गर्मी की वो आलसी दोपहर थी जब पूरा मोहल्ला गहरी नींद में सोया हुआ था, लेकिन रोहन की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। वह खिड़की से सामने वाले घर की ओर देख रहा था जहाँ सुनीता भाभी अपने बरामदे में कपड़े सुखा रही थीं। सुनीता भाभी की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी, उनका शरीर किसी पके हुए रसीले फल की तरह भरा हुआ और सुडौल था। जब वो ऊपर हाथ उठाकर रस्सी पर साड़ी डालतीं, तो उनके ब्लाउज के नीचे दबे उनके बड़े-बड़े गोल तरबूज साफ झलकते थे और उनकी पतली कमर का घेरा देखकर रोहन के मन में अजीब सी हलचल मचने लगती थी। सुनीता भाभी का पति अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहता था, जिससे उनकी आँखों में एक किस्म की प्यास और अकेलापन साफ झलकता था।
रोहन बहाने से उनके घर पहुँचा और पानी माँगने के बहाने रसोई की ओर बढ़ा जहाँ भाभी फल काट रही थीं। उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से थोड़ा खिसका हुआ था जिससे उनके गोरे और गोल तरबूज का ऊपरी हिस्सा और उस पर मौजूद हल्की सी लकीर साफ़ दिख रही थी। रोहन की नज़रें उनके शरीर की बनावट पर टिक गईं, विशेषकर उनके भारी पिछवाड़े पर जो साड़ी के महीन कपड़े में बहुत ही आकर्षक लग रहे थे। सुनीता भाभी ने रोहन की नज़रों को महसूस किया लेकिन उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उनकी आँखों में एक शरारती चमक आ गई। उन्होंने धीरे से झुककर पानी का गिलास उठाया जिससे उनके तरबूज और भी उभर कर सामने आ गए, जिन्हें देखकर रोहन का साँस लेना दूभर हो गया था।
बातों-बातों में दोनों के बीच का तनाव बढ़ने लगा और रोहन ने साहस जुटाकर भाभी के हाथ पर अपना हाथ रख दिया। भाभी की त्वचा रेशम जैसी कोमल और गर्म थी, जिसे छूते ही रोहन के शरीर में बिजली सी दौड़ गई और उसके पजामे के भीतर उसका खीरा पूरी तरह से अकड़ कर खड़ा हो गया। सुनीता भाभी ने उसे झिड़कने के बजाय गहरी साँस ली और अपनी आँखें मूंद लीं, जैसे वो इसी स्पर्श का सालों से इंतज़ार कर रही थीं। रोहन ने उनके करीब जाकर उनकी कमर को थाम लिया और उनके गर्दन के पीछे के छोटे-छोटे बाल सहलाने लगा। भाभी की सिसकारी गूँजी और उन्होंने अपना सिर रोहन के कंधे पर टिका दिया, जिससे दोनों के दिलों की धड़कनें साफ़ सुनाई देने लगी थीं।
धीरे-धीरे रोहन के हाथ उनके ब्लाउज के हुक तक पहुँचे और जैसे ही उसने हुक खोले, भाभी के भारी और सफ़ेद तरबूज आज़ाद होकर बाहर छलक आए। रोहन ने अपनी उंगलियों से उन तरबूजों के ऊपर मौजूद नन्हे और सख्त मटर के दानों को सहलाना शुरू किया, जिससे भाभी के मुँह से सिसकारी निकलने लगी। उनकी साड़ी और पेटीकोट कब ज़मीन पर गिर गए पता ही नहीं चला, और अब वो पूरी तरह से निर्वस्त्र रोहन के सामने खड़ी थीं। उनकी टाँगों के बीच की घनी झाड़ियों वाले बाल और उनके नीचे छिपी उनकी गीली और गुलाबी खाई को देखकर रोहन के सब्र का बाँध टूट गया। भाभी ने भी उत्सुकता से रोहन का पजामा नीचे उतारा और उसके विशाल और कड़क खीरे को बाहर निकाला, जिसे देखते ही उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
रोहन ने भाभी को बिस्तर पर लिटाया और उनके मटर जैसे निप्पलों को अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू किया, जबकि उसका दूसरा हाथ उनकी रेशमी खाई को सहला रहा था। भाभी अपनी कमर ऊपर उठाकर रोहन के हाथ का साथ दे रही थीं और जब रोहन ने अपनी उंगली से उनकी खाई के अंदर खुदाई शुरू की, तो भाभी की पूरी देह कांपने लगी। उनकी खाई से निकलने वाला चिकना रस अब रोहन की उंगलियों पर लग चुका था, जो इस बात का संकेत था कि वो पूरी तरह से तैयार थीं। रोहन ने अपने खीरे को उनके मुँह के करीब लाया और भाभी ने बड़ी चाहत से पूरे खीरे को अपने मुँह में लेकर उसे चूसना शुरू कर दिया, जिससे रोहन के आनंद का ठिकाना नहीं रहा।
अब समय आ गया था असल खुदाई का, रोहन ने भाभी की दोनों टाँगों को अपने कंधों पर रखा और अपने कड़क खीरे की नोक को उनकी गीली खाई के द्वार पर टिका दिया। जैसे ही उसने धीरे से दबाव डाला, भाभी की सिसकारी कमरे की दीवारों से टकराने लगी और खीरा धीरे-धीरे उस तंग और गर्म खाई के अंदर समाने लगा। भाभी ने रोहन की पीठ में अपने नाखून गड़ा दिए और जोर-जोर से आहें भरने लगीं क्योंकि उनके शरीर का कोना-कोना इस खुदाई के अहसास से भर गया था। रोहन ने अपनी गति बढ़ाई और पूरी ताकत से अपनी कमर चलाकर उस गहरी खाई की गहराई नापने लगा, हर धक्के के साथ भाभी का पिछवाड़ा बिस्तर से ऊपर उठ जाता था।
खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा, कभी रोहन भाभी को पिछवाड़े से खोदता तो कभी उन्हें अपने ऊपर बिठाकर उनकी खाई का मज़ा लेता। कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ और भारी साँसों का शोर था। भाभी की उत्तेजना अब अपने चरम पर थी, उन्होंने रोहन को ज़ोर से अपनी बाहों में जकड़ लिया और उनकी खाई की दीवारों ने खीरे को कसना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में भाभी के शरीर में एक ज़बरदस्त कंपन हुआ और उनकी खाई से सारा रस छूट गया, जिसके तुरंत बाद रोहन ने भी अपने खीरे का गरम रस उनकी गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल होकर गिर पड़े, पसीने से तरबतर उनके शरीर एक-दूसरे में सिमटे हुए थे और एक गहरी शांति और संतुष्टि उनके चेहरों पर साफ़ झलक रही थी।