कलात्मकता की परछाईं

पहाड़ों की उस ठंडी और धुंधली दोपहर में सन्नाटा पसरा हुआ था, जहाँ विक्रम अपने विशाल कैनवास पर नैना की जीवंत छवि उतारने की कोशिश कर रहा था। खिड़की से आती सुनहरी धूप नैना के अर्धनग्न बदन पर गिरकर उसे किसी कीमती प्रतिमा की तरह चमका रही थी, और विक्रम की पैनी आँखें उसकी हर छोटी हरकत और त्वचा की हर एक सिलवट को बारीकी से पढ़ रही थीं। नैना की साँसों की हल्की और अनियमित आवाज़ उस बंद कमरे के सन्नाटे को और भी रहस्यमयी बना रही थी, मानो समय अपनी गति भूल गया हो और सिर्फ उन दोनों की सांसें ही इस कमरे की धड़कन बन गई हों। विक्रम ने देखा कि नैना की आँखों में एक अजीब सा द्वंद्व था, जिसमें थोड़ी शर्म और उससे कहीं ज्यादा गहरी इच्छा छुपी हुई थी जो बाहर निकलने को बेताब थी।



विक्रम का ध्यान अपनी पेंटिंग से हटकर बार-बार नैना के उन दो विशाल और रसीले तरबूजों पर जा रहा था, जो उसकी आधी खुली रेशमी साड़ी के नीचे से आज़ाद होने के लिए मचल रहे थे। उन गुलाबी तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे हरे मटर जैसे दाने अब ठंड और उत्तेजना की वजह से पूरी तरह उभर आए थे, जो विक्रम की नज़रों की तपिश को महसूस कर रहे थे। नैना ने जब धीरे से अपनी साड़ी का पल्लू नीचे गिराया, तो उसके जिस्म की वह गहरी और संकरी खाई पूरी तरह उजागर हो गई, जो किसी प्राचीन रहस्यमयी गुफा की तरह गहरी, नम और अविश्वसनीय रूप से सम्मोहक लग रही थी। विक्रम का हाथ काँपा और ब्रश से एक गहरा रंग कैनवास पर फैल गया, जो उनके बीच बढ़ते हुए तनाव का पहला गवाह बना।
विक्रम ने अंततः ब्रश नीचे रख दिया और भारी कदमों से नैना के पास जाकर खड़ा हो गया, जहाँ हवा में उनकी मिली-जुली सांसों की गर्मी साफ़ महसूस की जा सकती थी। उसने अपनी काँपती हुई उँगलियों से नैना के चेहरे पर लटकती एक लट को कान के पीछे किया और उसके माथे पर जमा पसीने की बूंदों को निहारा। नैना ने अपनी पलकें झुका लीं, लेकिन उसकी तेज़ होती धड़कनें और उसका उभरता हुआ सीना विक्रम को अपनी ओर खींच रहा था। "नैना, तुम्हारी यह खूबसूरती सिर्फ कागज़ पर उतारने के लिए नहीं है," विक्रम ने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में कहा, जिससे नैना के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई और उसने अपना सिर पीछे झुकाते हुए विक्रम के स्पर्श को और अधिक चाहने का संकेत दिया।
विक्रम का एक हाथ धीरे से नीचे की ओर सरका और नैना के उन नर्म तरबूजों को अपनी गिरफ्त में ले लिया, जिससे नैना के गले से एक तीखी और मधुर आह निकली। उसने अपनी उँगलियों के पोरों से उन मटर के दानों को सहलाना शुरू किया, जिससे नैना का शरीर धनुष की तरह मुड़ने लगा और उसकी आँखें मदहोशी में बंद हो गईं। विक्रम अब रुकने वाला नहीं था, उसने धीरे-धीरे नैना को पास खींचा और उसके गले के पास अपनी जीभ से नमी छोड़ने लगा, जबकि उसके हाथ नीचे जाकर उस रेशमी घास और बालों से ढकी खाई को खोजने लगे। नैना ने भी विक्रम की कमर को कसकर पकड़ लिया और उसके खीरे की कठोरता को महसूस करके वह और भी ज्यादा उत्तेजित हो उठी।
नैना ने धीरे से विक्रम की पैंट की ज़िप खोली और उसके लम्बे, सख्त खीरे को अपने हाथों में ले लिया, जिसकी गर्माहट ने उसकी हथेलियों को जला सा दिया था। उसने उसे अपनी हथेलियों में भींचते हुए ऊपर-नीचे सहलाया और फिर अपनी कोमल ज़बान से उस खीरे को चाटना शुरू किया, मानो वह कोई दुर्लभ फल का स्वाद ले रही हो। विक्रम के मुँह से सिसकारी निकली और उसने नैना के बालों को अपनी मुट्ठी में भर लिया, उसे और गहराई से उस खीरे को मुँह में लेने के लिए प्रेरित किया। नैना की उस हरकत ने पूरे माहौल में एक आदिम वासना भर दी थी, जहाँ अब सिर्फ जिस्मों की मांग थी और सामाजिक बंधनों की कोई जगह नहीं बची थी।
विक्रम ने नैना को धीरे से उस विशाल मेज़ पर लिटा दिया और उसकी टांगों को फैलाकर उस गहरी खाई के मुहाने पर अपना स्थान बनाया। उसने देखा कि वह खाई अब पूरी तरह गीली और चमकदार हो चुकी थी, जहाँ से प्यार का रस धीरे-धीरे बाहर रिस रहा था। उसने अपनी उंगली से उस खाई को खोदना शुरू किया, जिससे नैना अपनी कमर ऊपर-नीचे पटकने लगी और उसकी सिसकारियाँ कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौटने लगीं। "विक्रम... प्लीज... अब और इंतज़ार नहीं होता... मुझे पूरी तरह खोद डालो," नैना ने बेबसी और प्यास से भरते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा समर्पण और अधिकार था जो विक्रम को पागल बना रहा था।
विक्रम ने अपने खीरे को उस खाई के प्रवेश द्वार पर टिकाया और एक गहरे दबाव के साथ खुदाई की शुरुआत की। जैसे ही वह सख्त खीरा उस तंग और मखमली खाई के अंदर समाया, नैना की एक लंबी और दर्दभरी चीख निकली जो तुरंत एक सुखद कराह में बदल गई। वह खुदाई बहुत ही धीमी और लयबद्ध थी, जहाँ हर धक्के के साथ विक्रम नैना के अस्तित्व के और भी करीब जा रहा था। नैना ने अपने पैरों को विक्रम की कमर के चारों ओर लपेट लिया और अपने तरबूजों को उसके सीने से रगड़ने लगी, जिससे घर्षण की गर्मी और भी बढ़ गई। कमरा अब शरीरों के टकराने की 'चप-चप' आवाज़ और उनकी भारी सांसों के शोर से गूँज रहा था।
जब विक्रम ने नैना को घुमाकर उसके पिछवाड़े की ओर से खोदना शुरू किया, तो आनंद का स्तर चरम पर पहुँच गया। नैना ने अपने हाथों से मेज़ को मज़बूती से पकड़ रखा था और उसके पिछवाड़े के दोनों हिस्से विक्रम के हर प्रहार के साथ लहरों की तरह हिल रहे थे। "हाँ विक्रम... वहीं... और तेज़... मुझे पूरी तरह से भर दो!" वह चिल्लाई और उसके शरीर की हर मांसपेशी तन गई। खुदाई अब अपने सबसे हिंसक और आनंदमयी रूप में थी, जहाँ दोनों का पसीना आपस में मिल चुका था और उनकी रूहें उस शारीरिक क्रिया के माध्यम से एक-दूसरे में विलीन हो रही थीं। विक्रम को महसूस हुआ कि उसकी सहनशक्ति जवाब दे रही है और नैना की खाई भी अब बहुत तेज़ संकुचन कर रही थी।
अचानक नैना का पूरा शरीर काँपने लगा और उसने एक ऊँची आवाज़ के साथ अपना सारा रस छोड़ दिया, उसकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ गईं और वह निढाल सी होने लगी। ठीक उसी पल विक्रम ने भी एक अंतिम और गहरा धक्का मारा और अपना सारा गरम रस उस खाई की गहराइयों में विसर्जित कर दिया। दोनों कुछ देर तक उसी अवस्था में रहे, एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते हुए और उस असीम शांति का अनुभव करते हुए जो केवल इस तरह के तीव्र मिलन के बाद आती है। धूप अब ढल चुकी थी और कमरा धुंधला हो गया था, लेकिन उन दोनों के शरीरों की चमक और उस खुदाई की याद अब हमेशा के लिए उस कमरे की हवा में बस गई थी।