पड़ोसी रीमा भाभी की गहरी खुदाई

 


शहर की उस शांत और तंग गली में रीमा भाभी का घर मेरे किराए के कमरे के ठीक सामने वाली मंजिल पर था। रीमा भाभी की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उनके शरीर की बनावट और उनके यौवन का उभार किसी कयामत से कम नहीं था। जब भी वह शाम को अपनी बालकनी में आती थीं, तो उनके भारी भरकम तरबूज उनकी कुर्ती के पतले कपड़े के नीचे से झांकते हुए साफ नजर आते थे, जो किसी भी मर्द के मन में तूफान पैदा कर सकते थे। उनके गोल और मांसल पिछवाड़े को देख कर मेरी सांसें अक्सर थम जाया करती थीं। रीमा भाभी का रंग एकदम साफ और दूधिया था और जब वह मटकते हुए चलती थीं, तो उनके शरीर का हर हिस्सा एक विशेष लय में डोलता था, जिसे देख कर मेरा जवान मन कामुक इच्छाओं से भर जाता था।

हमारी बातचीत अक्सर शाम के वक्त होती थी जब वह अपनी छत पर कपड़े सुखाने आती थीं या फिर बालकनी में खड़ी होकर हवा का आनंद लेती थीं। उनकी गहरी भूरी आँखों में एक अजीब सी गहराई और तन्हाई छिपी थी जो मुझे चुंबक की तरह अपनी ओर खींचती थी। धीरे-धीरे हमारी यह छोटी-छोटी बातें गहरी दोस्ती में बदलने लगीं और हम घंटों एक-दूसरे की जिंदगी के बारे में चर्चा करने लगे। वह अक्सर दबी जुबान में अपने पति के काम के सिलसिले में महीनों बाहर रहने की शिकायत करती थीं, जिससे उनकी आंखों में छिपी प्यास और तड़प साफ झलकने लगती थी। उनकी मीठी आवाज में एक ऐसी कशिश थी कि जब भी वह हंसती थीं, मुझे ऐसा लगता था जैसे कोई कोमल रेशमी धागा मेरे दिल के तारों को सहला रहा हो।

एक गर्म और उमस भरी रात को अचानक पूरे इलाके की बिजली चली गई और रीमा भाभी ने घबराकर मुझे आवाज दी कि उनके घर का शायद कोई मुख्य फ्यूज उड़ गया है। मैं अपनी टॉर्च लेकर उनके घर पहुँचा तो देखा कि वह एक बहुत ही पतली और पारदर्शी रेशमी नाइटी पहने हुए थीं, जिसके अंदर से उनके सुडौल तरबूज और उन पर सजे नन्हे मटर के दाने साफ झलक रहे थे। गर्मी की वजह से उनके पूरे जिस्म पर पसीने की नन्हीं बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं और उनकी नाइटी उनके जिस्म से चिपक गई थी। जब मैं फ्यूज ठीक करने के बहाने उनके बिलकुल करीब खड़ा हुआ, तो उनके शरीर से उठने वाली मादक खुशबू ने मेरे अंदर की तमाम दबी हुई इच्छाओं को एक झटके में जगा दिया। मेरा सख्त खीरा अपनी जगह पर जबरदस्त तनाव महसूस करने लगा और वह मेरी पैंट के अंदर बाहर आने के लिए छटपटाने लगा।

मैंने धीरे से पीछे मुड़कर उनकी आँखों में झांका, जहाँ कोई डर नहीं था, बल्कि एक बरसों पुरानी प्यास और समर्पण का भाव था। मैंने अपनी सारी झिझक त्याग दी और अपना कांपता हुआ हाथ उनकी पतली और कोमल कमर पर रखा। उनकी त्वचा मखमल जैसी नरम और रेशमी थी। उन्होंने मेरा स्पर्श महसूस करते ही कोई विरोध नहीं किया, बल्कि अपनी नशीली आँखें धीरे से मूँद लीं और एक लंबी आह भरी। मैंने उन्हें धीरे-धीरे अपनी ओर खींचा और अपने होंठों को उनके भीगे हुए होंठों पर रख दिया। हमारे होंठों का वह मिलन इतना गहरा था कि उनके मुँह से एक हल्की सी सिसकी निकल गई। मेरे हाथ अब उनके भारी तरबूजों की गहराई को नापने लगे थे और मैंने उन पर उगे मटरों को अपनी उंगलियों से सहलाना शुरू किया, जिससे वह कामुकता में कांपने लगीं।

भाभी ने उत्तेजना में आकर धीरे से मेरी पैंट की चैन खोली और मेरा गरम और पूरी तरह से तना हुआ खीरा बाहर निकाल लिया। उन्होंने उसे अपने कोमल हाथों में थाम लिया और उसकी लंबाई और मोटाई को अपनी हथेलियों से सहलाकर महसूस किया। फिर वह धीरे से अपने घुटनों के बल नीचे बैठीं और उस तपते हुए खीरे को अपने मुँह के अंदर ले लिया। उनकी जीभ की लपटों जैसी गर्मी ने मुझे पागल कर दिया और मैं उनके सिर के रेशमी बालों को पकड़कर उन्हें और भी गहराई तक ले जाने लगा। कुछ ही पलों बाद मैंने उन्हें उठाकर बिस्तर पर लिटाया और उनकी नाइटी को धीरे से उनके जिस्म से अलग कर दिया। उनके शरीर पर मौजूद सुनहरे बाल उनकी गहरी और गीली खाई के चारों तरफ बिखरे हुए थे जो देखने में बहुत ही आकर्षक और कामुक लग रहे थे।

मैंने अपनी उंगलियों से उनकी गहरी और रसीली खाई को उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे वह मजे और दर्द के एक अनोखे अहसास से तड़प उठीं। उनकी खाई अब तक पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और उससे प्यार का रस धीरे-धीरे टपक रहा था। मैंने उन्हें पिछवाड़े से खोदने के लिए बिस्तर पर घोड़ी बना दिया। उनका भारी और मांसल पिछवाड़ा हवा में उठा हुआ किसी पहाड़ जैसा लग रहा था। मैंने अपने तपे हुए खीरे को उनकी खाई के गीले मुहाने पर सटाया और एक ही दमदार धक्के के साथ पूरा अंदर उतार दिया। उन्होंने दर्द भरी एक चीख मारी लेकिन अगले ही पल वह मजे की लहरों में बहने लगीं। मैं लगातार उन्हें पिछवाड़े से खोद रहा था और हर धक्के के साथ उनके तरबूज नीचे लटक कर पागलों की तरह झूल रहे थे।

"ओह रोहित, और जोर से खोदो... आज मुझे पूरा भर दो... मैं बरसों से इस दिन का इंतजार कर रही थी," वह हाफते हुए टूटी-फूटी आवाज में कह रही थीं। उनकी इन बातों ने मेरी कामुकता को चरम पर पहुँचा दिया और मैंने खुदाई की रफ्तार और भी तेज कर दी। कमरे का तापमान बढ़ चुका था और हमारे शरीरों से निकलने वाला पसीना अब एक-दूसरे में मिल रहा था। मैंने उन्हें फिर से सीधा लिटाया और सामने से खोदना शुरू किया, साथ ही उनके गुलाबी मटरों को अपने दांतों से हल्का सा दबाया। वह मजे की उस ऊँचाई पर थीं जहाँ इंसान सब कुछ भूल जाता है। मेरा खीरा उनकी रसीली खाई की सबसे निचली गहराई को बार-बार छू रहा था और पूरे कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की 'चप-चप' और उनकी लंबी सिसकियों की आवाज गूंज रही थी।

अंततः, कुछ ही मिनटों की उस भीषण खुदाई के बाद, मेरा और उनका दोनों का शरीर एक साथ कांपने लगा और हमारा रस एक साथ छूटने लगा। मैंने अपना सारा गरम और सफेद रस उनकी खाई की अंधी गहराई में उड़े़ल दिया। हम दोनों बुरी तरह थक चुके थे और पसीने से लथपथ होकर एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए। रीमा भाभी के चेहरे पर बरसों बाद एक गजब का सुकून और तृप्ति का भाव नजर आ रहा था। उनकी बिखरी हुई जुल्फें और अभी भी तेज चलती सांसें इस बात की गवाह थीं कि आज की यह खुदाई कितनी यादगार और जबरदस्त रही। हमने घंटों तक एक-दूसरे को बाहों में जकड़े रखा और उस रूहानी अहसास को महसूस किया। वह रात हमारे रिश्तों के लिए एक नई शुरुआत थी, और हम दोनों जानते थे कि यह रसीली खुदाई अब थमने वाली नहीं है।