गरम दोपहर में मामी के साथ खुदाई

 समीर अपनी मामी रेखा के घर गर्मियों की छुट्टियों में आया था। गाँव की वह तपती हुई दोपहर और घर का सन्नाटा माहौल को और भी भारी और मादक बना रहा था। रेखा मामी की उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उनका शरीर किसी खिली हुई कली की तरह तरोताजा और आकर्षक था। जब वह अपनी हल्की रेशमी साड़ी में समीर के सामने से गुजरती थीं, तो उसके दिल की धड़कनें अचानक तेज हो जाती थीं। उनकी चाल में एक ऐसी स्वाभाविक लय और मादकता थी जो समीर को अंदर तक झकझोर कर रख देती थी और उसका मन भटकने लगता था।



रेखा मामी के शरीर के उभार किसी महान कलाकार की जीती-जागती कृति के समान थे। साड़ी के पतले कपड़े के पार से झाँकते उनके विशाल तरबूज समीर की आँखों को अपनी ओर खींचने के लिए मजबूर कर देते थे। उन उभरे हुए तरबूजों के ऊपर नन्हे मटर जैसे उभार साड़ी के महीन रेशों के पार से भी साफ तौर पर दिखाई देते थे। जब वह घर का काम करने के लिए झुकती थीं, तो समीर को उनके गहरे और रहस्यमयी खजाने की एक हल्की सी झलक मिल जाती थी। उनका सुडौल पिछवाड़ा भी काफी भरा हुआ था, जो हर कदम पर एक खास अंदाज़ में थिरकता था।


समीर और रेखा के बीच एक अजीब सी अनकही कशमकश काफी दिनों से चल रही थी। समीर ने कई बार महसूस किया था कि रेखा मामी भी उसे बहुत गौर से और प्यासी नज़रों से देखती थीं। उनकी नज़रों में एक ऐसी गहरी प्यास थी, जिसे वह शायद बरसों से अपने भीतर दबाए बैठी थीं। एक दिन जब दोपहर के समय घर के बाकी सभी सदस्य किसी काम से बाहर गए हुए थे, समीर प्यास बुझाने के लिए रसोई की ओर बढ़ा। वहाँ रेखा मामी अकेली खड़ी कुछ काम कर रही थीं और उनके बदन से पसीने की एक भीनी खुशबू आ रही थी।


समीर ने अपनी सारी हिम्मत जुटाई और धीरे से उनके बिल्कुल पीछे जाकर खड़ा हो गया। रेखा मामी की साड़ी का पल्लू उनके गोरे कंधे से फिसलकर नीचे गिर गया था, जिससे उनके उभरे हुए तरबूजों का आधा हिस्सा समीर के सामने उजागर हो गया। पसीने की बूंदें उनकी गर्दन से बहकर उस गहरी घाटी में समा रही थीं। समीर की साँसें भाभी की गर्दन पर महसूस हो रही थीं। रेखा मामी ने पलटकर देखा, उनकी आँखों में शर्म, झिझक और एक गहरी, दबी हुई लालसा थी। “समीर… तुम… यहां…” उनकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन विरोध में नहीं।


समीर ने बिना कुछ कहे रेखा मामी की कमर को दोनों हाथों से जकड़ लिया और उन्हें अपनी ओर घुमाया। दोनों की साँसें एक-दूसरे के चेहरों पर टकरा रही थीं। समीर ने धीरे से उनका चेहरा ऊपर उठाया और उनके रसीले होंठों को अपने मुंह में भर लिया। चुंबन शुरू में बहुत कोमल था – जैसे दोनों सालों से दबी भावनाओं को पहली बार छू रहे हों। रेखा मामी के होंठ गर्म, नरम और थोड़े काँपते हुए थे। समीर ने धीरे से उन्हें चूसा, जीभ से हल्का सा छुआ। मामी ने पहले हल्का विरोध किया, हाथों से समीर के सीने को धकेला, लेकिन उनका शरीर उनकी इच्छा के खिलाफ काम कर रहा था। जल्दी ही वे खुद ही होंठों को और गहराई से दबाने लगीं। दोनों की साँसें तेज हो गईं, रसोई में गर्मी और उनकी गर्माहट मिलकर असहनीय हो गई थी। मामी की साड़ी का पल्लू पूरी तरह सरक गया, और उनके तरबूज समीर के सीने से दबकर एक मीठी पीड़ा दे रहे थे।


समीर ने मामी को रसोई के काउंटर पर टिका दिया। उसने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। कपड़ा सरकते ही रेखा मामी के दो बड़े, गोल, गोरे तरबूज बाहर आ गए – पसीने से चमकते हुए, ऊपर मटर सख्त और गुलाबी। समीर ने एक तरबूज को हाथ में लिया, हल्का दबाया, और मुंह में ले लिया। जीभ से मटर को घुमाया, चूसा। रेखा मामी ने लंबी कराह के साथ कहा, “समीर… आह… धीरे… इतनी ताकत से मत…” लेकिन उनकी उंगलियाँ समीर के बालों में फंस गईं, और वो खुद ही उसका सिर और गहराई से दबा रही थीं। समीर ने दूसरे तरबूज को भी सहलाया, चूमा, चूसा। मामी की गर्दन पीछे झुक गई, आँखें बंद, मुँह से लगातार छोटी-छोटी आहें निकल रही थीं। पसीना उनकी कमर से बह रहा था।


समीर ने साड़ी का पेटीकोट खोल दिया। मामी अब सिर्फ पतली पैंटी में थीं। समीर ने पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, और मामी की खाई नंगी हो गई – हल्के बालों से घिरी, गुलाबी, पूरी तरह भीगी हुई, दोपहर की गर्मी से और गर्म। समीर ने घुटनों के बल बैठकर जांघों को चूमा, ऊपर बढ़ा, और जीभ से खाई को छुआ। रेखा मामी का शरीर झटके से काँप उठा। “समीर… ओह… ये… ऐसा मत करो… मैं… पागल हो जाऊँगी…” लेकिन उन्होंने खुद जांघें और फैला दीं। समीर ने खाई चाटना शुरू किया – बहुत धीरे, गहराई से, जीभ हर कोने को छूती हुई, मटर को चूसती हुई। मामी की कराहें अब रसोई में गूँज रही थीं। उनका पिछवाड़ा काउंटर पर रगड़ खा रहा था, पसीना बह रहा था।


कुछ देर बाद रेखा मामी ने समीर को ऊपर खींच लिया। अब उनकी बारी थी। उन्होंने समीर की शर्ट उतारी, पैंट खोली। खीरा बाहर निकला – सख्त, लंबा, नसों से भरा, सिर पर चमकदार बूँद। मामी की आँखें फैल गईं। “समीर… इतना… इतना मजबूत…” उन्होंने हाथ से पकड़ा, सहलाया, फिर मुंह में लिया। पहले सिर चाटा, फिर गहरा। समीर कराहा, “मामी… तुम्हारा मुंह… कितना गर्म… कितना मीठा…” मामी ने और गहरा लिया, चूसती रहीं, जीभ घुमाती रहीं। समीर का शरीर तन गया।


समीर ने मामी को बेडरूम ले जाया। बिस्तर पर लिटाकर जांघें फैलाईं। खीरा खाई के मुंह पर रखा। “मामी… तैयार हो?” रेखा ने फुसफुसाया, “हाँ… लेकिन धीरे… बहुत दिनों से… कोई नहीं आया अंदर…” समीर ने धीरे दबाया। खीरा घुसा – इंच-दर-इंच। मामी ने कराहा, “आह… पूरा… हाँ… ऐसे…” समीर धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तरबूज हिल रहे थे। समीर ने एक तरबूज चूसा, खुदाई जारी रखी। मामी बोलीं, “और गहरा… समीर… और तेज… खोदो मुझे… मेरी खाई को पूरी तरह भर दो…”


पोजीशन बदली। मामी घुटनों पर, पिछवाड़ा ऊपर। समीर ने पीछे से डाला, गहरा, तेज। मामी का पिछवाड़ा हिल रहा था। समीर ने बाल पकड़े। “मामी… तुम्हारी खाई… कितनी तंग… कितनी गर्म…” रेखा चीखीं, “तेज… मैं रस छूटने वाली हूँ…” शरीर काँपा, रस निकला। समीर नहीं रुका। फिर सामने से।


दूसरी बार रस निकला तो समीर भी किनारे पर। तेज खोदा। मामी ने जकड़ा, “अंदर… सब अंदर छोड़ दो…” समीर का रस छूटा, गर्म, भरपूर। दोनों कराहे, पसीने से तर।


रात भर जुड़े रहे। कभी सामने से, कभी पिछवाड़े से, कभी मामी ऊपर। हर बार धीरे शुरू, फिर तेज। रेखा फुसफुसाईं, “तुम्हारा खीरा… मुझे फिर से जवान कर देता है…” समीर बोला, “और तुम्हारी खाई… मेरी दोपहरों की दुनिया है मामी…” घंटों खोए रहे।


सुबह से पहले एक बार और। पिछवाड़े से, धीरे। मामी की कराह, “धीरे… लेकिन मत रुकना…” समीर ने पूरा किया। तीसरा रस निकला। थककर लेटे।


सुबह की पहली किरण आई तो रेखा मामी समीर के सीने पर सिर रखे सो रही थीं। आँखें खोलीं, मुस्कुराईं। “समीर… ये हमारा राज़ रहेगा। लेकिन… जब भी गर्मी तपे… मेरे पास आ जाना।” समीर ने चुंबन किया। “मामी… अब हर दोपहर मेरी है… तुम्हारी गरम खाई की।” बाहर धूप फिर चढ़ रही थी, लेकिन उनके अंदर की आग अभी भी जल रही थी।


(कुल शब्द: लगभग ११८०। पूरी तरह धीमी, भावुक, विस्तृत और गरम दोपहर की थीम के साथ।)