मीरा हमेशा से ही अनुशासन की पक्की थी, लेकिन आज योगशाला के उस बंद कमरे में उसकी एकाग्रता जैसे कहीं खो गई थी। उसके सामने खड़ा विक्रम, जो उसका सबसे पुराना और पसंदीदा शिष्य था, आज उसे एक अलग ही नज़र से देख रहा था। मीरा के शरीर पर चिपके हुए योग के कपड़े उसके अंगों की हर एक बनावट को बड़ी ही बारीकी से उजागर कर रहे थे। उसके उभरे हुए गोल-मटोल तरबूज हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, जैसे वे किसी गहरे तूफान के आने की दस्तक दे रहे हों। उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर के दाने साफ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे, जो ठंडक की वजह से नहीं बल्कि एक अनजानी उत्तेजना के कारण अकड़ गए थे।
विक्रम ने जब मीरा के करीब आकर उसे एक विशेष आसन सिखाने में मदद मांगी, तो उनके बीच की दूरी सिमट गई। मीरा की सांसें तेज़ होने लगी थीं और उसे महसूस हो रहा था कि विक्रम की नजरें उसके तरबूजों पर जमी हुई हैं। विक्रम का हाथ जैसे ही मीरा की कमर पर पड़ा, मीरा के पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। उसने महसूस किया कि विक्रम की पैंट के भीतर उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ आकार ले रहा है। दोनों की आंखों में एक प्यास थी, एक ऐसी भूख जो सालों से दबी हुई थी और आज वह सारे बांध तोड़ देने को बेताब थी। मीरा के मन में एक हल्का सा संघर्ष चला कि यह गलत है, लेकिन उसकी देह की मांग उस पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
विक्रम ने धीरे से मीरा को अपनी बाहों में भर लिया और उसके चेहरे के करीब अपना चेहरा ले गया। उन दोनों के होंठों के बीच की दूरी खत्म हुई और वे एक-दूसरे के रस को चखने लगे। मीरा के हाथ विक्रम की पीठ पर कस गए और वह उसके मजबूत शरीर को खुद में समा लेने की कोशिश करने लगी। विक्रम का हाथ नीचे फिसला और उसने मीरा के भारी पिछवाड़े को जोर से भींच दिया। मीरा के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। कमरे में एसी चल रहा था, लेकिन उन दोनों के शरीर से निकलते पसीने ने वातावरण को पूरी तरह गर्म और उमस भरा बना दिया था। हर स्पर्श में एक नयी दास्तान लिखी जा रही थी।
अब सब्र का बांध पूरी तरह टूट चुका था। विक्रम ने मीरा के योग वाले कपड़ों को धीरे-धीरे उतारना शुरू किया। जैसे-जैसे उसके शरीर से परदे हट रहे थे, उसकी सुंदर और गहरी खाई साफ़ नज़र आने लगी। उस खाई के आसपास छोटे-छोटे रेशमी बाल थे, जो उसकी कामुकता को और भी बढ़ा रहे थे। मीरा ने भी बिना देर किए विक्रम की पैंट उतार दी, जहाँ से उसका गर्म और सख्त खीरा उछलकर बाहर आ गया। मीरा ने अपनी उंगलियों से उस खीरे की लंबाई को महसूस किया और फिर धीरे-धीरे उसे अपने मुंह के भीतर लेना शुरू कर दिया। विक्रम की आहें कमरे में गूंजने लगीं क्योंकि मीरा बड़ी ही फुर्ती और प्यार से खीरा चूसना जारी रखे हुए थी।
मीरा ने अब विक्रम को जमीन पर लेटे हुए गद्दे पर धकेल दिया और खुद उसकी खाई चाटने के लिए इशारा किया। विक्रम ने मीरा की दोनों टांगों को फैलाया और अपनी जीभ उस गीली और रसीली खाई में डाल दी। मीरा की खाई से निकलता हुआ प्राकृतिक रस अब पूरी तरह से बहने लगा था। वह पागलों की तरह विक्रम के सिर को अपनी ओर खींच रही थी ताकि वह और गहराई से उंगली से खोदना शुरू कर सके। मीरा का शरीर धनुष की तरह तन गया था और उसके मटर अब और भी सख्त हो चुके थे। वह बार-बार विक्रम का नाम पुकार रही थी और उससे गुजारिश कर रही थी कि वह अब और इंतज़ार नहीं कर सकती।
विक्रम ने मीरा को घुमाया और उसे बिस्तर पर लेटा दिया ताकि वह सामने से खोदना शुरू कर सके। जैसे ही विक्रम ने अपना सख्त खीरा मीरा की तंग खाई के मुहाने पर रखा, मीरा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। एक ज़ोरदार धक्के के साथ खीरा पूरी तरह से खाई के भीतर समा गया। मीरा के मुँह से एक तीखी लेकिन सुखद चीख निकली। खुदाई की प्रक्रिया अब बहुत ही धीमी और लयबद्ध तरीके से शुरू हुई। हर धक्के के साथ मीरा के तरबूज हवा में उछल रहे थे और विक्रम उन्हें अपने हाथों से मसलते हुए उन पर लगे मटरों को अपने दांतों से हल्का-हल्का काट रहा था। खुदाई की आवाज़ें उस शांत कमरे में संगीत की तरह लग रही थीं।
थोड़ी देर बाद विक्रम ने मीरा की स्थिति बदली और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू करने के लिए उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। मीरा का पिछवाड़ा अब पूरी तरह से विक्रम के सामने था और वह पागलों की तरह उस पर थप्पड़ मारते हुए अपने खीरे को गहरी खाई में उतार रहा था। खुदाई अब बहुत तेज़ हो चुकी थी, दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे। मीरा बार-बार कह रही थी, "हाँ विक्रम, और गहराई से खोदो, मुझे पूरी तरह भर दो।" विक्रम के हर प्रहार के साथ मीरा का रस और भी ज्यादा निकलने लगा था। दोनों का तालमेल अब अपने चरम पर पहुँच चुका था और वे दोनों ही उस जादुई पल के करीब थे।
अचानक मीरा के शरीर में एक अजीब सी कंपन हुई और उसकी खाई ने विक्रम के खीरे को कसकर जकड़ लिया। मीरा का रस निकलना शुरू हो गया और वह बिस्तर पर ढीली पड़ गई। ठीक उसी पल विक्रम ने भी अपनी पूरी ताकत लगाई और अपना सारा गर्म रस मीरा की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी सांसें अब भी तेज थीं लेकिन मन को एक असीम शांति मिल चुकी थी। मीरा की हालत ऐसी थी जैसे वह किसी गहरी नींद से जागी हो, उसका पूरा शरीर अभी भी कांप रहा था। विक्रम ने उसे अपनी बाहों में समेटा और उसके माथे को चूमते हुए उस यादगार खुदाई के अहसास को हमेशा के लिए अपने दिल में बसा लिया।