गांव की वह सुनसान दोपहर और पुरानी हवेली का वह पिछला हिस्सा, जहाँ मालती अक्सर अकेले वक्त बिताया करती थी। मालती की उम्र करीब तीस के पार रही होगी, उसका शरीर एक पके हुए आम की तरह रसीला और गठा हुआ था, जिसकी बनावट किसी को भी अपनी ओर खींचने के लिए काफी थी। उस दिन उसने बहुत ही महीन सूती साड़ी पहनी थी, जिससे उसके शरीर के उभार साफ झलक रहे थे, और धूप की तपिश ने उसके माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें बिखेर दी थीं। उसके रेशमी बालों की लटें बार-बार उसके चेहरे पर आकर गिर रही थीं, जिन्हें वह अपनी उंगलियों से पीछे हटा रही थी।
हवेली की साफ-सफाई के लिए शहर से आए हुए नए माली, राघव, की नजरें अक्सर मालती के उन भारी भरकम तरबूजों पर टिक जाती थीं, जो साड़ी के ब्लाउज को चीरकर बाहर आने को बेताब लगते थे। राघव एक गबरू जवान था, जिसके कंधे चौड़े और शरीर में मेहनत की चमक थी। मालती ने जब राघव को अपने बगीचे की क्यारियों की खुदाई करते हुए देखा, तो उसके मन में एक अजीब सी हलचल पैदा होने लगी। उसने महसूस किया कि राघव की मांसपेशियां काम करते समय जिस तरह से खिंचती थीं, वह बहुत ही आकर्षक और मर्दाना अहसास दे रही थीं।
मालती ने राघव को अपने कमरे में बुलाया ताकि वह उसे कुछ पुराने सामान को हटाने में मदद कर सके। कमरे के अंदर सन्नाटा था, सिर्फ छत के पंखे की धीमी आवाज गूंज रही थी। मालती जब राघव को अलमारी की ओर इशारा कर रही थी, तब उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया, जिससे उसके उभरे हुए मटर साफ नजर आने लगे। राघव की सांसें तेज हो गईं और उसने अपना ध्यान भटकाने की कोशिश की, लेकिन मालती की आंखों में जो निमंत्रण था, उसने राघव के कदम वहीं रोक दिए। दोनों के बीच एक अनकहा खिंचाव पैदा हो गया था, जो धीरे-धीरे मर्यादाओं की दीवार को लांघने के लिए तैयार था।
मालती ने धीरे से राघव का हाथ पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा, जिससे उसकी धड़कनें राघव की छाती से टकराने लगीं। राघव ने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ मालती की कमर पर रखा, जहाँ की त्वचा रेशम की तरह मुलायम और गर्म थी। मालती के मुँह से एक हल्की सी कराह निकली और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। राघव ने अपनी उंगलियों को धीरे-धीरे मालती के शरीर के उतार-चढ़ाव पर घुमाना शुरू किया, जिससे उसके पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। वह पल बहुत ही नाजुक और भावनाओं से भरा हुआ था, जहाँ झिझक अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी।
राघव ने धीरे से मालती के साड़ी के ब्लाउज के हुक खोले, जिससे उसके भारी और दूधिया तरबूज पूरी तरह आजाद होकर राघव के सामने आ गए। उन तरबूजों के बीच का गहरा अहसास और उनके ऊपर उभरे हुए गुलाबी मटर राघव को पागल कर रहे थे। उसने अपने होंठों को उन मटरों पर रख दिया और उन्हें धीरे-धीरे चूसने लगा, जिससे मालती की कमर कमान की तरह मुड़ गई। मालती ने राघव के बालों में अपनी उंगलियां फँसा लीं और उसे अपने और करीब खींचने लगी। कमरे की गर्मी अब और भी बढ़ चुकी थी और दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो रहे थे।
मालती ने राघव की पेंट की चैन खोली और उसके अंदर छिपे हुए विशाल और सख्त खीरा को बाहर निकाला। उस खीरा की लंबाई और मोटाई देखकर मालती की आँखें फटी रह गईं, वह खीरा गुस्से में लाल और पूरी तरह से तैयार खड़ा था। मालती ने धीरे से अपने होंठ उस खीरा पर टिका दिए और उसे अपने मुँह में लेकर गहराई तक चूसना शुरू किया। राघव के मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं क्योंकि मालती का यह अंदाज बहुत ही मोहक था। वह अपनी उंगली से मालती की रेशमी खाई को भी सहला रही थी, जो अब पूरी तरह से गीली और रस से लबालब हो चुकी थी।
राघव ने मालती को बिस्तर पर लिटाया और उसकी खाई के पास जाकर उसे अपनी जीभ से चाटना शुरू किया। मालती की खाई में उंगली डालते ही उसे एक गहरा आनंद मिला और वह बिस्तर की चादरों को अपने हाथों में भींचने लगी। राघव ने महसूस किया कि मालती की खाई अब उसके खीरा की गहराई को झेलने के लिए बेकरार है। उसने मालती को सामने से खोदना शुरू करने के लिए उसे सीधा लिटाया और धीरे-धीरे अपने खीरा का सिरा उसकी खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही राघव ने हल्का सा दबाव दिया, मालती के मुँह से एक लंबी आह निकली और उसका पूरा शरीर कांप उठा।
राघव ने अब खुदाई की गति को धीरे-धीरे बढ़ाना शुरू किया, हर धक्का मालती की गहराई तक पहुँच रहा था। कमरे में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की आवाज और भारी सांसें गूंज रही थीं। मालती बार-बार कह रही थी, "हाँ राघव, मुझे और जोर से खोदो, आज मेरी सारी प्यास बुझा दो।" राघव ने उसे करवट दिलाकर अब पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे खुदाई का मजा और भी दोगुना हो गया। मालती के तरबूज बिस्तर पर झूल रहे थे और राघव की पकड़ उसकी कमर पर बहुत मजबूत थी। दोनों ही चरम आनंद की ओर बढ़ रहे थे और पसीने से सराबोर उनके बदन आपस में चिपके हुए थे।
अंत में, जब राघव ने खुदाई की गति को चरम पर पहुँचाया, तो मालती के शरीर में एक जोरदार कंपन हुआ और उसकी खाई से ढेर सारा रस छूटने लगा। ठीक उसी पल, राघव के खीरा ने भी अपना सारा गरम रस मालती की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, उनकी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन को एक असीम शांति मिल चुकी थी। मालती राघव की छाती पर अपना सिर रखकर लेटी रही, उसकी आँखों में तृप्ति की चमक थी। वह दोपहर अब ढल चुकी थी, लेकिन उन दोनों के बीच जो भावनात्मक और शारीरिक मिलन हुआ था, उसकी यादें हमेशा के लिए उस पुरानी हवेली की दीवारों में कैद हो गईं।