कविता मौसी की यादगार खुदाई

 


कविता मौसी की यादगार खुदाई

कविता मौसी के घर गए मुझे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन उनकी देह की मादकता ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी थी। मौसी की उम्र चालीस के करीब थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी कसी हुई जवान लड़की जैसी थी। जब वो सूती साड़ी पहनकर रसोई में खाना बनाती थीं, तो उनकी पीठ का खुला हिस्सा और साड़ी के नीचे दबे उनके गोल तरबूज साफ झलकते थे। मैंने अक्सर उन्हें चोरी-छिपे देखा था, उनकी चाल में एक अजीब सी लचक थी जो मेरे मन में हलचल पैदा कर देती थी। उनके शरीर से उठने वाली चमेली की खुशबू और उनके पसीने की महक मेरे दिमाग पर एक नशा सा चढ़ाने लगी थी, जिससे मेरा मन भटकने लगा था।

मौसी के शरीर का हर हिस्सा जैसे किसी शिल्पी ने तराशा हो। उनकी साड़ी के पल्लू से जब उनके विशाल तरबूजों की गोलाई झलकती, तो मेरे मन में उन्हें सहलाने की तीव्र इच्छा जागती। उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे उभार साड़ी के कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराते थे। मौसी का पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और सुडौल था कि जब वो चलती थीं, तो वो किसी संगीत की ताल पर थिरकता हुआ प्रतीत होता था। उनकी गहरी खाई के बारे में सोचकर ही मेरा शरीर उत्तेजना से भर जाता था और मेरा खीरा अपनी सीमाएं लांघने को बेताब हो उठता था।

उस रात उमस बहुत ज्यादा थी और अचानक बिजली कट गई। मौसी अपने कमरे में अकेली थीं और मैं बरामदे में लेटा उन्हें ही याद कर रहा था। तभी मुझे उनकी कराहने की आवाज सुनाई दी, शायद उन्हें गर्मी से घबराहट हो रही थी। मैं दबे पांव उनके कमरे में गया, जहाँ वो बिस्तर पर लेटी हाथ वाले पंखे से खुद को हवा कर रही थीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ गिरा हुआ था और उनके दोनों तरबूज चाँदनी की हल्की रोशनी में चमक रहे थे। मैंने धीरे से उनके पैर सहलाने शुरू किए, मौसी पहले तो ठिठकीं, लेकिन फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी।

मेरा हाथ धीरे-धीरे उनके रेशमी पैरों से ऊपर बढ़ते हुए उनके घुटनों तक पहुँचा। मौसी की सांसें अब तेज हो चली थीं और उनके शरीर में एक अजीब सी कंपकंपी महसूस हो रही थी। मैंने साहस जुटाकर अपना हाथ उनकी कमर के लचीले हिस्से पर रखा और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा। मौसी ने धीमी आवाज में कहा, 'आर्यन, यह तुम क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा?' मैंने उनके कान के पास जाकर फुसफुसाया, 'मौसी, आपकी सुंदरता ने मुझे पागल कर दिया है, बस आज रात मुझे इस मधुर फल का स्वाद चखने दीजिए।' उनकी झिझक अब समर्पण में बदल रही थी।

मैंने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोले, जिससे उनके दोनों भारी तरबूज आजाद होकर बाहर छलक आए। उन पर स्थित गुलाबी मटर अब ठंडक और उत्तेजना से सख्त हो चुके थे। मैंने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, तो मौसी के मुंह से एक सिसकारी निकली और उन्होंने मेरे सिर को अपने सीने से लगा लिया। उनके तरबूजों की नरमी और खुशबू ने मुझे मदहोश कर दिया था। मैं बारी-बारी से दोनों मटरों को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा, जिससे मौसी का शरीर धनुष की तरह ऊपर को उठने लगा और उनकी उंगलियां मेरे बालों में फंस गईं।

अब मेरा हाथ उनकी साड़ी के अंदर गया और उनकी रेशमी खाई को तलाशने लगा। वहां के घने बाल पसीने से भीगे हुए थे और खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। मैंने अपनी उंगली से खाई को खोदना शुरू किया, तो मौसी की आहें और भी गहरी हो गईं। वो तड़पते हुए बोलीं, 'आर्यन, बहुत हुआ, अब और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे अपने खीरे का स्वाद चखाओ।' मैंने तुरंत अपना खीरा बाहर निकाला, जो उत्तेजना से पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मौसी ने उसे अपने हाथों में लिया और उसे चूमने लगीं, फिर धीरे-धीरे पूरा खीरा मुंह में लेना शुरू किया।

जब मौसी मेरा खीरा चूस रही थीं, तो मुझे जन्नत का अहसास हो रहा था। कुछ देर बाद मैंने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। अब बारी थी सामने से खुदाई करने की। मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी गीली खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में गहरा धक्का दिया। मौसी की चीख निकल गई, 'उई माँ! कितना बड़ा है तुम्हारा खीरा, इसने तो मेरी पूरी खाई भर दी।' मैंने धीरे-धीरे अपनी कमर चलानी शुरू की, हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को छू रहा था।

कमरे में सिर्फ धक्कों की आवाज और मौसी की आहें गूँज रही थीं। मैंने उन्हें घुमाकर बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया, अब मैं उनके पिछवाड़े से खुदाई करने के लिए तैयार था। उनके गोल और भारी पिछवाड़े के बीच से जब मेरा खीरा अंदर और बाहर हो रहा था, तो मौसी पागलों की तरह अपना सिर बिस्तर पर पटक रही थीं। मैंने उनके दोनों तरबूजों को पीछे से कसकर पकड़ लिया और अपनी गति और तेज कर दी। हम दोनों पसीने से लथपथ थे और खुदाई अपने चरम पर थी। मौसी चिल्ला रही थीं, 'और तेज खोदो आर्यन, मुझे खत्म कर दो!'

अंत में, हम दोनों का शरीर चरम सीमा पर पहुँच गया। मैंने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया और मेरा सारा गरम रस उनकी खाई के भीतर छूट गया। ठीक उसी समय मौसी का भी रस निकलना शुरू हुआ और वो निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। हम दोनों काफी देर तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, हमारी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन को एक असीम शांति मिल चुकी थी। उस रात की खुदाई ने हमारे बीच के रिश्ते को एक नई और गहरी परिभाषा दे दी थी, जिसे हम दोनों कभी नहीं भूल सकते थे। मौसी की आँखों में अब शर्म नहीं, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि और प्यार चमक रहा था।