पहाड़ी हवेली की वह मदहोश रात

आर्यन की आँखों में एक अजीब सी चमक थी जब उसने स्नेहा को खिड़की के पास खड़ा देखा, जहाँ चाँदनी उसके गोरे बदन पर किसी मखमली चादर की तरह लिपटी हुई थी। स्नेहा ने एक हल्की रेशमी साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से बयां कर रही थी, और आर्यन का मन उस शांति में भी अशांत हो उठा था। कमरे में जल रही मोमबत्तियों की मद्धम रोशनी उनके बीच के अनकहे तनाव को और भी गहरा कर रही थी, जैसे कि दोनों ही किसी ज्वालामुखी के फटने का इंतज़ार कर रहे हों। स्नेहा की साँसों की गति थोड़ी तेज़ थी, और उसके सीने का उभार उसकी उत्तेजना को साफ़ तौर पर ज़ाहिर कर रहा था, जिससे आर्यन के अंदर का पुरुष जाग उठा था।



आर्यन धीरे-धीरे उसके करीब पहुँचा और उसकी कमर पर हाथ रखा, जहाँ की त्वचा रेशम से भी ज़्यादा नरम और गर्म महसूस हो रही थी। स्नेहा के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, उसके ऊपर के दो रसीले और भारी 'तरबूज' साड़ी के नीचे से अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे, जो आर्यन की धड़कनों को बेकाबू कर रहे थे। जैसे ही आर्यन ने उसके कंधों से पल्लू सरकाया, उन 'तरबूजों' के शिखर पर छोटे और सख्त 'मटर' उभरे हुए दिखाई दिए, जो ठंड और उत्तेजना के कारण पूरी तरह तन चुके थे। आर्यन ने झुककर अपनी नाक उसकी गर्दन पर रगड़ी, जिससे स्नेहा के मुँह से एक हल्की सी सिसकी निकली और उसका पूरा बदन सिहर उठा।
स्नेहा ने मुड़कर आर्यन की आँखों में देखा, जहाँ वासना और प्यार का एक गहरा समंदर हिलोरे मार रहा था, उसने अपनी कांपती उंगलियों से आर्यन के चेहरे को छुआ। "आर्यन, यह गलत है पर मुझे यह बहुत सही लग रहा है," उसने धीमी आवाज़ में कहा, और उसकी आँखों में छाई हुई झिझक अब धीरे-धीरे समर्पण में बदल रही थी। दोनों के बीच की दूरी अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी, और आर्यन का सख्त होता हुआ 'खीरा' अब उसकी पतलून के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहा था, जो स्नेहा की जांघों से टकराकर उसे अपनी ताकत का अहसास करा रहा था। स्नेहा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और आर्यन के करीब खिंची चली आई, उसका मन अब पूरी तरह से इस आग में जलने को तैयार था।
आर्यन ने बिना देर किए स्नेहा के होंठों का 'मधु-पान' करना शुरू किया, और उसके हाथों ने नीचे जाकर स्नेहा की रेशमी साड़ी को पूरी तरह से उतार फेंका। अब वह उसके सामने पूरी तरह प्राकृतिक अवस्था में थी, उसके शरीर के निचले हिस्से पर काले घुंघराले 'बाल' उसकी 'खाई' की रक्षा कर रहे थे, लेकिन वह 'खाई' अब गीली और आमंत्रित लग रही थी। आर्यन ने घुटनों के बल बैठकर उसके पैरों के बीच अपनी जगह बनाई और धीरे-धीरे अपने हाथों को ऊपर ले जाते हुए उसकी 'खाई' के पास के 'बालों' को सहलाया, जिससे स्नेहा की कराह पूरे कमरे में गूँज उठी। उसने आर्यन के सिर को पकड़ लिया और अपनी 'खाई' को उसके चेहरे की तरफ धकेलने लगी, जैसे वह चाहती हो कि वह उसे चखे।
आर्यन ने अपनी जीभ का इस्तेमाल करते हुए उस गहरी और रसीली 'खाई' को चाटना शुरू किया, जिससे स्नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह जोर-जोर से आहें भरने लगी। "ओह आर्यन, वहीं... हाँ, वैसे ही," स्नेहा के ये शब्द आर्यन को और भी पागल कर रहे थे, और वह अपनी उंगली से उस 'खाई' के अंदर खुदाई करने लगा, जिससे स्नेहा के रस की कुछ बूंदें बाहर आने लगीं। उसकी उंगलियाँ जैसे ही उस तंग रास्ते के अंदर गईं, स्नेहा ने अपने पैरों से आर्यन के सिर को जकड़ लिया, वह सुख के उस चरम की ओर बढ़ रही थी जहाँ शब्द छोटे पड़ जाते हैं। आर्यन ने अपना 'खीरा' बाहर निकाला, जो अब पूरी तरह से तैयार और लोहे जैसा सख्त हो चुका था, उसकी चमक और मोटाई देखकर स्नेहा की साँसें रुक सी गईं।
स्नेहा ने धीरे से झुककर आर्यन के उस विशाल 'खीरे' को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़ी शिद्दत से चूसने लगी, जैसे वह कोई स्वादिष्ट फल हो। आर्यन के मुँह से एक गहरी आह निकली जब स्नेहा की गर्म ज़बान उसके 'खीरे' के ऊपरी हिस्से को सहला रही थी, और उसे महसूस हो रहा था कि उसका नियंत्रण अब खत्म होने वाला है। "बस करो स्नेहा, अब मुझसे और इंतज़ार नहीं होता," उसने हाँफते हुए कहा और उसे बिस्तर पर लिटा दिया, उसके दोनों पैरों को चौड़ा करके वह उसकी 'खाई' के मुहाने पर अपना 'खीरा' टिका चुका था। स्नेहा ने उसकी पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए और उसे अपने अंदर समाने का इशारा किया, उसकी आँखें अब पूरी तरह से प्यासी थीं।
आर्यन ने एक ही झटके में अपने पूरे 'खीरे' को स्नेहा की तंग 'खाई' के अंदर उतार दिया, जिससे एक सधी हुई आवाज़ गूँजी और स्नेहा की आँखों से खुशी के आंसू निकल आए। "आह... तुम बहुत बड़े हो आर्यन, मुझे पूरा भर दिया तुमने," उसने चिल्लाकर कहा, और आर्यन ने धीरे-धीरे 'खुदाई' शुरू कर दी, हर धक्का गहरा और ताकतवर था। कमरे की हवा उनकी रगड़ और 'खुदाई' की आवाज़ों से भारी हो गई थी, और आर्यन लगातार अपनी लय बढ़ा रहा था, जिससे स्नेहा का पूरा शरीर बिस्तर पर उछल रहा था। वह कभी सामने से उसे 'खोदता' तो कभी उसे घुमाकर उसके 'पिछवाड़े' की तरफ से अपनी ताकत का अहसास कराता, जिससे स्नेहा का रोम-रोम कांप उठता था।
'खुदाई' की प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी, आर्यन की गति इतनी तेज़ थी कि स्नेहा की चीखें अब सिसकियों में तब्दील हो गई थीं और उसका शरीर पसीने से तर-बतर था। "मैं पहुँचने वाली हूँ आर्यन, मुझे और जोर से 'खोदो', मेरा 'रस' छूटने वाला है," स्नेहा ने बदहवास होकर कहा, और आर्यन ने अपनी पूरी ताकत लगाकर अंतिम कुछ धक्के दिए। जैसे ही आर्यन का 'खीरा' उस 'खाई' की गहराई से टकराया, स्नेहा के शरीर में एक तेज़ कंपन हुआ और उसका 'रस' बड़ी मात्रा में बाहर निकल आया, और उसी पल आर्यन का भी सारा 'रस' स्नेहा के अंदर ही छूट गया। दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी साँसें तेज़ थीं और दिल की धड़कनें एक-दूसरे की छाती में महसूस हो रही थीं।
कुछ देर की उस गहरी खामोशी के बाद, आर्यन ने स्नेहा को अपने सीने से लगा लिया, और स्नेहा ने उसकी छाती पर अपना सिर रख दिया, जहाँ अब भी पसीने की बूंदें चमक रही थीं। उनकी हालत ऐसी थी जैसे किसी बड़े युद्ध से लौटे हों, थके हुए लेकिन पूरी तरह से संतुष्ट और शांत, उस 'खुदाई' ने उनके बीच के हर फासले को मिटा दिया था। स्नेहा के चेहरे पर एक अजब सी तृप्ति थी, और आर्यन उसे देख रहा था जैसे उसने दुनिया का सबसे बड़ा खजाना जीत लिया हो, उस पहाड़ी हवेली की वह रात हमेशा के लिए उनके जिस्मों पर अपनी छाप छोड़ गई थी। अब बस हवा की सरसराहट थी और दो रूहों का एक-दूसरे में मिलन, जो इस अद्भुत अनुभव के बाद और भी करीब आ गए थे।