पड़ोसन मीरा जी के साथ दोपहर की प्यासी खुदाई


आर्यन अपने कमरे में बैठा अपनी किताबों में डूबा हुआ था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार खिड़की के उस पार वाली बालकनी पर जा रहा था जहाँ मीरा जी अपनी गीली साड़ी सुखा रही थीं। मीरा जी की उम्र लगभग पैंतीस साल थी, और उनके शरीर का हर हिस्सा जैसे जवानी की नई दहलीज पर खड़ा हो। उनकी रेशमी साड़ी जब हवा में लहराती, तो उनके गोल और रसीले तरबूज साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी का एहसास कराते थे। उनके उन बड़े तरबूजों के बीच की गहरी घाटी को देखकर आर्यन के मन में एक अजीब सी हलचल मच जाती थी, जिसे वह चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था।

मीरा जी के पति अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, जिस वजह से उनके चेहरे पर एक अजीब सी तन्हाई और प्यास झलकती थी। एक दोपहर जब आर्यन ने उनके घर का दरवाजा खटखटाया, तो मीरा जी ने हल्की पारभासी साड़ी में दरवाजा खोला। साड़ी इतनी पतली थी कि उनके पेट की कोमलता और उनके दोनों तरबूजों पर उभरे हुए मटर साफ़ नजर आ रहे थे। आर्यन की नजरें उनके शरीर पर जम सी गईं, जिसे देखकर मीरा जी के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई और उन्होंने उसे अंदर आने का इशारा किया।

ड्राइंग रूम में बैठते ही आर्यन को मीरा जी के शरीर से आने वाली धीमी खुशबू ने मदहोश कर दिया। दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन बातों में वह गर्माहट थी जो सिर्फ दो प्यासे शरीरों के बीच होती है। मीरा जी ने गहरी आह भरते हुए कहा, 'आर्यन, आज घर बहुत सूना लग रहा है, मन करता है कोई पास बैठकर दिल की धड़कनें सुने।' यह कहते हुए उन्होंने अपना हाथ आर्यन के हाथ पर रखा, जिससे आर्यन के शरीर में बिजली सी दौड़ गई और उसका खीरा अपनी जगह पर तनाव महसूस करने लगा।

आर्यन ने हिम्मत जुटाकर मीरा जी की कमर पर हाथ रखा और उन्हें अपनी ओर खींचा। मीरा जी ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उनकी सांसें तेज हो गईं। आर्यन ने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोले, जिससे उनके भारी और दूधिया तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गिरे। उन तरबूजों के ऊपर लगे छोटे-छोटे लाल मटर अब सख्त हो चुके थे। आर्यन ने झुककर एक मटर को अपने मुंह में लिया और उसे हल्के से दबाया, जिससे मीरा जी के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। उनकी आँखों में अब सिर्फ और सिर्फ प्यास थी।

धीरे-धीरे आर्यन ने उनकी साड़ी और साया भी उतार दिया, जिससे उनकी रेशमी और गहरी खाई पूरी तरह से उजागर हो गई। उस खाई के आसपास काले घने बाल एक जंगल की तरह फैले हुए थे जो उस जगह को और भी आकर्षक बना रहे थे। आर्यन ने अपनी उंगली से खाई को सहलाना शुरू किया, तो वह पूरी तरह से गीली महसूस हुई। मीरा जी ने तड़पते हुए आर्यन के कपड़े उतार दिए और उसके सख्त खीरे को अपने हाथ में पकड़ लिया। उन्होंने झुककर उस खीरे को अपने मुंह में लिया और उसे किसी लॉलीपॉप की तरह चूसने लगीं, जिससे आर्यन का रस निकलने को बेताब हो गया।

अब सब्र का बांध टूट चुका था। आर्यन ने मीरा जी को सोफे पर लिटाया और उनके दोनों पैरों को फैलाकर उनकी गहरी खाई के मुहाने पर अपना खीरा टिका दिया। एक झटके के साथ उसने अपने खीरे को उस गीली खाई के अंदर उतार दिया। मीरा जी की आँखें ऊपर चढ़ गईं और उन्होंने आर्यन की पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए। वह धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज कमरे में गूँज रही थी। खुदाई की गति अब तेज होती जा रही थी और कमरे में सिर्फ मांस के टकराने की आवाजें थीं।

मीरा जी ने कराहते हुए कहा, 'आर्यन, मुझे और जोर से खोदो, आज मेरी सारी प्यास बुझा दो।' आर्यन ने उन्हें उल्टा लेटा दिया और अब पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उनके उभरे हुए पिछवाड़े को थपकी मारते हुए वह पूरी ताकत से अपना खीरा उनकी खाई में उतार रहा था। मीरा जी का शरीर पसीने से तरबतर हो गया था और उनके बाल इधर-उधर बिखरे हुए थे। खुदाई इतनी गहरी और दमदार थी कि मीरा जी का पूरा शरीर कांपने लगा। अचानक मीरा जी के शरीर में एक तेज कंपन हुई और उनकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा, और ठीक उसी पल आर्यन ने भी अपना सारा गरम रस उनकी गहराई में छोड़ दिया।

खुदाई के बाद दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे की बाहों में गिर पड़े। मीरा जी के चेहरे पर एक सुकून भरी संतुष्टि थी जो उन्होंने बरसों से महसूस नहीं की थी। आर्यन उनकी गर्दन पर अपने होंठ रगड़ रहा था, जबकि मीरा जी उसके बालों को सहला रही थीं। कमरे की शांति में सिर्फ उनकी तेज सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। उस दोपहर ने उन दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था, जो शब्दों से परे था—एक ऐसा रिश्ता जहाँ जिस्मों ने एक-दूसरे की रूह को तृप्त कर दिया था।