस्ट दिए, गर्म रस खाई के अंदर छूट गया – भरपूर, गहराई तक। दोनों कराहे, पसीने से तर, साँसें एक हो गईं।


रात भर जुड़े रहे। कभी सामने से, कभी पिछवाड़े से, कभी भाभी ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। भाभी फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे पागल कर देता है… हर बार नया लगता है…” समीर बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी प्यास बुझाती है भाभी… इतनी गहरी, इतनी रसीली…” घंटों खोए रहे। हर रस छूटने के बाद थोड़ा रुकते, चुंबन करते, पसीना चाटते, फिर शुरू।


सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। भाभी की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना… पूरा अंदर…” समीर ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।


सुबह की पहली किरण आई तो कविता भाभी समीर के सीने पर सिर रखे सो रही थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “समीर… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी दोपहर तपे… मेरे पास आ जाना।” समीर ने चुंबन किया। “भाभी… अब हर दोपहर मेरी है… तुम्हारी प्यासी खाई की।” बाहर धूप फिर चढ़ रही थी, लेकिन उनके अंदर की प्यास अभी भी बुझी नहीं थी, अगली मुलाकात का इंतज़ार कर रही थी।


(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और प्यासी खुदाई पर फोकस के साथ।)