मीरा की उम्र कोई तीस के करीब रही होगी, लेकिन उसका शरीर किसी पकी हुई सुराही की तरह गढ़ा हुआ था जिसे देखकर किसी भी पुरुष का मन डोल जाए। उसकी नीली शिफॉन की साड़ी उसके अंगों से इस तरह चिपकी थी जैसे पानी बदन से लिपट जाता है, और जब वह चलती थी तो उसके भारी तरबूज साड़ी के नीचे इस तरह हिलते थे कि अद्वैत की नजरें वहां से हटती ही नहीं थीं। उसका पिछवाड़ा इतना मांसल और सुडौल था कि हर कदम पर वह एक अलग ही लय पैदा कर रहा था, जिसे देख अद्वैत के मन में हलचल मचने लगी थी। ट्रेन की ऊपरी बर्थ पर लेटे हुए अद्वैत ने जब नीचे बैठी मीरा को देखा, तो उसे लगा कि यह सफ़र सिर्फ़ गंतव्य तक पहुँचने का नहीं, बल्कि किसी और ही गहराई को छूने का होने वाला है।
कैबिन में सन्नाटा था और सिर्फ़ रेल की पटरियों की आवाज़ गूँज रही थी, जिसने माहौल में एक अजीब सी उत्तेजना भर दी थी। मीरा ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला किया, जिससे उसके गोरे बदन की झलक दिखने लगी और उसके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ़ नज़र आने लगी। अद्वैत नीचे उतरा और उसके सामने वाली सीट पर बैठ गया, उनकी नज़रें मिलीं और उन नज़रों में एक अनकहा इकरार था, एक ऐसी प्यास जो शायद दोनों के अंदर दबी हुई थी। बातों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन आवाज़ों में एक भारीपन था और मीरा की आँखों में एक ऐसी चमक थी जो साफ़ कह रही थी कि वह भी इस अकेलेपन में किसी का स्पर्श चाहती है।
रात के दो बज रहे थे और डिब्बे की लाइटें मद्धम हो चुकी थीं, तभी अद्वैत ने धीरे से अपना हाथ मीरा के घुटने पर रखा। मीरा की साँसें अचानक तेज़ हो गईं, लेकिन उसने अपना पैर पीछे नहीं खींचा, बल्कि उसकी आँखों में देखते हुए एक गहरी आह भरी। अद्वैत का हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगा, साड़ी के रेशमी कपड़े को महसूस करते हुए वह उसकी जाँघों के पास पहुँचा, जहाँ की गर्मी उसे बेचैन कर रही थी। मीरा ने अपनी आँखें मूँद लीं और उसका सिर पीछे की ओर झुक गया, जिससे उसके गले की नसें साफ़ दिखने लगीं और उसके तरबूज ऊपर-नीचे होने लगे जैसे कोई तूफ़ान आने वाला हो।
अद्वैत ने अपनी जगह बदली और मीरा के बिल्कुल पास बैठ गया, उसकी साँसों की गर्मी अब मीरा के कानों तक पहुँच रही थी। उसने मीरा के ब्लाउज के हुक धीरे से खोले, जिससे उसके गोल और बड़े तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गए, उनकी गोलाई और सफेदी देख अद्वैत का खीरा कपड़ों के अंदर ही फन उठाने लगा। उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर ठंड और उत्तेजना के कारण पत्थर की तरह सख्त हो गए थे। अद्वैत ने अपनी जुबान से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, तो मीरा के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली सिसकी निकली, "अद्वैत... उह्ह... मत रुको।" उसका पूरा शरीर काँप रहा था और वह अद्वैत के बालों में अपनी उंगलियाँ फँसा चुकी थी।
मीरा ने अब और सब्र करना छोड़ दिया और अद्वैत की पैंट की ज़िप नीचे की, जहाँ से उसका विशाल और गर्म खीरा झटके से बाहर निकल आया। खीरे की लंबाई और मोटाई देख मीरा की आँखें फटी रह गईं, उसने उसे अपने कोमल हाथों में पकड़ा और धीरे से सहलाने लगी। कुछ ही पलों में उसने उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया, उसकी जीभ की लज्जत और मुँह की गर्मी अद्वैत को पागल कर रही थी। अद्वैत ने उसे रोका और उसे सीट पर लेटा दिया, अब उसकी उंगलियाँ मीरा की गीली खाई के पास पहुँच चुकी थीं, जहाँ रेशमी बाल उसे गुदगुदा रहे थे।
अद्वैत ने अपनी उंगली से खाई में खुदाई शुरू की, तो मीरा का बदन धनुष की तरह मुड़ गया और वह अपनी कमर ऊपर की ओर उठाने लगी। खाई इतनी गीली हो चुकी थी कि उंगलियों के अंदर-बाहर होने से एक लसदार आवाज़ गूँजने लगी, जो उस छोटे से केबिन के सन्नाटे को तोड़ रही थी। मीरा की कराहें अब तेज़ हो गई थीं, वह बार-बार अद्वैत का नाम पुकार रही थी और अपने पिछवाड़े को हिलाकर उसे और गहराई तक जाने का इशारा कर रही थी। अद्वैत ने अपनी जुबान से उसकी खाई को चाटना शुरू किया, तो मीरा का पूरा शरीर थरथराने लगा, उसे लगा जैसे उसके शरीर के हर पोर से बिजली दौड़ रही हो।
अंततः अद्वैत ने अपने भारी खीरे को मीरा की गहरी खाई के मुहाने पर टिकाया और एक ज़ोरदार धक्के के साथ उसे अंदर उतार दिया। मीरा के मुँह से एक चीख निकलते-निकलते रह गई, उसने अद्वैत को अपनी बाहों में कसकर जकड़ लिया। अब सामने से खुदाई का सिलसिला शुरू हुआ, हर धक्के के साथ अद्वैत का खीरा मीरा की गहराई को नाप रहा था और उसके तरबूज अद्वैत की छाती से टकराकर पिचक रहे थे। रेल की लयबद्ध आवाज़ और उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ एक हो गई थी, दोनों पसीने से तर-बतर थे और कमरे में एक अजीब सी मदहोश कर देने वाली गंध फैल गई थी।
अद्वैत ने मीरा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, इस मुद्रा में अद्वैत का खीरा और भी गहराई तक पहुँच रहा था। मीरा ने अपने हाथ सीट के किनारों पर टिका दिए और अपने भारी पिछवाड़े को पीछे की ओर धकेलने लगी ताकि अद्वैत उसे और भी तीव्रता से खोद सके। हर धक्के के साथ मीरा के मुँह से "ओह्ह... हाँ... और तेज़... और गहरा..." जैसे शब्द निकल रहे थे। दोनों अब अपनी चरम सीमा के करीब थे, अद्वैत की रफ़्तार अब बेकाबू हो चुकी थी और मीरा का शरीर बार-बार झटके ले रहा था।
जैसे ही अद्वैत ने आखिरी कुछ ज़ोरदार धक्के लगाए, मीरा का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा। ठीक उसी क्षण अद्वैत ने भी अपना सारा गरम रस मीरा की गहराई में छोड़ दिया, दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए हाँफ रहे थे। रस छूटने के बाद की वह शांति और राहत उनके चेहरों पर साफ़ देखी जा सकती थी, मीरा की हालत ऐसी थी जैसे उसके शरीर की सारी हड्डियाँ पिघल गई हों। वह अद्वैत की छाती पर सिर रखकर लंबी साँसें ले रही थी, और अद्वैत उसके माथे को चूमते हुए उस यादगार रात की खुशबू को अपने अंदर समेट रहा था।