रसीली संजना मौसी की खुदाई
गर्मी की उन लंबी और बोझिल कर देने वाली छुट्टियों में मैं अपनी संजना मौसी के घर गया हुआ था, जो शहर के एक शांत और पॉश इलाके में रहती थीं। मौसी वहाँ अक्सर अकेली ही रहती थीं क्योंकि उनके पति अपने कारोबार के सिलसिले में महीनों तक शहर से बाहर विदेश में रहा करते थे। संजना मौसी की उम्र करीब पैंतीस साल के आसपास रही होगी, लेकिन उनकी काया और उनका प्राकृतिक निखार किसी बीस साल की नवयौवना लड़की जैसा कसी हुई और बेहद आकर्षक थी। जब मैंने उन्हें स्टेशन पर देखा, तभी से मेरी नजरें उनके भरे हुए बदन पर ठहर गई थीं और मेरा मन एक अजीब सी हलचल से अशांत हो गया था।
मौसी का शरीर एकदम सोंधेपन और मादकता से भरा हुआ था, उनके तरबूज इतने बड़े, गोल और पुष्ट थे कि उनकी पतली रेशमी साड़ी का पल्लू उन्हें पूरी तरह ढँकने में हमेशा नाकाम ही रहता था। जब भी वो घर के काम करते हुए इधर-उधर चलती थीं, तो उनके वो भारी तरबूज आपस में टकराते थे और एक लयबद्ध तरीके से ऊपर-नीचे होते थे, जिसे देखकर मेरे किशोर मन के भीतर का सोया हुआ कामुक शेर जाग उठता था। उनकी देह की बनावट ऐसी थी कि कोई भी पुरुष उन्हें एक बार देख ले तो बस अपनी सुध-बुध खोकर उन्हें निहारता ही रह जाए। उनकी कमर जितनी पतली और लचीली थी, उनका पिछवाड़ा उतना ही भारी, मांसल और गोल था कि साड़ी का कपड़ा वहाँ हमेशा तना हुआ नजर आता था।
हमारे बीच एक अजीब सी खामोशी और खिंचाव पनपने लगा था जो शब्दों से परे था। मौसी अक्सर मुझसे बातें करते हुए अपना पल्लू ठीक करतीं, लेकिन उनकी आँखों में एक खास किस्म की चमक होती थी जो मुझे कुछ और ही गहरा इशारा करती थी। वो अच्छी तरह जानती थीं कि मैं उनके उन उभरे हुए तरबूजों और उनके भारी पिछवाड़े को चोरी-छुपे देख रहा हूँ, पर उन्होंने कभी मुझे टोका नहीं। बल्कि कभी-कभी वो जानबूझकर रसोई में मेरे सामने झुक जातीं जिससे उनके तरबूज और भी साफ नजर आने लगते थे और उनके बीच की गहरी घाटी मुझे मदहोश करने लगती थी।
उस तपती दोपहर में जब बाहर सन्नाटा था और घर के बाकी लोग सो रहे थे, मैं और मौसी अकेले ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे थे। कूलर की ठंडी हवा चल रही थी लेकिन हमारे बीच की शारीरिक गर्मी लगातार बढ़ती जा रही थी। मैंने देखा कि मौसी की साड़ी जाँघों के पास से थोड़ी खिसक गई थी और वहाँ के बारीक बाल हलके-हलके नजर आ रहे थे। मेरा खीरा पैंट के अंदर पूरी तरह से छटपटाने लगा था और उसे अपनी कैद से बाहर निकलने की तीव्र इच्छा हो रही थी। मैंने हिम्मत जुटाई और धीरे से खिसक कर उनके बिल्कुल करीब जाकर बैठ गया, उनके शरीर से आती सोंधी खुशबू ने मेरा दिमाग सुन्न कर दिया था।
मेरे मन के भीतर एक भीषण द्वंद्व चल रहा था, जहाँ एक तरफ रिश्तों की पवित्र दीवार थी और दूसरी तरफ संजना मौसी की वो मदहोश कर देने वाली देह का बुलावा। मैं डर रहा था कि कहीं वो मेरी इस हिमाकत पर नाराज न हो जाएँ, लेकिन जब मैंने उनकी तरफ देखा तो उनके चेहरे पर एक हल्की और आमंत्रित करने वाली मुस्कान थी। मैंने कांपते हाथों से अपना हाथ उनकी मखमली जाँघ पर रखा। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी गर्म आह भरी। उस एक आह ने मुझे जैसे मौन स्वीकृति दे दी थी कि अब पीछे मुड़ने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था।
मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ ऊपर की ओर सरकाया और उनके रेशमी तरबूजों की ओर बढ़ाया। जैसे ही मेरी हथेली उनके नरम और गर्म तरबूजों से टकराई, मौसी के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली सिसकारी निकली। मैंने साड़ी के ऊपर से ही उनके तरबूजों को अपनी गिरफ्त में लिया और उन्हें हल्के-हल्के दबाना शुरू किया, वो इतने कोमल थे जैसे मलाई से बने हों। फिर मैंने अपनी उँगलियों से उनके तरबूजों के शीर्ष पर मौजूद मटरों को सहलाना शुरू किया। वो मटर उत्तेजना के मारे एकदम सख्त और दानेदार हो गए थे, जो इस बात का स्पष्ट सबूत थे कि मौसी भी उतनी ही बेताब थीं जितना कि मैं।
अब सब्र का बाँध पूरी तरह से टूट चुका था और मर्यादा की सारी सीमाएं धुंधली पड़ गई थीं। मैंने उन्हें अपनी बाहों में कसकर भींच लिया और उनके रसीले होंठों का स्वाद लेना शुरू किया। हमारी गरम साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं और उत्तेजना का स्तर बढ़ता जा रहा था। मैंने धीरे-धीरे उनकी साड़ी के बंधन खोल दिए और कुछ ही पलों में वो मेरे सामने अपने पूरे प्राकृतिक निखार में निर्वस्त्र थीं। उनके शरीर के हर ढलान और हर उभार को मैं अपनी भूखी नजरों से पी जाना चाहता था। मैंने नीचे झुककर उनकी जाँघों के बीच की उस गहरी और गीली खाई की ओर अपनी नजरें दौड़ाईं जहाँ से प्रेम का रस रिस रहा था।
मैंने अपना सख्त खीरा बाहर निकाला जो अब पूरी तरह से तना हुआ और किसी फौलाद की तरह मजबूत हो चुका था। मौसी ने मेरे खीरे को अपने नाजुक हाथों में लिया और उसकी लंबाई और मोटाई को महसूस करते हुए उसे सहलाने लगीं। फिर उन्होंने अपनी आँखें मेरी आँखों में डालीं और अपना मुँह खोलकर मेरे खीरे को अंदर ले लिया। मौसी बड़े ही सलीके से मेरे खीरे को चूस रही थीं, उनकी जीभ का स्पर्श इतना अद्भुत था कि मेरा पूरा शरीर बिजली के झटके की तरह काँप उठा। मैं उनके रेशमी बालों को सहलाते हुए उस चरम सुख का आनंद ले रहा था जो उन्होंने मुझे अपने मुँह से दिया था।
इसके बाद मैंने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और खुद सामने से खुदाई करने की मुद्रा में आ गया। जैसे ही मेरे खीरे का सिरा उनकी उस तंग और रसीली खाई के मुहाने पर पहुँचा, हम दोनों की धड़कनें जैसे एक पल के लिए थम सी गईं। मैंने अपनी कमर को एक हल्का सा धक्का दिया और मेरा पूरा खीरा उनकी गर्म, गीली और बेहद तंग खाई के अंदर समाता चला गया। मौसी ने दर्द और आनंद के मिश्रण से एक लंबी कराह ली और अपनी पीठ को धनुष की तरह ऊपर उठा लिया। वो खाई इतनी ज्यादा संकरी थी कि मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो मेरे पूरे खीरे को चारों तरफ से जकड़ रही हो।
मैं अब धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाने लगा और गहरे धक्के देने लगा। कमरे के सन्नाटे में अब सिर्फ हमारे शरीरों के आपस में टकराने की आवाजें और मौसी की मदहोश कर देने वाली आहें और सिसकारियां गूँज रही थीं। मैं अपनी पूरी पुरुषार्थ शक्ति से उन्हें भीतर तक खोद रहा था। मौसी भी नीचे से अपनी कमर को लयबद्ध तरीके से ऊपर-नीचे उछालकर मेरा पूरा साथ दे रही थीं। हम दोनों पसीने में लथपथ हो चुके थे, लेकिन खुदाई का वो आनंद अपने चरम की ओर बढ़ रहा था। मैंने उनकी स्थिति बदली और उन्हें हाथ-पैर के बल खड़ा करके पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जहाँ से मुझे उनके हिलते हुए तरबूज साफ नजर आ रहे थे।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपने अंतिम और सबसे तीव्र पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। हम दोनों की साँसें उखड़ रही थीं और शरीर चरम सुख के लिए तड़प रहे थे। मौसी ने पीछे मुड़कर मुझे देखा और अपनी उत्तेजित आवाज में चिल्लाते हुए कहा, "आर्यन, और तेज... और गहराई से खोदो मुझे, आज कोई कसर मत छोड़ना!" मैंने उनकी बात सुनकर अपनी पूरी ताकत झोंक दी और कुछ ही क्षणों के भीतर मुझे महसूस हुआ कि मेरा गर्म रस बस निकलने ही वाला है। ठीक उसी पल मौसी का भी रस पूरी तरह से छूट गया और वो बिस्तर पर निढाल हो गईं। मैंने अपना सारा गरम रस उनकी खाई की सबसे गहरी गहराई में उड़ेल दिया।
खुदाई के उस भीषण और आनंदमयी सत्र के बाद हम दोनों पसीने से तर-बतर बिस्तर पर एक-दूसरे की बाहों में सिमटे हुए थे। मौसी की आँखें अब भी बंद थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी असीम संतुष्टि और शांति का भाव था जो शायद उन्हें बरसों बाद नसीब हुआ था। मेरी हालत ऐसी थी कि शरीर का हर अंग ढीला पड़ चुका था और मैं हिलने की स्थिति में भी नहीं था। वो दोपहर हमारे जीवन की सबसे यादगार दोपहर बन गई थी, जहाँ हमने समाज और रिश्तों की सारी वर्जनाओं को पीछे छोड़कर अपनी अंतरात्मा की पुकार सुनी थी। हम बस एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस कर रहे थे और उस मीठी थकान का आनंद ले रहे थे।