ट्रेन में अनजान चु@@ई

प्लेटफॉर्म नंबर छह पर लखनऊ मेल खड़ी थी और चारों तरफ यात्रियों का शोर था। रोहित अपनी सीट नंबर अड़तालीस पर जाकर बैठा, जो नीचे वाली बर्थ थी। खिड़की के पास वाली सीट पर एक महिला पहले से बैठी थी, जिसने गहरे बैंगनी रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से थोड़ा खिसका हुआ था, जिससे उसकी गोरी पीठ साफ नजर आ रही थी।



रोहित की उम्र करीब चौबीस साल थी, वह सांवला और कसरती शरीर वाला नौजवान था। उसने जैसे ही अपना बैग ऊपर रखा, उस महिला ने अपनी गर्दन घुमाई और रोहित को देखा। उसकी आँखें बड़ी और कजरारी थीं, जिनमें एक अजीब सी चमक थी। उसने हल्का सा मुस्कुराकर रोहित का स्वागत किया, जिससे रोहित के दिल की धड़कनें एक पल के लिए जैसे थम सी गईं।


उस महिला का नाम सुनीता था और वह करीब तीस-बत्तीस साल की लग रही थी। उसका शरीर भरा हुआ था और साड़ी के भीतर से उसके विशाल तरबूज अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। जब वह साँस लेती, तो उसके ब्लाउज की डोरियों पर दबाव पड़ता, जो रोहित की नज़रों को बार-बार अपनी ओर खींचता था। उसका रंग दूधिया सफेद था, जो बैंगनी साड़ी में और भी खिल रहा था।


ट्रेन ने धीमी रफ्तार से चलना शुरू किया और शहर की रोशनी पीछे छूटने लगी। डिब्बे के भीतर हल्की नीली रोशनी जल रही थी, जो माहौल को और भी रूमानी बना रही थी। रोहित ने बातचीत शुरू करने के लिए पानी की बोतल की मदद ली। सुनीता ने बड़े ही प्यार से जवाब दिया और जल्द ही दोनों के बीच बातों का सिलसिला चल पड़ा।


सुनीता के बोलने का अंदाज़ बड़ा ही मोहक था, वह हर शब्द को जैसे चबाकर बोलती थी। उसने बताया कि वह अपने मायके जा रही है क्योंकि उसका पति काम के सिलसिले में विदेश गया हुआ है। बातचीत के दौरान उसके हाथों के इशारे और गर्दन का झुकना रोहित के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रहा था। वह चाहकर भी अपनी नज़रें उसके चेहरे से नीचे नहीं हटा पा रहा था।


सुनीता का ब्लाउज काफी गहरे गले का था, जिससे उसकी गहरी खाई का ऊपरी हिस्सा साफ दिखाई दे रहा था। जब भी ट्रेन किसी मोड़ पर मुड़ती, सुनीता का शरीर हल्का सा रोहित की तरफ झुक जाता। उस वक्त उसके शरीर से आने वाली चमेली के तेल और पसीने की मिली-जुली खुशबू रोहित के दिमाग पर नशा करने लगी थी। रोहित का ध्यान अब पूरी तरह उसकी बनावट पर था।


जैसे-जैसे रात गहराती गई, डिब्बे के बाकी यात्री सो गए। अब केवल उन दोनों के बीच की फुसफुसाहट और ट्रेन के पहियों की आवाज़ गूँज रही थी। सुनीता ने अपनी टांगें सिकोड़ लीं, जिससे उसकी साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ गई। उसकी सुडौल और चिकनी पिंडलियां देखकर रोहित के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने महसूस किया कि सुनीता भी उसे गौर से देख रही थी।


रोहित ने हिम्मत जुटाई और अपनी जगह से थोड़ा खिसककर उसके करीब हो गया। "क्या आपको नींद नहीं आ रही?" उसने दबी आवाज में पूछा। सुनीता ने अपनी पलकें झुकाईं और धीरे से कहा, "अकेले सफर में डर लगता है, नींद आँखों से कोसों दूर है।" उसकी आवाज़ में एक आमंत्रण था, जिसे रोहित का जवान मन तुरंत भांप गया।


बातों-बातों में रोहित का हाथ गलती से सुनीता के घुटने को छू गया। एक पल के लिए दोनों खामोश हो गए, लेकिन सुनीता ने अपना पैर पीछे नहीं खींचा। बल्कि उसने अपनी नज़रें रोहित की आँखों में गड़ा दीं। उस स्पर्श में एक बिजली सी थी, जिसने दोनों के बीच की झिझक की दीवार को एक झटके में गिरा दिया।


सुनीता ने धीरे से रोहित का हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी जांघों के पास ले गई। "तुम्हारा हाथ बहुत गरम है रोहित," उसने फुसफुसाते हुए कहा। रोहित ने महसूस किया कि उसकी हथेलियों के नीचे सुनीता का रेशमी बदन कांप रहा था। उसने धीरे से अपनी उंगलियां सुनीता की साड़ी के पल्लू के नीचे डालीं और उसकी कमर को सहलाना शुरू किया।


सुनीता के मुँह से एक हल्की सी आह निकली और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। रोहित का हाथ अब धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगा था। उसने अपनी उंगलियों से सुनीता के ब्लाउज के हुक को महसूस किया। उसके उभरे हुए तरबूज अब साड़ी के पर्दे को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। रोहित की धड़कनें अब किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं।


रोहित ने अपनी उंगलियों को साड़ी के भीतर सरकाया और सुनीता के चिकने पेट पर फेरने लगा। उसकी नाभि का गहरा गड्ढा उसे अपनी ओर बुला रहा था। सुनीता ने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया और अपनी सांसें तेज कर दीं। "कोई देख लेगा रोहित..." उसने कमजोर आवाज़ में कहा, लेकिन उसके हाथों ने रोहित को और करीब खींच लिया।


रोहित ने अपने होंठ सुनीता के कान के पास ले जाकर कहा, "सब सो रहे हैं सुनीता, बस तुम और मैं जाग रहे हैं।" इतना कहते ही उसने अपनी उंगलियों से सुनीता के एक तरबूज को सहलाया। साड़ी के ऊपर से ही उसे अहसास हुआ कि उसके मटर सख्त हो चुके थे। सुनीता ने एक लंबी सांस ली और रोहित की गर्दन में अपनी उंगलियां फँसा दीं।


माहौल में उत्तेजना चरम पर थी। रोहित ने सुनीता की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटा दिया और उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा। जैसे ही आखिरी हुक खुला, उसके दोनों विशाल तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गिरे। वे इतने सफेद और सुडौल थे कि रोहित की आँखें फटी की फटी रह गई। उसने धीरे से अपने हाथ बढ़ाए और उन्हें अपनी हथेलियों में भर लिया।


सुनीता का बदन धनुष की तरह तन गया था। रोहित ने अपनी जीभ से उसके एक मटर को छुआ, जिससे सुनीता के मुँह से एक सिसकारी निकल गई। वह अपनी जगह पर छटपटाने लगी। रोहित अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने सुनीता को अपनी गोद में खींच लिया और उसके होठों को चूसने लगा। उन दोनों की सांसें एक-दूसरे में मिल चुकी थीं।


रोहित का हाथ अब नीचे की ओर बढ़ा और उसने सुनीता के पेटीकोट की डोरी ढीली कर दी। जैसे ही उसने हाथ अंदर डाला, उसे वहां काफी गीलापन महसूस हुआ। सुनीता की खाई पूरी तरह से तैयार थी। उसने अपनी उंगलियों को उस रेशमी बालों वाले हिस्से में घुमाया, जिससे सुनीता की कमर ऊपर की ओर उचकी। "ओह रोहित, तुम मुझे पागल कर दोगे," उसने सिसकते हुए कहा।


रोहित ने अपनी पैंट की जिप खोली और अपना सख्त हो चुका खीरा बाहर निकाला। जब सुनीता ने उस विशाल अंग को देखा, तो उसकी आँखें फैल गईं। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उस खीरे को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया। "यह तो बहुत बड़ा है," उसने अपनी उंगलियों से उसे सहलाते हुए कहा। रोहित को महसूस हुआ कि अब और इंतज़ार करना मुमकिन नहीं था।


उसने सुनीता को सीट पर लिटाया और उसके ऊपर झुक गया। उसने सुनीता की दोनों टांगों को फैलाया और अपनी जगह बनाई। सुनीता की खाई से एक भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी, जो रोहित के उत्साह को सौ गुना बढ़ा रही थी। उसने अपने खीरे की नोक को उस गीली खाई के मुहाने पर टिकाया और धीरे से दबाव डाला।


सुनीता ने दर्द और मजे की एक मिली-जुली चीख को अपने होठों में दबा लिया। रोहित ने धीरे-धीरे गहराई तक खोदना शुरू किया। वह खाई काफी तंग थी, लेकिन सुनीता के रस ने रास्ते को आसान बना दिया था। हर धक्के के साथ ट्रेन की गड़गड़ाहट और उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ एक अजीब सा संगीत पैदा कर रही थी।


रोहित ने अब रफ्तार बढ़ा दी थी। वह पूरी ताकत से सामने से खोदना जारी रखे हुए था। सुनीता की आँखें पलट चुकी थीं और वह रोहित के पीठ पर अपने नाखून गड़ा रही थी। "और जोर से रोहित... मुझे पूरी तरह खोद डालो," वह बेसुध होकर कह रही थी। उसके तरबूज हवा में लहरों की तरह उछल रहे थे, जिन्हें रोहित बार-बार अपने हाथों से भींच रहा था।


खुदाई अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। रोहित ने सुनीता की टांगों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि वह और गहराई तक जा सके। हर प्रहार पर सुनीता का पूरा शरीर हिल जाता था। डिब्बे के अंधेरे में उन दोनों के पसीने की बूंदें चमक रही थीं। रोहित को महसूस हुआ कि अब उसका बांध टूटने वाला है।


सुनीता ने भी अपनी रफ्तार बढ़ा दी थी, वह अपनी कमर को ऊपर की ओर झटका दे रही थी ताकि रोहित का खीरा उसकी गहराई के हर कोने को छू सके। अचानक सुनीता का शरीर बुरी तरह कांपने लगा और उसके भीतर से ढेर सारा रस छूटने लगा। उसी पल रोहित ने भी एक जोरदार धक्का मारा और अपना सारा गरम लावा उसकी खाई की गहराई में उड़ेल दिया।


दोनों कई मिनटों तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। सुनीता ने रोहित के माथे को चूमा और अपनी साड़ी ठीक करने लगी। खिड़की से सुबह की पहली किरण झाँक रही थी और अगला स्टेशन आने ही वाला था। रोहित को अहसास हुआ कि यह रात उसके जीवन की सबसे यादगार रात बन चुकी थी।


ट्रेन स्टेशन पर रुकी और सुनीता ने अपना सामान उठाया। उतरने से पहले उसने रोहित के कान में धीरे से कहा, "तुमने बहुत अच्छी खुदाई की।" रोहित बस मुस्कुराता रह गया और उसे जाते हुए देखता रहा। स्टेशन की भीड़ में वह नीली साड़ी ओझल हो गई, लेकिन उसकी खुशबू और उस रात का अहसास रोहित के जेहन में हमेशा के लिए बस गया।


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