ऑफिस की मदहोश रात और अंजलि का समर्पण--->रात के ग्यारह बज चुके थे और ऑफिस की शांत फिजाओं में सिर्फ एयर कंडीशनर की हल्की सी गूंज सुनाई दे रही थी। समीर अपनी केबिन में बैठा हुआ था, लेकिन उसका ध्यान फाइलों में नहीं बल्कि बाहर डेस्क पर काम कर रही अंजलि पर था। अंजलि ने उस दिन एक सफेद रंग की फिटिंग वाली शर्ट पहनी हुई थी, जिसमें से उसके भरे हुए तरबूज साफ झलक रहे थे और उनके ऊपर की मटर शर्ट के कपड़े को भेदने की कोशिश कर रही थीं। उसकी गहरी सांवली रंगत और उसकी कमर का घुमाव समीर के भीतर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर रहा था, जिसे वह अब और काबू नहीं कर पा रहा था।
अंजलि भी इस खिंचाव से अनजान नहीं थी, वह जब भी समीर की ओर देखती, उसकी आंखों में अपने लिए एक प्यास और समर्पण का भाव पाती थी। समीर केबिन से बाहर आया और अंजलि के पास खड़ा हो गया, उसकी खुशबू समीर के नथुनों में समाने लगी जिससे समीर का खीरा पेंट के अंदर ही मचलने लगा। समीर ने अपना हाथ अंजलि के कंधे पर रखा और धीरे से उसकी गर्दन के पास अपनी सांसें छोड़ते हुए कहा कि काम बहुत ज्यादा हो गया है, अब थोड़ा आराम कर लेना चाहिए। अंजलि की रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन दौड़ गई और उसने अपनी पलकें झुका लीं, क्योंकि उसकी खामोशी में ही उसकी हां छिपी हुई थी।
समीर ने अंजलि का हाथ पकड़कर उसे उठाया और धीरे से ऑफिस के अंधेरे कोने वाली सोफे की ओर ले गया, जहाँ किसी के आने की कोई गुंजाइश नहीं थी। अंजलि के दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं और उसकी आंखों में एक अजीब सी झिझक के साथ-साथ गहरी चाहत भी साफ दिखाई दे रही थी। समीर ने अपनी उंगलियों से अंजलि के चेहरे को सहलाया और फिर उसके होंठों को अपने होंठों से पूरी तरह ढंक लिया, जैसे वह सालों की प्यास बुझा रहा हो। अंजलि ने भी अपनी आंखें बंद कर लीं और समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं, उसका शरीर अब पूरी तरह से समीर के स्पर्श का आनंद लेने लगा था।
समीर का हाथ धीरे-धीरे नीचे सरका और उसने अंजलि के शर्ट के बटनों को एक-एक करके खोलना शुरू किया, जिससे उसके विशाल और कोमल तरबूज आज़ाद हो गए। समीर ने अपनी हथेलियों में उन दोनों तरबूजों को भर लिया और उन्हें बड़े ही प्यार से दबाना शुरू किया, जिससे अंजलि के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई। उसने देखा कि अंजलि की गुलाबी मटर अब पूरी तरह से सख्त हो गई थीं, समीर ने अपना सिर झुकाया और एक मटर को अपने मुंह में लेकर उसे चूसने लगा। अंजलि का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह समीर के सिर को अपने सीने से और जोर से चिपकाने लगी, उसकी सांसें अब गर्म और तेज हो गई थीं।
अब समीर ने अपनी उंगलियों को अंजलि की पैंट के अंदर डालना शुरू किया, जहाँ उसे महसूस हुआ कि अंजलि की खाई पूरी तरह से गीली और रसीली हो चुकी है। समीर ने धीरे से उसकी पैंट उतारी और वहां उगे हुए काले रेशमी बाल को सहलाते हुए अपनी उंगलियों को उस खाई के भीतर उतारा। अंजलि के पैरों में कंपन होने लगा और वह समीर के नाम की सिसकियां भरने लगी, उसकी उंगली से खोदना अंजलि को पागल कर रहा था। समीर ने देखा कि उसकी खाई का रस अब उसकी उंगलियों पर चिपक रहा था, उसने नीचे झुककर उस खाई को अपनी जुबान से सहलाना और चखना शुरू कर दिया।
अंजलि अब और इंतजार नहीं कर सकती थी, उसने समीर की बेल्ट खोली और उसके खीरे को बाहर निकाला जो अब पूरी तरह से कठोर और विशाल हो चुका था। उसने समीर के खीरे को अपने नाजुक हाथों में पकड़ा और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी, फिर उसने झुककर उस पूरे खीरे को अपने मुंह में ले लिया। समीर की आंखों के आगे अंधेरा छा गया जब अंजलि ने उसके खीरे को चूसना शुरू किया, उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका सारा जोश उस एक पल में ही निकल जाएगा। समीर ने अंजलि को सोफे पर सीधा लेटा दिया और अपनी शर्ट उतारकर उसके ऊपर आ गया, अब दोनों के बीच कोई पर्दा नहीं बचा था।
समीर ने अंजलि की दोनों टांगों को ऊपर उठाया और अपने खीरे को उसकी रसीली खाई के मुहाने पर टिका दिया, अंजलि ने समीर की आंखों में देखा और उसे आगे बढ़ने का इशारा किया। समीर ने एक गहरा धक्का दिया और उसका पूरा खीरा अंजलि की तंग और गर्म खाई के अंदर समा गया, अंजलि के मुंह से एक दर्द भरी लेकिन सुखद चीख निकल गई। समीर ने उसे संभालते हुए धीरे-धीरे हिलना शुरू किया, हर धक्के के साथ अंजलि के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके बीच का घर्षण एक मधुर संगीत पैदा कर रहा था। वे दोनों अब खुदाई की उस चरम अवस्था में पहुँच चुके थे जहाँ सिर्फ जिस्मों की पुकार सुनाई दे रही थी।
समीर ने अब अंजलि को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, अंजलि ने सोफे के किनारे को मजबूती से पकड़ लिया और अपने पिछवाड़े को समीर की ओर धकेल दिया। इस स्थिति में समीर का खीरा और भी गहराई तक अंजलि की खाई को भेद रहा था, अंजलि की सिसकियां अब चीखों में बदल गई थीं। समीर ने अपने हाथ आगे बढ़ाकर अंजलि के तरबूजों को फिर से जकड़ लिया और अपनी रफ्तार बढ़ा दी, जिससे पूरी ऑफिस की खामोशी उनके टकराने की आवाजों से गूंज उठी। अंजलि को महसूस हो रहा था कि अब उसका रस निकलने ही वाला है, वह पूरी तरह से कांप रही थी और उसका शरीर टूटने को था।
अंत में, समीर ने अंजलि को वापस सामने से लेटाया और अपनी खुदाई की गति को अपने चरम पर ले गया, वह हर धक्के के साथ अंजलि की गहराई को महसूस कर रहा था। अंजलि ने अपनी टांगें समीर की कमर के चारों ओर लपेट लीं और उसे अपने करीब खींच लिया, कुछ ही पलों में अंजलि का रस पूरी तरह से छूट गया और वह समीर की बाहों में ढीली पड़ गई। समीर ने भी दो-तीन आखिरी जोरदार धक्के दिए और अपना सारा गर्म रस अंजलि की खाई के अंदर ही उड़ेल दिया, जिससे दोनों को एक असीम शांति और सुख का अनुभव हुआ। वे दोनों काफी देर तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं।
उस खुदाई के बाद अंजलि का चेहरा गुलाब की तरह लाल हो गया था और उसकी आंखों में एक नई चमक थी, समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया। ऑफिस की उस रात ने उनके पेशेवर रिश्ते को हमेशा के लिए एक नए और गहरे भावनात्मक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था। अंजलि ने मुस्कुराते हुए अपनी शर्ट के बटन बंद किए, लेकिन उसकी बिखरी हुई जुल्फें और उसके चेहरे का नूर उस रात की कहानी साफ बयां कर रहे थे। वे दोनों जानते थे कि यह तो बस शुरुआत थी, और अब हर रात इसी तरह की गहरी और रसीली खुदाई की गवाह बनेगी।