पुराने शहर की एक सुनसान कला दीर्घा के कोने में बने उस छोटे से कमरे में चारों ओर कैनवास बिखरे हुए थे और हवा में तारपीन के तेल की तीखी गंध घुली हुई थी। आर्यन अपनी अधूरी पेंटिंग के सामने खड़ा था, लेकिन उसकी नजरें सामने बैठी अवनि पर टिकी थीं, जो आज उसकी मॉडल बनी थी और उसकी रेशमी साड़ी के पल्लू से झांकते उसके शरीर के उतार-चढ़ाव आर्यन की धड़कनों को अनियंत्रित कर रहे थे। अवनि की काया किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, जहाँ उसके उन्नत और भरे हुए 'तरबूज' साड़ी की तंग चोली से बाहर निकलने को बेताब दिख रहे थे और उसकी हर सांस के साथ उन 'तरबूजों' की हरकत आर्यन के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी। वह देख सकता था कि अवनि के उन कोमल 'तरबूजों' के ठीक बीच में जो छोटे-छोटे 'मटर' थे, वे ठंडक या शायद बढ़ती हुई उत्तेजना के कारण अब सख्त होने लगे थे और साड़ी के पतले कपड़े को भेदकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।
आर्यन ने ब्रश नीचे रखा और धीरे-धीरे अवनि की ओर बढ़ा, उसके कदमों की आहट सन्नाटे को चीर रही थी और अवनि की आँखों में एक अजीब सी चमक और शरीर में थरथराहट साफ़ देखी जा सकती थी। जब वह उसके बिल्कुल करीब पहुँचा, तो उसे अवनि के शरीर से उठती हुई एक भीनी सी महक महसूस हुई, जो किसी जंगली फूल जैसी नशीली थी और अवनि का भारी 'पिछवाड़ा' जिस स्टूल पर टिका था, वह भी शायद उस भारीपन को महसूस कर रहा था। अवनि ने अपनी पलकें झुका ली थीं, लेकिन उसकी बढ़ती हुई सांसें बता रही थीं कि वह भी आर्यन के इस बढ़ते आकर्षण और झिझक के बीच के द्वंद्व को बखूबी समझ रही थी और उसे स्वीकार करने के लिए तैयार थी। आर्यन का हाथ कांपते हुए अवनि के कंधे पर गया और फिर धीरे से नीचे की ओर सरकने लगा, जहाँ उसने अवनि के कमर की गोलाई को छुआ, जिससे अवनि के मुँह से एक दबी हुई आह निकल गई और उसका पूरा बदन सिहर उठा।
"अवनि, तुम जानती हो कि यह आग हमारे बीच कितनी गहरी है," आर्यन ने फुसफुसाते हुए कहा और उसके होंठ अवनि के कान के पास पहुँच गए, जिससे अवनि की गर्दन पर मौजूद छोटे-छोटे रोएं खड़े हो गए। अवनि ने मुड़कर आर्यन की आँखों में देखा, जहाँ वासना और प्रेम का एक गहरा सागर हिलोरे मार रहा था, और उसने बिना कुछ कहे आर्यन के चेहरे को अपने हाथों में भर लिया, जिससे सारी झिझक एक पल में धुंआ हो गई। उनके बीच का आकर्षण अब एक ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार था और आर्यन ने अवनि की साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे उसके विशाल 'तरबूज' अब पूरी तरह से उसके सामने थे, जिनकी लालिमा और उन पर उभरे 'मटर' आर्यन को पागल करने के लिए काफी थे। उसने अपनी उंगलियों से उन 'मटरों' को सहलाया, तो अवनि की कमर धनुष की तरह मुड़ गई और वह आर्यन के गले से लग गई, मानो खुद को पूरी तरह सौंप देना चाहती हो।
कमरे की मद्धम रोशनी में अब कपड़े एक-एक करके फर्श पर गिर रहे थे और जल्द ही वे दोनों कुदरती अवस्था में एक-दूसरे के सामने थे, जहाँ अवनि की जांघों के बीच की वह रहस्यमयी और गीली 'खाई' आर्यन को अपनी ओर खींच रही थी। अवनि की 'खाई' के आसपास मौजूद महीन और मुलायम 'बाल' उस जगह की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे, जबकि आर्यन का अपना 'खीरा' अब पूरी तरह से तमतमाया हुआ और सख्त हो चुका था, जो अपनी खुदाई की बारी का इंतजार कर रहा था। अवनि ने झुककर आर्यन के उस विशाल 'खीरे' को अपने हाथों में लिया और उसे अपनी हथेलियों से सहलाने लगी, जिससे आर्यन के मुँह से एक सिसकारी निकली और उसे लगा कि उसका पूरा अस्तित्व उस एक 'खीरे' में सिमट आया है। अवनि ने फिर धीरे से उस 'खीरे' को अपने मुँह में लिया और उसे चूसने लगी, जिससे आर्यन के शरीर में बिजली की लहरें दौड़ने लगीं और वह अवनि के सिर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उस सुख को महसूस करने लगा।
अब सबर का बांध टूट चुका था और आर्यन ने अवनि को पास पड़ी एक मेज पर लिटा दिया, जहाँ अवनि की 'खाई' अब पूरी तरह से खुल गई थी और उसमें से निकलता प्राकृतिक रस उसकी जांघों को भिगो रहा था। आर्यन ने नीचे झुककर उस 'खाई' को चाटना शुरू किया, तो अवनि पागलों की तरह तड़पने लगी और उसके हाथ मेज के किनारों को मजबूती से जकड़ चुके थे, उसकी सिसकारियां कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं। "आर्यन... प्लीज... अब और नहीं... मुझे खोदो..." अवनि ने भारी आवाज में गुहार लगाई, जिसके बाद आर्यन ने अपना सख्त 'खीरा' अवनि की उस रसीली 'खाई' के मुहाने पर टिका दिया और एक गहरे दबाव के साथ अंदर प्रवेश कर गया। सामने से खुदाई शुरू होते ही दोनों के शरीरों के बीच एक लयबद्ध घर्षण पैदा हुआ, जिससे निकलने वाली आवाज़ें उस सन्नाटे को और भी कामुक बना रही थीं, और आर्यन का हर धक्का अवनि के भीतर तक हलचल मचा रहा था।
जैसे-जैसे खुदाई की गति बढ़ी, आर्यन ने अवनि को घुमाया और उसे मेज पर झुका दिया, ताकि वह 'पिछवाड़े' से खुदाई कर सके, जो एक अलग ही आनंद का अहसास दे रहा था। अवनि का वह मांसल 'पिछवाड़ा' आर्यन के धक्कों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था और आर्यन ने पीछे से उसके 'तरबूजों' को अपने हाथों में भरकर जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया, जिससे अवनि की आवाजें और भी ऊँची होने लगीं। "हाँ आर्यन... और गहराई से... मुझे पूरा खोद डालो!" अवनि की इन बातों ने आर्यन के भीतर की उत्तेजना को चरम पर पहुँचा दिया और वह अपनी पूरी ताकत के साथ उस 'खाई' के भीतर अपने 'खीरे' को उतारने लगा, मानो वह उस गहराई की आखिरी सीमा तक पहुँच जाना चाहता हो। दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और सांसों की गति इतनी तेज थी कि फेफड़े फटने को तैयार थे, लेकिन सुख का वह अहसास उन्हें रुकने नहीं दे रहा था।
अंततः वह क्षण आ गया जब आर्यन के 'खीरे' ने अपनी पूरी ऊर्जा समेट ली और अवनि की 'खाई' के भीतर 'रस' का एक सैलाब उमड़ पड़ा, जिससे अवनि का पूरा शरीर झटके लेने लगा और उसका अपना 'रस' भी छलक कर बाहर आ गया। दोनों एक-दूसरे में लिपटे हुए फर्श पर गिर पड़े, जहाँ चारों ओर सिर्फ उनकी भारी सांसें और एक अजीब सी संतुष्टि भरी खामोशी थी, जो उस गहन खुदाई के बाद के सुख का प्रमाण थी। अवनि आर्यन की छाती पर अपना सिर रखकर लेटी थी और आर्यन उसके गीले बालों को सहला रहा था, उनकी त्वचा अभी भी एक-दूसरे की गर्मी महसूस कर रही थी और वह कला दीर्घा अब सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि उनके जिस्मानी मिलन की गवाह बन चुकी थी। उस रात के बाद उनके बीच का रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा था, क्योंकि उन्होंने जिस्म की उस भाषा को पढ़ लिया था जिसे सिर्फ दो प्यासे रूह ही समझ सकते थे।