रोहन शहर में अपनी पढ़ाई पूरी करने आया था और उसने खन्ना आंटी के आलीशान घर में ऊपर की मंजिल का एक कमरा किराए पर लिया था। खन्ना आंटी की उम्र करीब अड़तीस साल थी, लेकिन उनकी फिटनेस और खूबसूरती ऐसी थी कि कोई भी उन्हें देखकर धोखा खा सकता था। उनके शरीर की बनावट बहुत ही आकर्षक थी, उनके भरे हुए तरबूज और उनकी पतली कमर के नीचे फैला हुआ भारी पिछवाड़ा रोहन को अक्सर ख्यालों में डुबो देता था। जब भी खन्ना आंटी सिल्क की साड़ी पहनकर आंगन में टहलती थीं, तो उनके अंगों का उभार रोहन की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी होता था।
खन्ना आंटी के पति अक्सर व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, जिस वजह से वह घर में काफी अकेली महसूस करती थीं। रोहन स्वभाव से बहुत ही शांत और शर्मीला था, लेकिन उसकी आँखों में छिपी प्यास आंटी से छिपी नहीं थी। एक तपती हुई दोपहर में जब बिजली चली गई, तो रोहन पानी लेने के लिए नीचे आंटी के किचन में गया। वहां खन्ना आंटी पसीने से तर-बतर होकर खड़ी थीं और उनके नाइटी के पतले कपड़े से उनके दोनों तरबूज साफ झलक रहे थे। उनके मटर जैसे दाने कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे, जिसे देखकर रोहन का गला सूखने लगा।
रोहन को प्यासा खड़ा देखकर आंटी उसके करीब आईं और अपनी मदहोश कर देने वाली मुस्कान के साथ बोलीं, 'रोहन, क्या देख रहे हो? क्या गर्मी तुम्हें भी सता रही है?' उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक और गहराई थी जिसने रोहन के दिल की धड़कन बढ़ा दी। आंटी ने धीरे से अपना हाथ रोहन के कंधे पर रखा, और उस स्पर्श ने रोहन के शरीर में बिजली की लहर दौड़ दी। रोहन की नज़रें आंटी के गले से नीचे उतरते हुए उनके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी पर जाकर टिक गईं। आंटी ने जब देखा कि रोहन उन्हें बड़ी हसरत से देख रहा है, तो उन्होंने अपनी शर्म को किनारे रखकर उसके और करीब आने का फैसला किया।
धीरे-धीरे माहौल में एक गहरा तनाव पैदा हो गया, जहाँ शब्दों की जगह जिस्मों की खामोशी बातें कर रही थी। आंटी ने रोहन का हाथ पकड़कर अपने एक तरबूज पर रख दिया, जो स्पर्श में बहुत ही नरम और गर्म था। रोहन ने कांपते हुए हाथों से उस तरबूज को सहलाना शुरू किया और उसकी उंगलियां उन मटर जैसे नन्हे दानों को छूने लगीं। आंटी के मुंह से एक दबी हुई आह निकली और उन्होंने रोहन के चेहरे को अपने हाथों में भरकर उसके होंठों को चखना शुरू कर दिया। यह स्पर्श इतना गहरा और भावुक था कि दोनों के बीच की झिझक पूरी तरह से खत्म हो गई और कामुकता ने अपना पूरा नियंत्रण बना लिया।
खन्ना आंटी उसे धीरे से खींचते हुए अपने बेडरूम की तरफ ले गईं, जहाँ ठंडी हवा और हल्की रोशनी के बीच दोनों के कपड़े एक-एक करके फर्श पर गिरने लगे। जब आंटी पूरी तरह से निर्वस्त्र हुईं, तो रोहन के सामने उनकी रेशमी त्वचा और उनके शरीर के घुमाव निखर कर आए। उनकी खाई के पास काले और घने बाल थे जो उस जगह की रहस्यमयी गहराई को और भी सुंदर बना रहे थे। रोहन का खीरा भी अब अपनी पूरी मजबूती के साथ तन कर खड़ा हो चुका था, जो उनकी खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार था। आंटी ने जब रोहन के कड़क खीरे को देखा, तो उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।
रोहन ने आंटी को बिस्तर पर लेटाया और धीरे-धीरे उनके पूरे बदन को सहलाने लगा। उसने अपनी जीभ से उनके दोनों तरबूजों को गीला किया और फिर नीचे उतरते हुए उनकी गहरी खाई तक पहुँच गया। आंटी ने अपनी टांगें फैला दीं ताकि रोहन उनकी खाई को अच्छे से चख सके। रोहन ने जब अपनी जीभ से उस खाई के किनारों को चाटना शुरू किया, तो आंटी बिस्तर की चादरों को मुट्ठियों में भींचने लगीं। उनकी खाई से निकलने वाली प्राकृतिक नमी ने रोहन को और भी उत्तेजित कर दिया। आंटी ने रोहन के बालों को पकड़कर उसे अपने ऊपर खींच लिया और उसका खीरा अपने हाथ में ले लिया।
आंटी ने बड़े प्यार से रोहन के खीरे को अपने मुंह में लिया और उसे चूसना शुरू किया। उस गर्माहट और गीलेपन ने रोहन को स्वर्ग का अहसास कराया। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद आंटी ने रोहन को अपने ऊपर आने का इशारा किया। रोहन ने अपनी स्थिति संभाली और अपने खीरे की नोक को उनकी खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही उसने पहला धक्का लगाया, उसका आधा खीरा उस तंग और गर्म खाई के अंदर समा गया। आंटी के मुंह से एक लंबी और सुरीली कराह निकली, 'ओह रोहन, तुम तो बहुत ही जबरदस्त तरीके से मुझे खोद रहे हो, इसे पूरा अंदर डाल दो।'
रोहन ने एक गहरा सांस लिया और अपनी पूरी ताकत के साथ अगला धक्का मारा, जिससे उसका पूरा खीरा आंटी की खाई की गहराई में समा गया। आंटी की आँखों में आंसू और आनंद का मिला-जुला भाव था। अब रोहन ने सामने से खुदाई (missionary) करना शुरू किया, उसके हर धक्के के साथ आंटी के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मटर रोहन के सीने से रगड़ खा रहे थे। कमरे में केवल उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ और आंटी की सिसकारियां गूंज रही थीं। रोहन की गति धीरे-धीरे बढ़ने लगी और खुदाई का आनंद अपने चरम पर पहुँचने लगा।
थोड़ी देर बाद रोहन ने आंटी को पलटने के लिए कहा और उन्हें उनके घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह पिछवाड़े से खुदाई (doggy style) करने के लिए तैयार था। आंटी का भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था, जो रोहन को और भी ज्यादा उकसा रहा था। रोहन ने पीछे से अपना खीरा फिर से उनकी खाई में उतारा और तेज झटकों के साथ खुदाई शुरू कर दी। आंटी की गर्दन पीछे की ओर झुक गई और वह चिल्लाने लगीं, 'हाँ रोहन, ऐसे ही खोदते रहो, मुझे आज पूरी तरह से अपना बना लो।' रोहन की मेहनत रंग ला रही थी और दोनों का शरीर पसीने से पूरी तरह नहा चुका था।
खुदाई की यह प्रक्रिया काफी लंबी चली, जहाँ हर धक्के के साथ दोनों एक-दूसरे की आत्मा तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे। अंत में, जब रोहन को महसूस हुआ कि उसका रस अब निकलने वाला है, तो उसने अपनी गति और तेज कर दी। ठीक उसी समय आंटी की खाई में भी संकुचन होने लगा और उनका रस भी छूटने लगा। रोहन ने अपने खीरे को गहराई तक अंदर धकेल दिया और अपना सारा रस उनकी खाई की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे की बाहों में गिर पड़े, उनकी सांसें तेज थीं और दिल की धड़कनें एक-दूसरे से मुकाबला कर रही थीं।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुकून भरी थी। रोहन और खन्ना आंटी घंटों तक एक-दूसरे से लिपटकर लेटे रहे। उनके बीच का रिश्ता अब केवल मकान मालकिन और किराएदार का नहीं रह गया था, बल्कि एक गहरा भावनात्मक और शारीरिक जुड़ाव बन चुका था। आंटी के चेहरे पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान थी और रोहन को अपनी मर्दानगी पर गर्व महसूस हो रहा था। उस रात की उस बेमिसाल खुदाई ने उनके जीवन में एक नया अध्याय लिख दिया था, जिसे वे दोनों कभी नहीं भूल सकते थे।