ऑफिस की गगनचुंबी इमारत की दसवीं मंजिल पर स्थित उस केबिन में चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था और सिर्फ एयर कंडीशनर की हल्की सी घरघराहट सुनाई दे रही थी। अर्जुन अपनी मेज पर बैठा लैपटॉप पर नजरें गड़ाए हुए था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार सामने वाले केबिन की कांच की दीवार के पार जा रहा था जहाँ कविता जी अपनी फाइलों में डूबी हुई थीं। रात के ग्यारह बज चुके थे और ऑफिस में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था, जिससे वातावरण में एक अजीब सी बेचैनी और उत्तेजना घुली हुई थी। कविता जी, जो कि मार्केटिंग हेड थीं, अपनी उम्र के छत्तीसवें पड़ाव पर थीं और उनकी खूबसूरती में एक ऐसा ठहराव था जो किसी भी युवा को अपना दीवाना बना देने के लिए काफी था। उनके काले रेशमी बाल कंधों पर बिखरे हुए थे और उनकी लाल रंग की शिफॉन की साड़ी उनके शरीर के उभारों को कुछ इस तरह प्रदर्शित कर रही थी कि अर्जुन की नजरें वहां से हट ही नहीं पा रही थीं।
कविता जी का शरीर एक परिपक्व स्त्री की पूर्णता को दर्शाता था, उनकी कमर के पास से साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था जिससे उनके गोरे बदन की झलक मिल रही थी। उनके ऊपर के दो भारी तरबूज उस तंग ब्लाउज में जैसे कैद होने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनकी गोलाई और उभार साफ बता रहे थे कि वे कितने रसीले और भारी होंगे। जब भी वह सांस लेतीं, उनके वे तरबूज ऊपर-नीचे होते और अर्जुन के दिल की धड़कनें तेज कर देते, उसे ऐसा महसूस होता जैसे उन तरबूजों के ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर उस पतले कपड़े को चीर कर बाहर आना चाहते हों। उनकी चौड़ी जांघें और उनका भारी पिछवाड़ा जब भी वह कुर्सी से उठतीं, तो उस साड़ी के नीचे से एक अद्भुत लय पैदा करता था जिसे देख अर्जुन के मन में बार-बार गहरी खुदाई की इच्छा जागृत हो रही थी।
अर्जुन पिछले दो सालों से कविता जी के नीचे काम कर रहा था और शुरू से ही वह उनके व्यक्तित्व और शारीरिक बनावट का कायल था, लेकिन उसने कभी अपनी भावनाओं को जाहिर नहीं होने दिया था। उनके बीच हमेशा एक पेशेवर रिश्ता रहा था, लेकिन आज की रात कुछ अलग थी क्योंकि काम का बोझ इतना ज्यादा था कि उन्हें रुकना पड़ा और इस एकांत ने अर्जुन के अंदर दबी हुई पुरानी इच्छाओं को हवा दे दी थी। कविता जी भी शायद अर्जुन की उन प्यासी निगाहों को महसूस कर रही थीं क्योंकि जब भी उनकी नजरें मिलतीं, वह एक हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी नजरें झुका लेतीं, जो अर्जुन को और भी ज्यादा प्रोत्साहित करती थी। उनके मन में भी एक द्वंद्व चल रहा था कि क्या यह सही है, पर उनकी खुद की दबी हुई कामुक इच्छाएं आज मर्यादा की सीमाओं को लांघने के लिए बेकरार हो रही थीं।
अचानक कविता जी ने उसे अपने केबिन में बुलाया और जब अर्जुन वहां पहुंचा, तो उसने देखा कि वह अपनी कुर्सी पर कुछ इस तरह बैठी थीं कि उनकी साड़ी का पल्लू पूरी तरह गिर चुका था। उनके भारी और सफेद तरबूज अब और भी करीब से दिखाई दे रहे थे और उनके बीच की गहरी घाटी अर्जुन को खुद में समा लेने का निमंत्रण दे रही थी। अर्जुन के हाथ कांपने लगे जब कविता जी ने उसे एक फाइल पकड़ने को कहा और जानबूझकर उनके हाथों का स्पर्श हुआ, वह स्पर्श किसी बिजली के झटके की तरह अर्जुन के पूरे शरीर में दौड़ गया। कविता जी की आंखों में एक अजीब सी चमक थी और उन्होंने धीरे से अर्जुन का हाथ अपने रेशमी तरबूज पर रख दिया, जिससे अर्जुन की सांसें रुक सी गईं और उसका खीरा अपनी जगह पर जोर-शोर से अकड़ने लगा।
अर्जुन ने हिम्मत जुटाकर अपनी उंगलियों से उनके तरबूजों को सहलाना शुरू किया, वह इतने नरम और गर्म थे कि अर्जुन को ऐसा लगा जैसे वह मखमल को छू रहा हो। कविता जी ने एक गहरी आह भरी और अपनी आंखें मूंद लीं, उनकी इस प्रतिक्रिया ने अर्जुन के डर को पूरी तरह खत्म कर दिया और उसने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोलना शुरू कर दिए। जैसे ही वह भारी तरबूज आजाद हुए, अर्जुन की आंखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि वे बिना किसी सहारे के इतने सुडौल और आकर्षक थे कि उसने तुरंत झुककर उनके गुलाबी मटर को अपने मुंह में ले लिया। कविता जी का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह अर्जुन के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे अपने और करीब खींचने लगीं, उनकी सिसकारियां उस शांत केबिन में गूंजने लगी थीं।
धीरे-धीरे कपड़ों का बोझ कम होता गया और जल्द ही दोनों पूरी तरह प्राकृतिक अवस्था में एक-दूसरे के सामने थे, कविता जी का वह भारी पिछवाड़ा और उनकी गहरी खाई अब अर्जुन के सामने पूरी तरह उजागर थी। अर्जुन ने देखा कि उनकी खाई के चारों ओर काले और मुलायम बाल थे जो उस जगह को और भी रहस्यमयी और आकर्षक बना रहे थे, वहां से एक प्राकृतिक सोंधी महक आ रही थी जो किसी भी मर्द को पागल कर सकती थी। अर्जुन ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह पूरी तरह गीली और चिपचिपी हो चुकी थी, जिसका मतलब था कि कविता जी भी खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार थीं। उन्होंने अर्जुन के सख्त और लंबे खीरे को अपने हाथ में पकड़ा और उसे अपनी हथेलियों से सहलाने लगीं, जिससे अर्जुन के मुंह से एक कराह निकल गई।
अगले ही पल, कविता जी ने अर्जुन के खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे बड़ी ही कोमलता और प्यास के साथ चूसने लगीं, वह दृश्य इतना उत्तेजक था कि अर्जुन का पूरा शरीर कांपने लगा। वह उनके सिर को पकड़कर अपने खीरे को उनके हलक तक ले जाने की कोशिश कर रहा था, और कविता जी भी बड़े ही मजे से उस खीरे का रसपान कर रही थीं। अर्जुन अब और सब्र नहीं कर सकता था, उसने उन्हें उठाकर मेज पर लिटा दिया और उनकी दोनों टांगों को फैलाकर उनकी गहरी खाई के दर्शन करने लगा। उसने झुककर अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे कविता जी पागलों की तरह उछलने लगीं और बार-बार कहने लगीं, 'ओह अर्जुन, और गहराई से खोदो मुझे, मैं तुम्हारी खुदाई के लिए मर रही हूँ।'
अब समय आ गया था उस असली खेल का जिसके लिए दोनों बेताब थे, अर्जुन ने अपने भारी खीरे को उनकी खाई के द्वार पर रखा और एक ही झटके में उसे आधा अंदर उतार दिया। कविता जी के मुंह से एक तेज चीख निकली पर वह दर्द की नहीं बल्कि उस चरम सुख की थी जिसे वह बरसों से तरस रही थीं, उनकी खाई इतनी तंग थी कि अर्जुन को अंदर जाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। उसने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की और हर धक्के के साथ उसका खीरा उनकी खाई की गहराई को नाप रहा था, वहां होने वाली घर्षण की आवाजें और कविता जी की कराहें उस कमरे के वातावरण को और भी कामुक बना रही थीं। अर्जुन ने उनके दोनों तरबूजों को अपने हाथों में दबोच लिया और उन्हें बुरी तरह मसलते हुए अपनी खुदाई जारी रखी, जिससे कविता जी बार-बार अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं।
खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा, कभी अर्जुन उन्हें सामने से खोदता तो कभी उन्हें मेज पर झुकाकर उनके पिछवाड़े के रास्ते से अपनी पैठ बनाता। जब वह पिछवाड़े से खुदाई कर रहा था, तो कविता जी के वे भारी तरबूज नीचे लटक रहे थे और हर धक्के के साथ झूल रहे थे, जिन्हें देखकर अर्जुन का जोश और भी बढ़ जाता था। वह बार-बार उनके कानों में गंदी और उत्तेजक बातें कह रहा था और कविता जी भी पूरी बेशर्मी के साथ उसका जवाब दे रही थीं, 'हाँ मेरे शेर, और जोर से खोदो, आज अपनी इस मालकिन की खाई को पूरी तरह भर दो।' उनकी इस बात ने अर्जुन के अंदर एक नई ऊर्जा भर दी और उसने अपनी रफ्तार को चरम पर पहुंचा दिया, अब उसका खीरा पूरी गहराई तक जाकर उनकी बच्चेदानी को छू रहा था।
अंततः वह पल आ ही गया जब दोनों का शरीर कांपने लगा और उनकी सांसें उखड़ने लगीं, अर्जुन को महसूस हुआ कि उसका खीरा अब फटने ही वाला है। उसने आखिरी के कुछ बहुत ही तेज और गहरे धक्के लगाए और अपना सारा गर्म रस उनकी खाई की गहराई में छोड़ दिया, उसी समय कविता जी का भी रस छूट गया और वह बेदम होकर मेज पर गिर पड़ीं। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे, पसीने से तरबतर उनके शरीर एक-दूसरे की गर्मी को महसूस कर रहे थे और केबिन में भारी सांसों की आवाजें गूंज रही थीं। उस रात की उस गहरी खुदाई ने उनके बीच के पेशेवर रिश्ते को हमेशा के लिए एक नए और रसीले मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहाँ अब हर रात ऐसी ही एक नई कहानी लिखी जानी थी।