रेशमी अंधेरा और पुरानी हवेली की खामोशी

विक्रम उस पुरानी हवेली की लाइब्रेरी में रखी मेज की पॉलिश ठीक कर रहा था, तभी सोनल वहां आई, उसके रेशमी गाउन की सरसराहट सन्नाटे को चीर रही थी। सोनल की देह किसी तराशे हुए संगमरमर की तरह थी, उसके भारी तरबूज गाउन के पतले कपड़े के नीचे अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहे थे और उनकी गोलाई देखकर विक्रम के भीतर एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी। सोनल की आंखों में एक प्यास थी जो शायद बरसों से दबी हुई थी, वह धीरे से विक्रम के पास आकर खड़ी हो गई जिससे उसके बदन की भीनी-भीनी खुशबू विक्रम की नाक में समाने लगी और उसके रोम-रोम में सिहरन दौड़ गई। विक्रम ने देखा कि सोनल के तरबूज के ऊपर उभरे हुए दोनों मटर साफ झलक रहे थे, जो शायद इस ठंडी हवा या भीतर की उत्तेजना के कारण सख्त हो गए थे।



उन दोनों के बीच शब्दों से ज्यादा खामोशी बोल रही थी, एक ऐसी खामोशी जिसमें सदियों की प्यास और एक-दूसरे को पा लेने की तीव्र इच्छा घुली हुई थी। विक्रम ने हिम्मत जुटाकर सोनल के गालों को छुआ, उसकी उंगलियां रेशम सी त्वचा पर फिसलती हुई नीचे की ओर बढ़ीं, जिससे सोनल की सांसें तेज चलने लगीं और उसके भारी तरबूज ऊपर-नीचे होने लगे। विक्रम ने अपना चेहरा सोनल के करीब लाया और उसकी गर्दन पर अपनी गर्म सांसें छोड़ीं, सोनल की सिसकारी कमरे की दीवारों से टकराकर वापस आई और उसने कसकर विक्रम के कंधों को पकड़ लिया जैसे वह खुद को गिरने से बचा रही हो। आकर्षण अब एक ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार था, जहां लाज और शर्म की दीवारें धीरे-धीरे ढहती जा रही थीं और केवल आदिम इच्छाएं शेष रह गई थीं।
झिझक अब पूरी तरह मिट चुकी थी, विक्रम के हाथ अब सोनल के गाउन के भीतर पहुंच चुके थे और वह उन मखमली तरबूजों को अपनी हथेलियों में भरकर मसलने लगा था, जिससे सोनल के मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं। वह सोनल के दोनों मटरों को अपनी उंगलियों के बीच लेकर धीरे से दबाने लगा, जिससे सोनल का पूरा बदन धनुष की तरह तन गया और उसकी आंखों में नशा छा गया। सोनल ने भी विक्रम के बेल्ट को खोल दिया और उसके भीतर छिपे हुए विशाल और सख्त खीरा को बाहर निकाला, जिसे देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि वह खीरा अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ उसकी हथेली में समा नहीं पा रहा था। सोनल ने उस खीरा को अपने कोमल हाथों में पकड़कर ऊपर-नीचे सहलाया, जिससे विक्रम के मुंह से एक आह निकली और उसका पूरा शरीर कांप उठा।
विक्रम ने सोनल को उस बड़ी मेज पर लेटा दिया और उसकी टांगों को फैलाकर उसके बीच स्थित उस गहरी और नम खाई को निहारने लगा, जो घने और काले बालों के बीच किसी बेशकीमती खजाने की तरह छिपी हुई थी। उसने झुककर अपनी जुबान से उस खाई को चखना शुरू किया, उसकी जीभ खाई के हर कोने को गहराई से सहला रही थी जिससे सोनल पागलों की तरह अपना पिछवाड़ा मेज पर पटकने लगी। खाई से निकलने वाला प्राकृतिक रस अब विक्रम के मुंह के चारों ओर लग चुका था, लेकिन वह रुकने को तैयार नहीं था, उसने अपनी उंगली से खाई के भीतर खुदाई शुरू कर दी जिससे सोनल की कराहें और गहरी होती चली गईं। सोनल ने विक्रम का सिर पकड़ा और उसे अपनी खाई में और गहराई से धकेल दिया, वह रस से पूरी तरह तरबतर हो चुकी थी और उसका शरीर रह-रह कर झटके ले रहा था।
अब बर्दाश्त की हदें पार हो चुकी थीं, विक्रम ने अपने विशाल खीरा को सोनल की खाई के मुहाने पर रखा और एक जोरदार झटके के साथ उसे भीतर उतारने की कोशिश की, लेकिन खाई इतनी तंग थी कि आधा खीरा ही भीतर जा सका। सोनल के मुंह से एक लंबी चीख निकली लेकिन वह दर्द से ज्यादा आनंद की थी, उसने अपनी टांगें विक्रम की कमर पर कस लीं और उसे पूरी गहराई तक उतरने का इशारा किया। विक्रम ने दोबारा जोर लगाया और इस बार पूरा खीरा उस तंग और गर्म खाई की गहराइयों को नापते हुए भीतर समा गया, जिससे दोनों के शरीरों के बीच का फासला पूरी तरह खत्म हो गया। वे दोनों एक लय में हिलने लगे, कमरे में मांस से मांस के टकराने की आवाजें और सोनल की सिसकारियां गूंजने लगीं, मानो कोई पुरानी धुन बज रही हो।
विक्रम अब सामने से खुदाई कर रहा था, उसका हर धक्का सोनल के भीतर तक हलचल मचा रहा था, वह अपने हाथों से सोनल के तरबूजों को बुरी तरह मसल रहा था और उसके मटरों को अपने दांतों से हल्का सा काट रहा था। सोनल की आंखें बंद थीं और वह बस उस अद्भुत अहसास में डूबी हुई थी, वह विक्रम के पिछवाड़े को अपने हाथों से सहला रही थी और उसे और तेज खुदाई करने के लिए उकसा रही थी। खुदाई इतनी जबरदस्त थी कि विक्रम के शरीर का पसीना सोनल के बदन पर गिर रहा था, जिससे उनकी त्वचा आपस में चिपक रही थी और घर्षण और भी बढ़ गया था। "विक्रम, मुझे और गहराई से खोदो, आज मुझे पूरी तरह अपना बना लो," सोनल ने हांफते हुए कहा, जिसके जवाब में विक्रम ने अपनी गति और भी बढ़ा दी।
कुछ देर बाद विक्रम ने सोनल को मेज पर ही उल्टा घुमा दिया और उसके उभरे हुए पिछवाड़े को ऊपर उठाकर पीछे से खुदाई शुरू की, यह स्थिति इतनी कामुक थी कि विक्रम का खीरा और भी ज्यादा सख्त हो गया। सोनल घुटनों के बल थी और उसका चेहरा मेज से सटा हुआ था, जबकि विक्रम पीछे से पूरी ताकत के साथ अपनी मार दे रहा था, हर धक्के के साथ सोनल के तरबूज हवा में झूल रहे थे। यह पिछवाड़े से खुदाई का मंजर बहुत ही उत्तेजक था, सोनल की खाई अब पूरी तरह से लाल हो चुकी थी और उससे रस की धारा बह रही थी जो विक्रम के खीरा को और भी चिकना बना रही थी। विक्रम अब बेकाबू हो चुका था, उसने सोनल के बालों को पकड़ा और उसे खींचते हुए एक आखिरी और सबसे गहरा धक्का दिया, जिससे सोनल की रूह तक कांप गई।
अंततः वह क्षण आ ही गया जब दोनों की बर्दाश्त की सीमा समाप्त हो गई, विक्रम का पूरा शरीर अकड़ गया और उसके खीरा से गर्म रस की फुहारें सोनल की खाई की गहराई में छूटने लगीं। ठीक उसी समय सोनल का भी रस निकलना शुरू हुआ, उसका शरीर कई बार झटके खाकर शांत होने लगा, वे दोनों एक-दूसरे पर ढह गए, उनके शरीर पसीने से नहाए हुए थे और सांसें अभी भी तेज चल रही थीं। कमरे में छाई खामोशी अब एक सुकून भरी संतुष्टि में बदल चुकी थी, सोनल विक्रम की बाहों में लिपटी हुई थी और उसकी आंखों में एक नई चमक थी। इस खुदाई ने उनके बीच के सारे फासलों को मिटा दिया था, वे दोनों कुछ देर तक उसी हालत में लेटे रहे, महसूस करते हुए कि कैसे दो रूहें जिस्मों के जरिए एक हो गई थीं।